Mahendra Arya

Mahendra Arya
The Poet

गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

शुभ हो अगला साल !

शुभ हो अगला साल !
ना आवे भूकंप सुनामी
ना आवे भूचाल , शुभ हो अगला साल !

ना कोई आतंकी घुस आवे
ना कोई दुश्मन घात लगावे
अमन चैन से रहे देश यह
जीवन हो खुशहाल, शुभ हो अगला साल !

भ्रष्टाचार मिटे इस भू से
बचे रहे सब इस थू थू से
नेतागण आदर्श बने सब
देवें एक मिशाल , शुभ हो अगला साल !

रहे प्रगति पर देश हमारा
किसी से हो ना द्वेष हमारा
दुनिया चाहे मैत्री हम से
ऐसा करें कमाल , शुभ हो अगला साल !

बच्चा बच्चा सभी सुखी हो
कोई भारतीय नहीं दुखी हो
लक्ष्मी जी की कृपा रहे अब
कोई ना हो कंगाल , शुभ हो अगला साल !

मन में हो संतोष सभी के
जीवन में हो जोश सभी के
आपस में सौहार्द्र रहे और
ख़त्म सभी जंजाल, , शुभ हो अगला साल !

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

सुबह का अखबार

सोचता हूँ

अखबार पढना बंद कर दूं

क्या पढूं

एक विदेशी महिला का बलात्कार

पांच वर्षीया बालिका से कुकर्म

पिता द्वारा बेटी गर्भवती

पुलिस थाने में युवती से सामूहिक बलात्कार

तांत्रिक द्वारा माँ और बेटी के साथ लगातार कुकर्म



क्या इतनी गिर गयी है

समाज की सोच

या आने बाकी है

गिरावट के और भी आयाम

आम आदमी इतना जानवर हो गया है .........

अपनी बात वापस लेता हूँ

जानवर से क्षमा मांगते हुए

जानवर अपनी पृकृति से बाहर कुछ नहीं करता

प्रकृति जो ईश्वर प्रदत है



लेकिन मेरे अखबार न पढने से क्या होगा

समाचार तो नहीं बदल जायेंगे

समाचार बदलेंगे

सम आचार बदलने से

जब तक इस देश में

सीटियाँ बजती रहेंगी

किसी मुन्नी के बदनाम होने पर

तब तक अखबार ऐसे ही भरा रहेगा

मुनियों के बलात्कार की खबरों से

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

अलसाई सी धूप

आँगन में उतरी, पसरी है - अलसाई सी धूप 
जाड़े की सुबह में थोड़ी ठिठुराई  सी धूप

गर्मी में आती मुडेर पर गुस्से में हो लाल
दोपहरी में ज्वाला बनती , गुस्साई सी धूप 

वर्षा में बादल बच्चों सी अठखेली करते हैं 
लुका छिपी करती उनसे ,मुस्काई सी धूप 

वर्षा की बूंदों से मिल कर , श्रृंगारित होती है 
इन्द्रधनुष की वेणी पहने , शरमाई सी धूप 

पतझड़ के पेड़ों से कहती - ये क्या हाल बनाया 
सूखे पत्तों को झड्काती , पुरवाई सी धूप 

दिन का मौसम कैसा भी हो, शाम मगर वैसी ही 
जैसे सूरज ढलता जाता , कुम्हलाई सी धूप

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

आग रिश्तों को लगा दो

रात गहरी चाँद मद्धम, मिल सकेगी राह क्योंकर
घोर जंगल मार्ग दुर्गम, कोई हो आगाह क्योंकर


आदमी से जानवर अब, जानवर से आदमी हैं
कौन किसको मीत समझे , और हो निर्वाह क्योंकर


जिसको था सर्वस्व सौंपा , उसने ही सर्वस्व लूटा
मौन अब वाणी बना है , सांस बन गयी आह क्योंकर


साथ जीने की कसम ली , साथ मरने की कसम ली
मृत्यु से पहले चिता दी , जिंदगी को दाह क्योंकर


आग रिश्तों को लगा दो , मृत्यु किश्तों की मिटा दो
ख़त्म कर दो बन्धनों को , अब चलें उस राह क्योंकर

रविवार, 5 दिसंबर 2010

अपने अपने दायरे

हर दिन शुरू होता है

सूरज की किरणों के साथ

पूर्व से आती वो शक्ति की रेखाएं

भर देती हैं पृथ्वी को

उजास से ऊर्जा से उत्साह से

अंतर्ध्यान हो जाता हैं

अन्धकार,आलस्य ,प्रमाद

जैसे जैसे सूरज चढ़ता है

किरणे प्रखर होती हैं

कार्यशील होती है

पृथ्वी पर श्रृष्टि

पशु पंक्षी कीट पतंग और मनुष्य

लग जाते हैं अपने जीवन के सँचालन में

सब ने बना रखे हैं

अपनी अपनी जरूरतों के दायरे



उस दायरे के अन्दर

उसे सब कुछ चाहिए

उसके लिए वो घुस सकता है

दूसरे के दायरे में भी

क्योंकि एक का अस्तित्व दूसरे का भोजन है

क्योंकि एक का अस्तित्व दूसरे के अस्तित्व को खतरा है

जानवर का दायरा छोटा है

जिसकी जरूरत है सिर्फ भोजन और आत्म रक्षा

आदमी का दायरा सबसे बड़ा

जिसमे समा जाते हैं

बाकी सारे दायरे

क्योंकि आदमी की भूख और जरूरतें अनंत हैं

जिसमे सिर्फ भोजन और आत्म रक्षा ही नहीं

एक लम्बी फेहरिस्त है चीजों की -

जैसे की

लोमड़ी की खाल से बना फर का कोट

सांप की चमड़ी से बने जूते

खरगोश की आँखों पर आजमाए गए शृंगार के साधन

हिरन की खाल से बने गलीचे

हाथी के दांत की सजावट

शेर के मुह का दीवार-पोश

इतना ही नहीं

फेहरिस्त और भी लम्बी है

परमाणु बम - वृहद् नर संहार के लिए

रसायन - मनुष्य को लाचार बनाने के लिए

बारूद - विस्फोट में लोगों को उड़ा देने के लिए

अनंत है फेहरिस्त

मनुष्य नाम के जानवर की जरूरतों की



इस बड़े दायरे से बाहर सिर्फ एक दायरा है

ईश्वर का दायरा

निरंतर कोशिश करता है

जिस में घुस जाने की इंसान

कभी अंतरिक्ष में घुस कर

कभी जीव की रचना -

उन नियमो के बाहर जाकर कर के

या फिर शायद

यह भी मनुष्य की एक कपोल कल्पना है

अपने दायरे से बाहर जो कुछ है -

उसे वो ईश्वर कह देता है

धीरे धीरे अपना दायरा बड़ा बनाता जाता है

और उसका दायरा छोटा

फिर भी डरता है उससे

क्योंकि वो - सिर्फ वो

आदमी को उसका कद याद दिलाता है

कभी भूकंप से , कभी सुनामी से ,

कभी कैंसर से , कभी एड्स से

और तब ये लाचार इन्सान

गिड़गिडाता है भीख मांगता है

अपने घुटनों पर गिर कर

ईश्वर भी चकित है

अपने इस निर्माण पर

क्योंकि वो देखता है

उस विध्वंस को

जो धर्म के नाम पर करता है इंसान

कुछ और नहीं तो

ईश्वर को ही भागीदार बना कर .

बुधवार, 10 नवंबर 2010

चाहतें एक आम आदमी की

मुझको कुछ सामान चाहिए
थोडा सा सामान चाहिए

मुझको दौलत नहीं चाहिए
मुझको इज्जत नहीं चाहिए
नहीं चाहिए हीरे मोती
मुझको शोहरत नहीं चाहिए

राज पाट की चाह नहीं है
ठाठ बाट की चाह नहीं है 
नहीं चाहिए तोप तमंचे 
मार काट की चाह नहीं हैं 

मुझे पांव  भर जगह चाहिए 
मुझे सांस भर हवा चाहिए 
मुझे चाहिए प्यार सभी का 
मुझे उम्र भर दुआ चाहिए 

मुझे हाथ भर काम चाहिए 
थोडा सा विश्राम चाहिए 
मुझे चाहिए नींद रात भर 
आँख मूँद कर राम चाहिए 

थोडा सा आकाश चाहिए 
वर्षा का आभास  चाहिए 
इन्द्रधनुष का मेरा टुकड़ा 
तकने का अवकाश चाहिए 

मुझको मेरे ख्वाब चाहिए 
अन्तर में इक आग चाहिए 
मेरे आँगन की बगिया में 
गेहूं नहीं गुलाब चाहिए 

जीवन का कुछ अर्थ चाहिए 
नहीं जिंदगी व्यर्थ चाहिए 
औरों के कुछ काम आ सकूं 
इतना स्वयं समर्थ चाहिए

सौदे में ईमान चाहिए 
वाणी गुड की खान चाहिए 
नहीं चाहिए झूठी इज्जत 
मुझको स्वाभिमान चाहिए 

मुझको कुछ सामान चाहिए 
थोडा सा सामान चाहिए 
जीवन को जीवित रखने को   
इतना सा सामान चाहिए






बुधवार, 3 नवंबर 2010

रोशनी का दिन

आ जिंदगी , चल बैठ कहीं गुफ्तगू करें

दिल को सुकून मिल सके ये जुस्तजू करें


मुश्किलों से भाग कर हम जायेंगे कहाँ

आ मुश्किलों का सामना हो रूबरू करें


देखें किसी को बांटते औरों के ग़म कभी

चल हम भी उनसे सीख कर वो हुबहू करें


दीपावली का दिन है , चिराग जलाएं

दिल में मुकम्मल रोशनी की आरजू करें

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

दीपावली का दिया

टिमटिमाते हैं - असंख्य दिए मिटटी के
अमावस्या की रात को जगमगाते हैं
नजर आती है अनेक कतारे रौशनी की
मुंडेरों,खिडकियों,चौखटों पे जुगनू झिलमिलाते हैं

जैसे जैसे रात गहराती है
कांपती है कुछ दीयों की लौ
कुछ देर फडफडाती है
फिर खो जाती है वो

दिया मिटटी का वही है, वैसा ही है
लेकिन ख़त्म हो गया है तेल उसका
जिसमे डूबी बाती देती थी रौशनी
बस ख़त्म हो गया है खेल उसका

कुछ दियों में तेल शेष था
लेकिन हवा का झोंका भी तेज था
लौ लडती रही अंत तक यथाशक्ति
अंततः हार कर बुझ गयी लौ उसकी

हम भी तो दीपक हैं मिटटी के
अमावस्या है उम्र हमारी
पृथ्वी है घर द्वार मुंडेरों सी
जिस पर बिखरी मानवता सारी

जीवन का दुःख ही अँधेरा है
दुःख की रातें कितनी काली है
सुख के क्षण जीवन में रौशनी से
जिनसे होती दिवाली है

सांसे हैं तेल , हम दियों का
आत्मा है लौ जगमगाती है
जीवन के संघर्ष मुश्किलें सारी
हवा सी - जो लडती बुझाती है

पर दिया कभी प्रश्न नहीं करता
क्यों भेजा इन निर्मम हवाओं को
इतने मासूम , लाचार और नन्हे हैं हम
क्यों होने दिया इन खताओं को

दिया जानता है कर्त्तव्य अपना
पल पल जलना, पल पल लड़ना
जब तक अस्तित्व है उसका
तब तक सब आलोकित करना

मिटटी हैं हम , मिटटी है वो
क्षणभंगुर हम, क्षणभंगुर वो
जीवन का पाठ पढाता है
जब तक जलती रहती है लौ

आओ दिवाली मनाएं हम
जब मिटटी के दीपक जलाएं हम
एक क्षण को आँखें मूँद ले तब
और दीपक को जीवन में लायें हम

रविवार, 31 अक्तूबर 2010

एक बरस और बीत गया

एक बरस और बीत गया
जीवन का घट थोडा और रीत गया

भागता समय ऐसे . एक एक क्षण जैसे
आँखों के आगे से बन अतीत गया
एक बरस और बीत गया

कुछ खट्टी, कुछ मीठी , परतें हैं जीवन की
हार कर गया कोई , कोई जीत गया
एक बरस और बीत गया

जाने पहचाने से, अपने अनजाने से
मिल कर परायों सा कोई मीत गया
एक बरस और बीत गया

मरते हम दिन दिन है ,जीते हम गिन गिन हैं
सांसों की गिनती का एक गीत गया
एक बरस और बीत गया

बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

छंदों में मात्राओं का विज्ञान

हम कवितायेँ लिखते और पढ़ते हैं . कुछ कवितायेँ छंद बद्ध होती हैं तो कोई स्वछन्द . छंद बद्ध कवितायेँ किसी नियम में बंधी होती है, जिसकी वजह से उस कविता का पढना एक विशेष लयात्मकता में ढल जाता है ; जब कभी कविता अपने छंद का नियम तोडती हैं , तो उसे उस लय में पढ़ पाना मुश्किल होता है. यहाँ हम चर्चा करेंगे सिर्फ छंद बद्ध कविताओं की , जैसे की दोहा, चौपाई , सोरठा , ग़जल वैगरह. इसके अलावा भी बहुत से अपरिभाषित छंद हो सकते हैं, लेकिन आवश्यता होती है , उस छंद की नियम बद्धता की.
घबराइए मत , मैं कोई बहुत मुश्किल चर्चा नहीं कर रहा हूँ , बल्कि एक मुश्किल विषय को आसानी से समझ पाने का नुस्खा बता रहा हूँ . कविता, ग़जल, गीत - सब का एक मीटर होता है . और उस मीटर का नाप होता है मात्राएँ . किस छंद में कितनी मात्राएँ होती हैं, ये निश्चित होता है . उर्दू कविता में मात्राओं के इस मीटर का नाम बहर होता है कवि या शायर जाने अनजाने उन मात्राओं की गिनती को समान रखता है . आइये इस विज्ञान को समझाने का प्रयत्न करते हैं उदाहरण के द्वारा -

एक दोहा लेते हैं -

रहिमन देख बड़ेन को , लघु न दीजिये डारि !
जहाँ काम आवे सुई , कहाँ करे तलवारि !!

आइये इसकी मात्राओं की गिनती करें . गिनती के नियम हैं -

१. प्रत्येक बिना मात्रा का अक्षर = १ मात्रा ; जैसे - र


२. प्रत्येक आ की मात्रा वाला अक्षर = २ मात्रा ; जैसे का


३. प्रत्येक छोटी इ की मात्रा वाला अक्षर = १ मात्रा ; जैसे रि


४. प्रत्येक बड़ी ई की मात्रा वाला अक्षर = २ मात्र ; जैसे दी


५. प्रत्येक छोटे उ की मात्रा वाला अक्षर = १ मात्रा ; जैसे सु


६. प्रत्येक बड़े ऊ की मात्रा वाला अक्षर = २ मात्रा ; जैसे पू


७. प्रत्येक ए की मात्रा वाला अक्षर = १ या २ मात्रा@ ; जैसे डे


८. प्रत्येक ऐ की मात्रा वाला अक्षर = २ मात्रा ; जैसे जै


९. प्रत्येक ओ की मात्रा वाला अक्षर = २ मात्रा ; जैसे को


१०. प्रत्येक औ की मात्रा वाला अक्षर = २ मात्रा ; जैसे लौ


११. प्रत्येक बिंदी वाला अक्षर = २ मात्रा ; जैसे जं


१२. प्रत्येक विसर्ग वाला अक्षर = २ मात्रा ; जैसे क:


१३. प्रत्येक डेढ़ अक्षरों का योग = २ मात्रा ; जैसे ल्ल

[@ विशेष : साधारणतया इन मात्राओं की गिनती ऊपर दिए नियमों के अनुसार होती है, लेकिन अपवाद भी होते हैं. वास्तव में मात्राओं का सम्बन्ध प्रत्येक अक्षर के उच्चारण से सम्बन्ध रखता है. इसलिए बड़ी मात्राओं (दीर्घ मात्राएँ ) को २ मात्रा मानते हैं और छोटी मात्राओं ( लघु मात्राएँ ) को १ मात्रा मानते हैं . लेकिन कई बार बड़ी मात्राओं को पढने में जल्दी पढ़ा जाता है ताकि कविता की लय बनी रहे; उसी तरह कभी कभी छोटी मात्राओं पर भी जरा रुक के पढना पड़ता है खास कर ऐ की मात्र में ये अक्सर होता है ; ऐसी स्थिति में मात्राओं के योग में ऊपर लिखे नियमों से भिन्नता आने की सम्भावना है .समझाने के लिए जहाँ भी छोटी ऐ की मात्र २ गिनी जायेगी उसे हम रेखांकित कर देंगे .ऊपर लिखे नियमों को हम आधार मान सकते हैं . ]


आइये इन नियमो के आधार पर जरा गिन कर देखें की ऊपर लिखे रहीम के दोहे में कितनी मात्राएँ हैं . दोहे में चार पद है . पहले और तीसरे पद में एक अर्ध विराम यानि कोमा है ; दुसरे और अंतिम पद के बाद पूर्ण विराम है . हम मात्रा गिनेंगे पद के अनुसार . दोहे को अक्षर के अनुसार जरा बाँट देते हैं , इस प्रकार -

र हि म न दे ख ब ड़े न को , ल घु न दी जि ये डा रि !


ज हाँ का म आ वे सु ई , क हाँ क रे त ल वा रि !!

अब हर अक्षर की मात्रा तय करते हैं और उस अक्षर के ऊपर लिख देते हैं , ऊपर लिखे नियमों के अनुसार -


१   १ १ १   १ १    १ २ १ २ ( कुल योग =१३ मात्रा )


र हि म न दे ख ब ड़े न को ,


१ १ १     २ १    २   २    १       ( कुल योग =११ मात्रा)


ल घु न दी जि ये डा रि !


१   २   २    १   २   २   १   २       ( कुल योग =१३ मात्रा )


ज हाँ का म आ वे सु ई ,


१    २ १ २ १    १ २   १           ( कुल योग =११ मात्रा )


क हाँ क रे त ल वा रि !!

इस उदाहरण से ये बात समझ में आ गयी कि किसी भी दोहे छंद में पहले और तीसरे पद में मात्राओं का योग १३ होगा और दुसरे और चौथे पद की मात्राओं का योग ११ होगा . दूसरी बात ये की दूसरे और चौथे पदों में तुकबंदी होती होती है जैसे की यहाँ डारि और वारि . आइये एक और दोहा लेकर उस पर इस बात को जांच कर देखें . कबीर का एक प्रसिद्द दोहा -

काकड़ पाथर जोर के, मसजिद लई बनाय !
ता चढ़ मुल्ला बांग दे, क्या बहिरा हुआ खुदाय !!

आइये उसी प्रकार विच्छेद करते हैं इस दोहे का भी और गिनते हैं मात्राओं को -

२    १ १   २   १ १   २ १   २      ( कुल योग =१३ मात्रा )


का क ड़ पा थ र जो र के,


१   १   १    १ १ २   १ २   १      ( कुल योग =११ मात्रा )


म स जि द ल ई ब ना य !


२    १ १   १   २     २    २ २        ( कुल योग =१३ मात्रा )


ता च ढ़ मु ल्ला बां ग दे ,


  २    १ १    २ १ २     १ २   १   ( कुल योग =११ मात्रा )


क्या ब हि रा हु आ खु दा य !!

इस प्रकार पुष्टि हो गयी हमारी गणना की . एक उदाहरण एक चौपाई का लेकर गिनें . जैसा की नाम से पता चलता है चौपाई, इस छंद में भी चार पद होते हैं , विशेषता ये है कि इस छंद में चारों पदों की मात्राओं का योग एक समान होता है . हम सब के लिए चौपाई का अर्थ होता है तुलसीदासजी की रामचरितमानस . उदाहरण लेते हैं उनकी रचना रामचरितमानस से -

सुनत राम अभिषेक सुहावा । बाज गहागह अवध बधावा ॥
राम सीय तन सगुन जनाए । फरकहिं मंगल अंग सुहाए ॥२॥

और अब मात्राओं की गिनती -

१   १ १    २ १ १    १    २ १    १ २ २         ( कुल योग =१६ मात्रा )


सु न त रा म अ भि षे क सु हा वा ।


२   १    १ २ १   १ १    १ १ १ २    २           ( कुल योग =१६ मात्रा )


बा ज ग हा ग ह अ व ध ब धा वा ॥


२   १   २   १   १ १   १   १ १   १   २ २            ( कुल योग =१६ मात्रा )


रा म सी य त न स गु न ज ना ए ।


१   १ १    १ २   १ १    २ १   १ २ २             ( कुल योग =१६ मात्रा )


फ र क हिं मं ग ल अं ग सु हा ए ॥२॥

इस उदहारण से हम दो बातें सीखते हैं , पहली कि चौपाई में भी चार पद होते हैं और हर पद कि मात्राओं का योग हमेशा १६ होता है . दूसरी बात ये कि तुकबंदी पहले और दूसरे पदों में तथा तीसरे और चौथे पदों में होती है . आइये एक और उदहारण से इस बात को देखें -

जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा । सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा ॥
बिप्र साधु सुर पूजत राजा । करत राम हित मंगल काजा ॥१॥


और आइये अब गिने मात्राओं को -

२     १ २    १ १    १   २    १ १    २    २       ( कुल योग =१६ मात्रा )


जो मु नी स जे हि आ य सु दी न्हा ।


२    १   १   २    १   १ १ १   १   १    २    २    ( कुल योग =१६ मात्रा )


सो ते हिं का जु प्र थ म ज नु की न्हा ॥


१   २    २   १   १ १  २   १ १   २   २             ( कुल योग =१६ मात्रा )


बि प्र सा धु सु र पू ज त रा जा ।


१   १ १   २ १   १   १   २   १   १    २   २       ( कुल योग =१६ मात्रा )


क र त रा म हि त मं ग ल का जा ॥१॥

[ ऊपर दिए उदहारण में दो स्थानों पर ए की मात्रा है, लेकिन उसका उच्चारण बहुत जल्दी बोल कर होता है; शब्द हैं जेहि और तेहिं , इसलिए दोनों स्थानों पर जे और ते की एक मात्रा गिनी है. दोनों ऐसी मात्राओं को अलग रंग में रेखांकित कर के बताया है .]

इसी तरह और किसी कविता का मीटर भी हम समझ सकते हैं . एक उदाहरण लेते हैं एक छंद बद्ध कविता का . दुष्यंत कुमार की एक मशहूर रचना के पहले और आखिरी बंद -

हो चुकी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकालनी चाहिए !


मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए

और अब मात्राओं की जल्द गिनती -

२   १+२ २  २+१ १+२+१ २    १+१+१+२ २+१+१     (= २५ )
हो चुकी है पीर    पर्वत    सी पिघलनी     चाहिए


१+१ १+२+१+१ १   २+२ २+२  १+१+१+२ २+१+१   (=२५)
इस    हिमालय    से कोई गंगा निकलनी    चाहिए !


१+२ २+२   १ १+२ २   १+२ २+२ २ १+२                (=२५)
मेरे    सीने में नहीं तो तेरे   सीने में सही


२   १+२ २    २+१ २+१+१ २+१ १+१+२ २+१+१       (=२५)
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी    चाहिए

इस प्रकार हम समझ सकते हैं की कविता चाहे किसी भी छंद की हो , उसका मीटर या बहर ही उसे गेय या लयात्मक बनाता  है . एक भी मात्रा की गड़बड़ होने से उसमे एक लंगड़ापन आ जाएगा. जब आप भी कोई कविता लिखें तो आप देख लेवें की आपकी मात्राओं की गणना  में समानता है या नहीं . या फिर आपको अपनी किसी रचना को ढंग से पढने में कठिनाई आ रही हो तो एक बार मात्राओं को गिन कर देख लेवें की कहीं मात्राओं में भिन्नता तो नहीं .

ये सारी जानकारी आपको मैं कुछ उपलब्ध स्त्रोत्रों से और कुछ अभ्यास के आधार पर दे रहन हूँ . त्रुटि पायें तो कृपया टिपण्णी करें .

मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

मन की भाषा

शब्दों  की  भाषा से बढ़कर एक भाषा होती है
वह भाषा मन के भावों की परिभाषा होती है

हर शब्द नहीं बोला, समझा , समझाया जाता है
इक शब्द उतर कर आँखों में सब कुछ कह जाता है

है नहीं जरूरत मन की भाषा को तो वैया-करण की
है नहीं जरूरत शब्दकोष के साधन और शरण की

सुख की भाषा, दुःख की भाषा, भाषा क्रोधित भावों की
मौन प्रेम की अभिव्यक्ति , आंसू - आहत घावों की

यदि शब्द नहीं होते जीवन में शायद अच्छा होता
अपशब्दों की भाषा से बचता मानव बच्चा होता

शनिवार, 23 अक्तूबर 2010

परिपक्व प्यार

जीवन का प्रवाह कुछ ऐसा मोड़ लेता है
आने वाले सभी परिवर्तनों से खुद को जोड़ लेता है
मुझे ही देखो न -
मैं अपने आप को आईने में देख जुल्फें संवारता था
घंटों खुद का व्यक्तित्व निहारता था

और अब -
आइना तो वही है जुल्फें घट गयी
थोड़ी काली थोड़ी सुफेद दो रंगों में बाँट गयी
कोशिश करता हूँ कि सब काले रंग में रंग जाये
इसके पहले की सारी सुफेद रंग में रंग जाये
और वो -
सुबह उठ के मुझे प्यार से उठाने की जगह
जोर से पूछती है - सैर के लिए उठो
और मैं कोई बहाना सोचूँ उसके पहले
अगला आदेश - चलो, उठो, खड़े हो जाओ

और फिर -
ये कहने कि जगह - आज दफ्तर न जाओ तो ?
वो ये कहती है - दफ्तर नहीं जाना क्या ?
मैं जब कहता - डार्लिंग , एक प्याला चाय मिलेगी
संबोधन से खुश होकर चाय पेश करने की जगह
चाय से ज्यादा गरम हो जाती है -
बहुत हो गयी चाय , चलो नहाओ .
और लंच पर -
उनका फोन अब भी आता है
लेकिन ये पूछने की  जगह कि खाना कैसा लगा
ये बताने के लिए
कि दवा की पुडिया छोटी डिबिया में रखी है
खाने के बाद याद कर के ले लेना

और शाम को -
जब घर पहुँचता हूँ ,
वो ये नहीं कहती की चलो कहीं घूमने चलें
बल्कि ये कहती है -
बहुत थक गए होगे ,थोडा आराम कर लो ,
मैं तुम्हारे लिए चाय बना कर लाती हूँ

डिनर पर -
ये कहने की जगह की चलो एक ही थाली में खाते हैं
कहती है , तुम खाओ , मैं गरम फुल्के बनाती हूँ

और बिस्तर पर -
मैं मेरी थकान के साथ सोने की कोशिश करता हूँ
वो बिना किसी शिकायत के
मेरे बालों में अंगुलियाँ फिराती है

सोचता हूँ - क्या बदल गया ?
क्या वो प्यार नहीं रहा
क्या वो गर्मजोशी ख़त्म हो गयी
लेकिन मेरा चिंतन मुझे बताता है -
यह ही असली प्यार है
मुझे जल्दी उठा  कर सैर पर भेजना
ज्यादा चाय न पीने देना
दिनचर्या में नियमितता रखवाना
समय पर दवा याद दिलाना
मेरी थकान के सामने खुद की भूल जाना
गरम फुल्के अपने हाथों से बना कर खिलाना
नींद के लिए मुझे वो प्यार भरा स्पर्श देना
यही तो है परिपक्व प्यार
जो जीवन की सांझ में
अकेलेपन को भगाता है

वो मुझे तब से भी बहुत अधिक प्यार करती है

रविवार, 17 अक्तूबर 2010

आओ फिर एक बार चले गाँव

आओ चलें - अपने गाँव
जहाँ है बचपन की ठंडी छाँव

गाँव के उस पुराने प्राइमरी स्कूल की तरफ
जिसके नाम के भी मिट गए थे हरफ
जहाँ हर रोज सुबह हम घर से लाते थे
और अपने हाथों से बिछाते थे
एक लम्बी सी दरी
स्याही के धब्बों से भरी
उस बूढ़े पीपल के पेड़ के नीचे
दीवार पर रंगे ब्लैक बोर्ड के पीछे
और फिर शुरू हो जाती थी पाठशाला
रोज का मिर्च मसाला
मास्टरजी के हाथ में छड़ी का लहराना
और हमारा जोर जोर से चिल्लाना
दो एकम दो......दो दूनी चार .......
दो तीये छः.....दो चौके आठ ....

थोड़ी दूर और चलें
चल कर मिलें
जोहड़ से गाँव की
मचलते पाँव की
जहाँ लगाते थे छलांग
होती हवा में टाँग
पास ही बनी मुंडेर से
इंटों के बने घेर से
हमेशा यही फ़िराक
की बनना है तैराक
बिना किसी सोच के
बिना किसी कोच के

और वो नीम का घना दरख़्त
अन्दर से नर्म बाहर से सख्त
कडवाहट के बीच लगती थी
पीली हो पकती थी
मीठी निमोली
भर भर के झोली
जिसका कोई मोल नहीं था
जिसका कोई तोल नहीं था
आज नहीं मिलती किसी शहरी बाज़ार में
रुपैये, डॉलर या पौंड के व्यवहार में

और वहीँ पास में वो पुराना शिवाला
जिसके पीछे थी गौशाला
जिसकी आरती में हम बैठते थे
आँखे बंद कर भक्ति में पैठते थे
भगवान से ज्यादा पुजारी के लिए
मखानों और बताशों की रोजगारी के लिए

और शाम को वो घर को लौटना
नंगे पावँ मिटटी में लोटना
कभी भैंसों की पीठ पर
कभी ऊंटों की रीढ़ पर
कभी बछड़ों की पूँछ पकड़ कर
कभी पिल्लों को बाँहों में जकड कर
मिटटी से भरे बालों को खुजलाते
टूटी फूटी भाषा में कुछ न कुछ गाते

वो दृश्य यादों से न जाते हैं
वो दिन कितने याद आते हैं
आओ फिर एक बार चले गाँव
और ढूंढें अपना ठांव

गुरुवार, 14 अक्तूबर 2010

इंसान कुछ नहीं

भगवान की दुनिया में इंसान कुछ नहीं
इंसान की तो छोडिये , भगवान कुछ नहीं

धनवान की है शोहरत धनवान की है इज्जत
विद्वान कुछ नहीं यहाँ , गुणवान कुछ नहीं

"अतिथि देवो भव" जिस देश का चलन था
घर आज कोई आया मेहमान कुछ नहीं

पैसा मिले तो पंडित, पैसा मिले तो पूजा
पैसा नहीं हो पास तो जजमान कुछ नहीं

कन्या बहुत है सुन्दर, कन्या पढ़ी लिखी है
जो दहेज़ न मिले तो , खानदान कुछ नहीं

सोमवार, 4 अक्तूबर 2010

जीवन भी चिता है

जा रहा हर एक पल
बन रहा हर 'आज' कल
श्वास श्वास मर रहा
बूँद बूँद भर रहा
जीवन का घट है
भर कर मरघट है  
बीत रहा वक़्त है
सूख रहा रक्त है
पोर पोर ढल रहा
कतरा कतरा जल रहा
जिंदगी है कट रही
यूँ कहो सिमट रही
वक़्त हमें पढ़ रहा
रक्त चाप बढ़ रहा
धोंकनी धधक रही
अग्नि सी भभक रही
रिश्तों के झुण्ड में
जीवन के कुंड में
हविषा बन जल रहा
खुद को ही छल रहा
मरने से डरता है
हर घड़ी जो मरता है
भोला इंसान है
यूँ ही परेशान है
जिस चिता से डर रहा
सब प्रयत्न कर रहा
मृत्यु बस चिता नहीं
जीवन कविता नहीं
जीवन भी चिता है
मृत्यु भी कविता है

शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

जन्मदिन

जन्मदिन - एक ख़ुशी का दिन
परिवार के लिए एक उत्सव
मित्रों के लिए एक दावत
बुजर्गों के लिए - अवसर आशीष का
बच्चों के लिए उपहारों की प्रतीक्षा
सब के लिए एक आनंदोत्सव

लेकिन जन्मदिन - स्वयं के लिए क्या ?
अपने आज तक के जीवन पर दृष्टिपात
अपने आप के साथ बिताने का समय
जीवन की उपलब्धियों पर एक नजर
जीवन की कमियों का आत्म चिंतन
जन्मदिन - एक आत्मविश्लेषण का दिन

जन्मदिन - जीवन की तलपट का दिन
हानि लाभ , सम्पति और जिम्मेवारियों का ब्यौरा
और इस हानि लाभ के ब्योरे में क्या कुछ ?
मात्र आर्थिक आदान प्रदान नहीं

अपने जन्मदिन पर बनायें ऐसा एक दस्तावेज
जिसमे जमा खर्च हो -
न सिर्फ आर्थिक लेन देन का
बल्कि सामाजिक, पारिवारिक ,शारीरिक
इतना ही नहीं धार्मिक और आत्मिक हानि लाभ का

यदि हमने कड़ी मेहनत कर के पैसा कमाया
तो आर्थिक लाभ , शारीरिक हानि लेकिन आत्मिक लाभ

यदि हमने जुए या लोटरी में पैसा कमाया
तो आर्थिक लाभ लेकिन आत्मिक हानि

यदि हमने किसी को कष्ट देकर कमाया
आर्थिक लाभ, मानसिक और धार्मिक हानि

किसी गरीब की मदद की हो तो
आर्थिक हानि , लेकिन मानसिक, सामाजिक, आत्मिक और धार्मिक लाभ

इस लेन देन के अलावा तलपट में लिखें
जीवन की मुश्किलों से संघर्ष
हर स्थिति का सामना सहर्ष
शारीरिक ड़ेप्रीसियेसन ,
आत्मबल का अप्रिसियेसन
संतान की योग्यता में उतार चढाव
माता पिता के जीवन में संतोष या असंतोष
पत्नी का प्रेम , पत्नी के लिए आपका प्रेम
सामाजिक सक्रियता, व्यावहारिक लोकप्रियता
अपने आप में परिवर्तन ,
अब तक का अपना जीवन

हर उपलब्धि के लिए खुशियाँ मनाइए
स्वयं अपनी पीठ थपथपाइए
अपनी कमियों के लिए बनायें निर्देश
स्वयं को ही दे आदेश
आने वाले वर्षों का ब्यौरा और सुधार ले
इसी तरह अपना पूरा जीवन संवार लें

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

राम भरोसे

भारत ने
ना जाने
क्यों ले ली
क्यों झेली
नयी बला
वजह बिला
ये आफत
ये सांसत
कोमनवेल्थ
बिगड़ा हेल्थ
शासन का
प्रशासन का

पहले जो
थे आगे
अब पीछे
हैं भागे
चढ़ गाडी
कलमाड़ी
धड़का दिल
एम. एस. गिल
नाक कटी
दिल्ली की
उडी हंसी
"शिल्ली" की

दुनिया में
थू थू है
दिल्ली में
बदबू है
कई करोड़
दिए मरोड़
खाया फंड
क्या दे दंड
खेलों का
क्या होगा
झमेलों का
क्या होगा

मनमोहन
सोच रहे
दाढ़ी को
नोच रहे
चिल्लाती
दुनिया है
पर खामोश
सोनिया है
उड़े सभी के
तोते है
अब सब राम-
भरोसे है

रविवार, 26 सितंबर 2010

कहते रहते लोग

लेना देना नहीं किसी का , फिर भी कहते लोग
औरों के जीवन के मसले , चुप ना रहते लोग

मेरा जीवन मेरा अपना क्या खाया क्या पहना
मैं खुश हूँ मैं जैसा भी हूँ , क्यों नाखुश हैं लोग

मैं बीमार पड़ा तो नुस्खे मेरे पास बहुत है
हर कोई अपना दे जाता , देने आते लोग

मेरे घर में कलह हुई तो मैंने उसे संभाला
फिर भी कलह बढ़ाने आते समझदार कुछ लोग

खूब कहा शायर ने प्यारे कुछ तो लोग कहेंगे
क्योंकि उनका काम है कहना , कहते रहते लोग

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

मेरी सबसे उम्दा ग़जल

मेरी कविताओं की डायरी में
एक पन्ना खाली है
उस पन्ने पर लिखी है
मेरे जीवन की सबसे उम्दा ग़जल
जिसे तुम नहीं पढ़ पाओगे
क्योंकि वो लिखी नहीं गयी
रोशनाई से
क्योंकि वो लिखी नहीं गयी
हर्फों में
क्योंकि वो लिखी नहीं गयी
हिंदी या उर्दू में
वो लिखी गयी थी
दर्द की कलम से
वो लिखी गयी थी
आंसुओं की सियाही से
वो लिखी गयी थी
रात के अँधेरे से
लेकिन तुम्हे वो दिखाई नहीं देगी
क्योंकि उस ग़जल के हर्फ़
पढ़े नहीं
महसूस किये जाते हैं ;
मेरी सबसे उम्दा ग़जल
सिर्फ मेरे लिए है दोस्त
जिसे मैं अक्सर पढता हूँ

बुधवार, 22 सितंबर 2010

बोलते शब्दों की कविता

[ एक प्रयोगात्मक कविता है . टिपण्णी स्वरुप आप भी इसी तरह की चंद पंक्तियाँ जोड़ सकते हैं. मजा आएगा . कोशिश करें. ]

चिलचिलाती धूप
खिलखिलाता बचपन
पिलपिलाता आम
झिलमिलाता आँगन

भिनभिनाती मक्खी
सनसनाती हवा
पिनपिनाती बुढिया
गुनगुनाती फिजा

सुगबुगाती भीड़
दनदनाती गोली
कुलबुलाते कीड़े
फुसफुसाती बोली

चहचहाते पाखी
लहलहाती फसल
जगमगाते दिए
बड़बडाती अकल

तमतमाता चेहरा
चमचमाता घर
लड़खड़ाते कदम
फडफडाते पर

गड़गड़ाते बादल
कडकडाती बिजली
थरथराते होंठ
चुलबुलाती तितली

डगमगाता शराबी
चुहचुहाता तन
लपलपाती जीभ
सकपकाता मन

रविवार, 19 सितंबर 2010

लफंग बन गए हैं दबंग आजकल

सीमा पे अमन देश में है जंग आजकल
घुसपैठिये बना रहे सुरंग आजकल

ऊंचाइयों पे उड़ने का हम ख्वाब देखते
अपने ही अपनी काटते पतंग आजकल

बाहर के दुश्मनों से हम चाहे निपट  भी लें
अपने ही गिरेबान में भुजंग आजकल

जितने गदर्भ देश में , ओहदों पे मस्त है
धोबी के घाट पर खड़े तुरंग आजकल

संस्कार ख़त्म हो चले , अधिकार बच गए
अच्छे नहीं समाज के रंग-ढंग आजकल

छिछोरे - युवा पीढ़ी के आदर्श बन गए
लफंग बन गए हैं दबंग आजकल

शब्दार्थ
[ गदर्भ = गधा / तुरंग = घोडा ]

बुधवार, 15 सितंबर 2010

वैधव्य

कोई चला गया है

सब कुछ बदल गया है ,

अनहोनी हो रही है

वो छड़ी रो रही है ,

आराम कुर्सी थक गयी

आराम करते करते ,

दरवाजा थक गया

इन्तेजार करते करते ,

चश्मा धुंधल गया

आँखों से लड़ते लड़ते ,

पन्ना पलट गया

उन अँगुलियों को पढ़ते ,

गर्मी से परेशान है

ठन्डे पानी का घड़ा ,

थक गया है खम्भा

वर्षों से यूँ खड़ा ,

फिसल रही है काई

अपनी ही फिसलन में ,

खुजला रही दीवारें

खुद अपनी उतरन में ,

चौंधिया गया दिया

अपनी ही लपट से,

सहमा हुआ अँधेरा

खुद अपने कपट से ,

दबा पड़ा दूध

मोटी मलाई से ,

निशान दिख रहे

सूनी कलाई पे ,

क्या आज हो गया है

क्या राज हो गया है ,

श्रृंगार खो रहा है

वैधव्य रो रहा है .

शनिवार, 11 सितंबर 2010

अंतर की ग्रंथियों को खोलो कभी कभी

[ जैन समाज में एक बहुत अच्छी प्रथा है . वर्ष में एक दिन सभी एक दुसरे स मिल कर हाथ जोड़ कर कहते हैं - " मिच्छामी दुक्कड़म " . इस का अर्थ होता है की इस पूरे वर्ष में मेरे किसी भी कार्य या वचन से जाने या अनजाने रूप से आपका दिल दुख हो तो मुझे क्षमा करें . इसी भावना पर आधारित है मेरी ये नयी ग़जल .]



मन को उलट पलट के टटोलो कभी कभी
अंतर की ग्रंथियों को खोलो कभी कभी

कुछ घाव छोटे छोटे नासूर बन न जाये
मरहम लगाके प्यार की धो लो कभी कभी

बातों पे खाक डालो जो चुभ गयी थी दिल में
कुछ जायका बदल के बोलो कभी कभी

कुछ अपने गिरेबां में भी झांक कर देखो
और अपनी गलतियों को तोलो कभी कभी

मन भर ही जाए जो गर अंतर की वेदना से
कहीं बैठ कर अकेले रो लो कभी कभी

शनिवार, 4 सितंबर 2010

मास्टरजी

[ अठारहवीं सदी के अंग्रेजी भाषा के एक प्रसिद्ध कवि ओलिवर गोल्डस्मिथ की एक मशहूर कविता थी - विलेज स्कूल मास्टर . उसी कविता को थोड़े भारतीय परिपेक्ष्य में प्रस्तुत कर रह हूँ , हिंदी में . कविता के नीचे प्रस्तुत है मूल अंग्रेजी की कविता भी . पढ़ कर प्रतिक्रिया जरूर देवें .  ]

    मास्टरजी


एक कच्चे मकान में बसा
गाँव का वो स्कूल
जिसके अहाते में लगे थे
रंग बिरंगे फूल

पढ़ते थे गाँव के बच्चे
यहाँ आकर हर रोज
खेल कूद मस्ती
और खूब मौज

पढ़ाते थे उनको
एक बूढ़े से मास्टरजी
भूगोल इतिहास हिंदी
गणित और अंग्रेजी

कभी थे नरम
कभी थे कठोर
डरते थे उनसे
पढने के चोर

जिस दिन होता उनका 
मूड कुछ ख़राब
लड़के फुसफुसाते
गुस्से में है जनाब

उनको हंसाते
किस्से सुनाते
नकली हंसी हँसते
जब मास्टरजी सुनाते 

गाँव सारा मानता था
उनको धुरंधर
उन सा नहीं था कोई
गाँव के अन्दर

क्या लिखना क्या पढना
जोड़ना घटाना
खेतों के बीघे
नाप कर बताना

बातों में उनका
नहीं कोई सानी
तर्क करने में
थे वो लासानी

करते थे सारे
आश्चार्य इतना
छोटी सी खोपड़ी में
ज्ञान भरा कितना

जब तक रहे, किया
एकछत्र शासन
हो गए रिटायर
ख़त्म अनुशासन


The Village Schoolmaster

Beside yon straggling fence that skirts the वे
With blossom'd furze unprofitably gay,
There, in his noisy mansion, skill'd to rule,
The village master taught his little school;
A man severe he was, and stern to view,
I knew him well, and every truant knew;
Well had the boding tremblers learn'd to trace
The days disasters in his morning face;
Full well they laugh'd with counterfeited glee,
At all his jokes, for many a joke had he:
Full well the busy whisper, circling round,
Convey'd the dismal tidings when he frown'd:
Yet he was kind; or if severe in aught,
The love he bore to learning was in fault.
The village all declar'd how much he knew;
'Twas certain he could write, and cipher too:
Lands he could measure, terms and tides presage,
And e'en the story ran that he could gauge.
In arguing too, the parson own'd his skill,
For e'en though vanquish'd he could argue still;
While words of learned length and thund'ring sound
Amazed the gazing rustics rang'd around;
And still they gaz'd and still the wonder grew,
That one small head could carry all he knew.
But past is all his fame. The very spot
Where many a time he triumph'd is forgot.

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

परिभाषाएं - तीन नन्ही कवितायेँ

बोर

मैंने यूँही पूछ लिया
क्या हाल चाल है
और वो
विस्तार से बताने लगा
कितना बोर है वो

स्मार्ट

एक खाली टैक्सी  वाले  से
एक मूर्खतापूर्ण प्रश्न पूछा मैंने
टैक्सी खाली है ?
उसने मेरी बात का फायदा उठा लिया
बोला - नहीं है
और स्पीड बढ़ा कर भाग निकला
स्मार्ट  था

इंटेलिजेंट


टी टी साहब
एक बर्थ मिलेगी ?
नहीं, कोई खाली नहीं है
सर , जाना बहुत जरूरी है
गांधीजी की कसम
उसने मुझे देखा
बोला- ठीक है चढ़ जाइये,
देखते हैं
इंटेलिजेंट था

सोमवार, 30 अगस्त 2010

मुट्ठी भर रेत

क्षण क्षण चिराग जल रहा
हर वक़्त यह तन गल रहा

हर सांस कुछ ले जा रही
हर वक़्त जीवन जल रहा

हर सुबह उगता एक दिन
हर शाम इक दिन ढल रहा

मुट्ठी में भींचा रेत को
सब कुछ मगर फिसल रहा

चेहरे पे झुर्री आ गयी
परतों में एक एक पल रहा

जो भविष्य था वो तो आज है
वो जो आज था हुआ कल रहा

हम तेज कितना भाग लें
पर काल सब निगल रहा

यूँ ही जिंदगी तो खिसक गयी
अब हाथ बैठा मल रहा

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

सैलाब

कोई  चुपके  से  मेरे कानों  में यूँ कुछ कह गया
आँख के पीछे थमा सारा समंदर बह गया

दर्द की नीवों पे कितने पत्थरों के दुर्ग थे
इक जरा जज्बात के झोंके से सब कुछ ढह गया

मैं समझता था कि मेरा ख़त्म सब कुछ हो चुका
फिर भी सीने में धडकता दिल बेचारा रह गया 

सह ना पाया प्यार के जज्बात के दो बोल मैं 
वक़्त के हालात के चुपचाप थप्पड़ सह गया 

रविवार, 22 अगस्त 2010

कमबख्त जिंदगी

हमको कभी हंसाती है कमबख्त जिंदगी
अक्सर मगर रुलाती है कमबख्त जिंदगी


जो चाहते जीना जिंदगी शाम ढले तक
पहले उन्हें भगाती है कमबख्त जिंदगी


जो मांगते हैं मौत जिंदगी के ग़मजदा
घुट घुट उन्हें जिलाती है कमबख्त जिंदगी


हंसने की चाह में हैं , जो रो रो के जी रहे
आंसू उन्हें पिलाती है कमबख्त जिंदगी


जो सरफिरे करते नहीं परवाहे -जिंदगी
सर पर उन्हें बिठाती है कमबख्त जिंदगी

शनिवार, 21 अगस्त 2010

संपूर्ण समर्पण

अनुभूति तुम , अनुभूत मैं
अविभाव तुम, अविभूत मैं


अनुराग तुम , अनुरक्त मैं
आशक्ति तुम, आशक्त मैं


दुर्लब्ध  तुम, उपलब्ध मैं
हो शब्द तुम, निःशब्द मैं


अभिव्यक्ति तुम , अभिव्यक्त मैं
हो भक्ति तुम , हूँ भक्त मैं

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

चल मेरे भाई खेलें खेल

चल मेरे भाई खेलें खेल
लुक्का छिपी छुक छुक रेल
खूब चटपटी बनती है
खेलों की चल खा लें भेल


खेलें चल किरकेट यहाँ
बनते धन्ना  सेठ यहाँ
कुछ तो घपला हुआ जरूर
एक था मोदी एक थरूर
दोनों का क्यों निकला तेल
चल मेरे भाई खेलें खेल


या फिर चल होकी खेलें
महिलाओं को संग ले ले
बन जाये आशिक ऐसे
कोच बने कौशिक जैसे
करें प्रेम का प्यारा मेल
चल मेरे भाई खेले खेल


चल कोई ऊंचा काम करें
दुनिया भर में नाम करें
खेलें खेल खिलाडी सा
नेता हो कलमाड़ी सा
नीचे वाला जाये जेल
चल मेरे भाई खेलें खेल

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

अतीत - एक शाश्वत सत्य

घडी रुक जाती है
समय नहीं रुकता
भागता रहता है निरंतर
क्षण भर को नहीं मध्यांतर

कितनी तेजी से बदलता है
भविष्य वर्तमान में
वर्तमान अतीत में

भविष्य! एक भ्रम है
जो अज्ञात है वो भ्रम है
वर्तमान एक प्रक्रिया है
एक नए अतीत के निर्माण की
जो बीत रहा है
जो व्यतीत हो रहा है
हाँ, वही तो अतीत हो रहा है

अतीत एक शाश्वत सत्य
जो स्थाई है
जो अपरिवर्तनीय है

अतीत-
समय कि शिलाओं पर
घटनाओं के लेख
घटनाएँ जो बन जाती है हिस्सा
हमारे जीवन का
एक एक दृश्य
जो अंकित हो जाते हैं
हमारे स्मृति पटल पर
हमारा अतीत बन जाता है
एक प्यारा सा एल्बम
जिसे हम पलटते  रहते हैं
अपने एकाकी समय में
मृत्यु पर्यंत 

रविवार, 8 अगस्त 2010

टिपण्णी रुपी भ्रमर

क्यों लिखूं मैं
कौन पढना चाहता है
कौन मेरी भावनाओं के भंवर में
क्यों फसेगा
कौन मरना चाहता है


ब्लॉग सारे
हैं समंदर की लहर से
शब्द उतने
जितना है पानी जलधि में
हर कोई
लहरों पे जैसे छोड़ता है
अपनी कागज की
वो छोटी नाव जैसे
रोज कितनी नाव
जाने है उतरती
रोज जाने नाव कितनी
डूब जाती


कौन किसकी
नाव को देखे संभाले
हर कोई अपनी ही
नैय्या खे रहा है
बिन सुने ही
बिन पढ़े ही
बिन गढ़े ही
एक नन्ही टिपण्णी सी दे रहा है


कुछ बड़े होशियार
ब्लॉगर घूमते हैं
हर नए ब्लॉगर को
टेस्ट करते हैं
एक दिन में एक
टिपण्णी लिख कर
दस जगह फिर
कॉपी पेस्ट करते हैं

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

अपना खयाल रखना

मित्र !
क्या कर रहे हो?
खाली बैठे-
यूँ धुंए के छल्ले बना कर
होठों को गोल करके
हवा में छोड़  रहे हो
हर छल्ला जैसे जैसे आगे बढ़ता है
फैलता जाता है

उसने  कहा
किलिंग टाइम ....
उदास हूँ

मैंने पूछा
किलिंग टाइम
यानि समय का शिकार
बहुत खूब मित्र
तुम समय का शिकार कर रहे हो
या समय तुम्हारा शिकार कर रहा है
यू आर किलिंग योर सेल्फ
खुद को मार रहे हो

झुंझला कर बोला मित्र
तुम्हे क्या ?
खुद को ही मार रहा हूँ ना '
तुम्हे तो नहीं मार रहा ना ?

मुझे ?
मुझे तो तुम अपने आप से पहले मार रहे हो
ये जो है ना तुम्हारा छल्ला
ये मेरी तरफ आते आते
बन जाता है
फांसी का एक फंदा
जिसमे मैं
ना चाहते हुए भी
लटक जाता हूँ
क्योंकि तुम्हारा मित्र हूँ
इसके पहले कि
समय के शिकार कि जगह
तुम मेरा शिकार करो
मैं चलता हूँ, मित्र
अपना खयाल रखना 

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

इस तरह कुछ जियें

आज जीने दो इस कदर मुझको
कल जो मर जाएँ भी तो ग़म न रहे
इस तरह कुछ जियें ज़माने में
कोई ये कह न सके की हम न रहे


रहने को घर की क्या जरूरत है
दिल के कोने में घर बना लेंगे
बस इसी जन्म की यादें काफी
इस के बाद फिर कोई जनम न रहे


सैकड़ों साल यूँही जीने से
चंद खुशियों के दिन ही काफी है
उम्र की शाम ढल चले; पहले
उठ के चल दें ,कोई भरम न रहे


कोई रोता है जब कोई मरता
बस ये रस्मों रवाज ऐसे हैं
हर कोई हंस के विदाई दे दे
आँख जरा सी भी कोई नम न रहे

बुधवार, 4 अगस्त 2010

बिखरा और छितराया मन

मिलने को व्याकुल था कितना ,
फिर भी क्यों कतराया मन
मैं ही झुकता जाऊं क्योंकर ,
यह कह कर इतराया मन .

चाहत बिखरी कण कण में थी  ,
इच्छाएं पल पल में थी
सब कुछ पाने की ख्वाहिश में
बिखरा और छितराया मन

फूलों की चाहत में कितनी
खुशियाँ दिल में बसती थी
अब फूलों के बीच खड़ा मैं 
जाने क्यों मुरझाया मन 

यह कर लूं मैं , वह कर लूं मैं 
सपने हरदम बुनता था 
करने का कुछ वक़्त हुआ तो 
क्यों सोया सुस्ताया मन 

जब तक थे अवसर मन घूमा- 
फिरता था आवारा सा 
छूट गयी जब डोर समय की 
अब है क्यों पछताया मन

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

पूरा जीवन एक चलचित्र है

हर पल
कोई भी पल
कभी मरता नहीं 
बीत जाता है 
ख़त्म नहीं होता 

वास्तव में 
हर पल वहीँ रहता है 
जहाँ वो था 
हम  ही आगे बढ़ जाते हैं
हम ही बीत जाते हैं 
हम ही ख़त्म होते रहते हैं 
हर दिन 
हर पल 

कभी पीछे मुड़ के देखो
तो नजर आयेंगे 
वो तमाम पल 
जिन्हें हम समझते थे 
कि ख़त्म हो गए हैं 
वे पल छिपे होते हैं 
कहीं ना कहीं 

कुछ धुंधले ख्वाबों में 
कुछ स्कूल की किताबों में 
कुछ पुराने कपड़ों में 
कुछ आकाश   को तकती छत में 
कुछ तुड़े मुड़े पुराने ख़त में 
कुछ पुराने बिना तार वाले गिटार में 
कुछ कमरों के बीच खुलने वाले किवाड़ में 

ये पल बड़े विचित्र हैं 
आँखे मूँद कर देखो 
हर पल एक चित्र है 
दिल के परदे पर देख 
पूरा जीवन एक चलचित्र है     

सोमवार, 26 जुलाई 2010

जिंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात






मुंबई जुलाई २६, २००५


जिंदगी भर नहीं भूलेगी
वो बरसात की रात
जानलेवा थी वो वर्षा
बुरे हालात की रात

दफ्तरों से तो निकलना हुआ उस दिन सबका
घर नहीं पहुंचा कोई चाहे हो निकला कब का
खड़े पानी में सभी लोगों की
इक जमात की रात

डूबते देखे वो रस्तों पे गाड़ियों के काफिले
मरते देखे सड़क पे इन्सां जैसे हो बुलबुले
क़यामत का दिन है - ऐसे ही
खयालात की रात

लोग मेहमान थे उस रात किसी अनजाने के
ऐसा लगता था की सब थे जाने पहचाने से
जात मजहब से अलग हो रही
वो मुलाकात की रात

था बुरा सब कुछ मगर कुछ हुआ अच्छा भी था
था सुखी जो भी वो उसदिन हुआ सच्चा भी था
एक दूजे के लिए दर्द और
जज्बात की रात

रविवार, 25 जुलाई 2010

समर्पित जोन कीट्स को

बहुत सालों के बाद

निकला हूँ शहर से बाहर
अपनी गाडी में बैठ कर
एक छोटे बच्चे सा उत्साह लिए
गाडी अभी तक मोहल्ले से निकली भी नहीं
और मन ने कल्पना शुरू कर दी
हरे भरे खेतों की
सड़क के किनारे खड़े दरख्तों की
खुले आसमान की
पंक्षियों के कलरव की
गाँव के बच्चों के झुण्ड की
रस्ते में आने वाले पनघट की

सोचता हूँ कुछ रास्ता तय होने के बाद
किसी ढाबे पर रुक कर चाय पीऊँगा
मसाले वाली
कल्पना करते करते काफी समय निकल गया
लेकिन ये शहर तो -
ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा
आखिर झुंझला कर पूछा
ड्राईवर से - क्यों भैया
शहर से बाहर ही जा रहे हो न ?
ड्राईवर ने कहा - साहब , शहर से बाहर तो कब के आ चुके
कुछ समझ में नहीं आया


पूछा- अरे भाई , शहर कहाँ ख़त्म हुआ ?
कोई खेत नहीं,
कोई गाँव नहीं
कोई पनघट नहीं
कोई ढाबा नहीं
वो हंस के बोला -
साहब , लगता है कभी बाहर निकले नहीं
सर, मुंबई के बाहर ये सब कहाँ मिलेगा
मुंबई के बाहर यही गाँव है
पक्की इमारतें
सड़क के किनारे होटल
दारू के अड्डे
और टायर पंक्चर की दुकाने
जहाँ लोकल नहीं पहुँचती समझो गाँव है
और इस प्रकार मुझे समझा दिया
गाँव का असली मतलब
उस ड्राईवर ने


और तभी मुझे याद आयी
अंग्रेजी के मशहूर कवि जोन कीट्स की एक रचना
जिसका शीर्षक था -
'वो जो बहुत लम्बे समय से शहर के घेरे में था'**
जिसमे कवि एक दिन शहर के बाहर बिता कर लौटता है
खुले नीले आसमान और
घनी हरी भरी घास की स्मृतियों के साथ
पृकृति के साथ बिताया वो दिन
उसे लगता है कितनी जल्दी ख़त्म हो गया
और उस एक दिन ने
जन्म दे दिया एक खूबसूरत कविता को


अच्छा हुआ तुम पैदा नहीं हुए इक्कीसवी सदी में
और मुंबई में
वर्ना विश्व वंचित रह जाता एक महान कवि से






**To One who has been Long in City Pent

To one who has been long in city pent,
'Tis very sweet to look into the fair
And open face of heaven,--to breathe a prayer
Full in the smile of the blue firmament.
Who is more happy, when, with heart's content,
Fatigued he sinks into some pleasant lair
Of wavy grass, and reads a debonair
And gentle tale of love and languishment?
Returning home at evening, with an ear
Catching the notes of Philomel,--an eye
Watching the sailing cloudlet's bright career,
He mourns that day so soon has glided by:
E'en like the passage of an angel's tear
That falls through the clear ether silently.

[By John Keats (1795-1821) ]

शनिवार, 24 जुलाई 2010

अपने आप से बातें

























मैं अपने आप से बातें करता रहता हूँ

अपना साथी खुद बन जाता
सुख दुःख की सब बातें कहता
सुख दुःख की सब बातें सुनता
फिर मन के घोड़े पर चढ़  कर
मैं चाहूं जहाँ चला जाता

मैं अपने आप से बातें करता रहता हूँ

' तू कौन?'- कभी यह प्रश्न किया खुद से
'मैं कौन ?' - प्रश्न ही उत्तर बन आया
कितना साधारण प्रश्न किया मैंने
कितना मुश्किल उत्तर पाया मैंने
क्या मैं हूँ - वो जो नाम मेरा लिखा
पर वह तो बस एक शब्द मुझे दिखा
मैं शब्द नहीं , बस नाम नहीं हूँ मैं
'मैं कौन?;- प्रश्न वैसा ही खड़ा रहा

मैं अपने आप से बातें करता रहता हूँ

दर्पण के अन्दर जो है खड़ा हुआ
वह ही तो 'मैं हूँ ' - ऐसा ही तो दिखता  हूँ
पर वह तो इक परछाई है - फिर प्रश्न उठा
जब तक दर्पण तब तक ही बस परछाई है

' इतना लम्बा चौड़ा तन ही तो बस तू है '
अन्दर से फिर आवाज कोई आयी
' यह मैं हूँ'- तो फिर ढूंढ रहा है कौन ?
'यह मैं हूँ' - तो फिर प्रश्न पूछता कौन ?

मेरे अन्दर क्या है - यह मुझको पता नहीं
मेरे अन्दर क्या क्या घटता कुछ पता नहीं
कैसे  साँसे अन्दर जाती बाहर आती
कब तक आती कब तक जाती यह पता नहीं
कैसे तन के अन्दर शोणित बहता रहता
कैसे दिल धड़क धड़क के कुछ कहता रहता
कैसे सब कुछ चलते चलते फिर रुक जाता
कैसे यह तन सूखी डाली सा झुक जाता

क्या बस शरीर के रहने तक ही मैं रहता
क्या इसके आगे फिर मेरा अस्तित्व नहीं
क्या इसके आगे इन प्रश्नों का अर्थ नहीं
इतना ही है तो यह जीवन क्या व्यर्थ नहीं

कितने सारे प्रश्नों की झड़ी लगा डाली
मैंने खुद को ही उलझन में है डाल लिया
अब बहुत हो चुकी खुद से खुद की बात बहुत
कह कर अपने प्रश्नों को खुद ही टाल लिया

खुद से बातें करना कितना अच्छा लगता
पल भर को भी तन्हाई पास नहीं आती
पर खुद से इतने जटिल प्रश्न भी मत करना
खुद को खुद की सच्चाई रास नहीं आती

मैं अपने आप से बातें करता रहता हूँ


 

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

डरा डरा आदमी

रात के अँधेरे में
डरा डरा आदमी
अंगुली पकड़ के चल रहा
मन के भय के भूत की
डरता है मन क्यों?
शायद अँधेरे से !

फिर बिजली जब कड़कती है
अँधेरा भाग खड़ा होता है
पर मन का भय
भागने की जगह
अट्टहास सुनकर
और बड़ा होता है
मन शायद डरता है -
शायद आवाज से !

अब सब कुछ शांत है
मौन सब , निस्तब्ध  सब
तब भी अशांत है
आदमी का मन क्यों?
अब डर की बात क्या ?
शायद भयभीत है -
इस गहन मौन से !

प्रश्न खड़ा रह गया
आखिर भयभीत क्यों ?
रात के अँधेरे में ,
दामिनी की चमक में ,
गरजती आवाज में ,
परम गहन चुप्पी में
आदमी के मन में
भय इतना गहरा क्यों?

शहरों की सड़कों पर
शेर नहीं होते हैं
सांप नहीं होते है
और नहीं होता है
जंगली कोई जानवर
निःसंदेह सत्य है
आदमी नहीं डरता
शहर की सड़कों पर
जंगल के जीव से

प्रश्न अब कठिन है
प्रश्न है सरल भी
प्रश्न आदमी है
उत्तर भी आदमी है
रात के अँधेरे में
शहर की सड़क पर
आदमी बस डरता है
आदमी की जात से

लिखो कुछ और तुम

दर्द की कविता मत लिखो
कोई लेने वाला नहीं है
कागजों में मत ढूंढो दवा
कोई देने वाला नहीं है

देंगे सब झूठी तसल्ली
और झूठी आह भी
शेर अच्छा ना लगा तो
देंगे झूठी वाह भी

फायदा क्या शब्द को
कलम बना कर
आंसुओं की दवात में
गहरा डुबा कर

चंद रोते ओ बिलखते
शेर लिख कर
बेचारा, मासूम,
परेशान दिख कर

लोग तो पढ़ते हैं
टाइम पास को
है कहाँ टाइम
कि दें  उदास को

लिखना ही है
तो लिखो कुछ और तुम
कुछ रूमानी,
आसमानी छोर तुम

या तो जो
दिल को जरा सहला सके
या किसी को
जो समझ ना आ सके

रविवार, 18 जुलाई 2010

माफ़ करना मेरे बददिमाग पडोसी

क्या चाहता है आखिर
ये मुआ पाकिस्तान
भाई बन के ना रह सके
एक अच्छा पडोसी तो बनते
अपनी लुंगी इनसे संभलती नहीं
दूसरों की धोती खींचते हैं
कभी बात चीत के लिए बुलाते हैं
बुला कर  दांत भींचते हैं
अपनी समस्याओं से लड़ने की जगह
अपनी अक्ल से लड़ते हैं
अमरीका जब धमकाता है
वहीँ भाग पड़ते हैं
बलूचिस्तान को सँभालने की जगह
कश्मीर को समस्या बताते हैं
भारत के सैनिकों  पर वश नहीं चलता
भारत के गरीब मछुआरों को पकड़ के सताते हैं  
जो तुम्हारा है ही नहीं
वो तुम्हारी समस्या कैसे हो गया
शायद यही तुम्हारी समस्या है
जो तुम्हारा नहीं
उसे पाने का ख्वाब देखना
जो तुम्हारा है
उस से हाथ खींचना
मुंबई हमले के बदमाशों को ऐसे बचा रहे हो
जैसे तुम्हारे देश के हीरो हैं
माफ़ करना मेरे बददिमाग पडोसी
तुम्हारे सियासतदान सब जीरो है

शनिवार, 17 जुलाई 2010

जिनको मिलें हैं दर्द ,बड़े खुशनसीब हैं

जिंदगी का दर्द से रिश्ता अजीब है
आँखों से आंसुओं की तरह बस करीब है

वो चाहते ही क्या जो अधूरी ना रह गयी
जिसको मिला है सब वही सबसे गरीब है

जो खुरदरी जमीं को ना महसूस कर सका
उसका नरम बिछोना ही उसका सलीब है

कैसे सुखी हैं लोग जिन्हें कोई ग़म नहीं
जिनको मिलें हैं दर्द ,बड़े खुशनसीब हैं

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

खिड़की के बाहर की दुनिया

मेरे कमरे के पूरब में एक खिड़की है
जिससे सूरज छन छन कर आया करता था
अपनी किरणों से सर मेरा सहला कर
तडके ही मुझको रोज जगाया करता था

कमरे के दक्षिण में भी एक खिड़की है
जिसके बाहर एक नीम पेड़ का झुरमुट था
जब दूर क्षितिज पर सूरज अस्त हुआ करता
कलरव करता चिड़ियों का उस पर जमघट था

पूनम की रातों को मेरे कमरे में
दूधिया चांदनी खिड़की से भर आती थी
बरसातों में इक इन्द्रधनुष का टुकड़ा
दिखता, जब बूँदें गीत सुनाती थी

ये सब बातें इतिहास हो चुकी है अब तो
अब पहले जैसा नहीं रहा मेरा कमरा
कमरे के बाहर सब कुछ बदल गया है अब
कहने को अब भी है वो ही मेरा कमरा

पूरब की खिड़की के बाहर अब दिखती है
दस मंजिल से भी ऊंची एक इमारत अब
सूरज,चंदा,किरणे,पानी और इन्द्रधनुष
शहरों के जीवन में बन गए तिजारत सब

दक्षिण की खिड़की के बाहर का नीम पेड़
बेदर्दी से जाने किसने है काट दिया
वो झुरमुट, वो जमघट , चिड़ियों का कोलाहल
जैसे जमीन के अन्दर ही है गाड़ दिया

मुझसे बिन पूछे लूट ले गए मुझसे वो
वो मेरे कमरे में छाई मेरी खुशियाँ
मेरे हिस्से का आसमान भी छीन लिया
मुझसे छीनी खिड़की के बाहर की दुनिया

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

बूँद सी जिंदगी

वर्षा की एक बूँद
जल का छोटा सा कण
नन्हा अस्तित्व पर
कितनी बड़ी प्रेरणा

खेत में किसान जब
डालता है बीजों को
खून और पसीने सी
तन मन की चीजों को

मन में एक प्रार्थना
उसके गूंजती रहती
ईश्वर! दे वृष्टि अब
ईश्वर! दे बूँद अब

गर्मी की प्यास से
तन मन निढाल हो
तन जब निर्जीव सा
सुस्त मंद चाल हो

वर्षा की एक बूँद
होठों पे गिरती है
निर्जीव तन मन में
नया प्राण भरती है

गर्म गर्म पत्थर  पर
बूँद जब उतरती है
गर्म तप्त स्पर्श से
अणु सी बिखरती है 

पत्थर की आग में
ऐसे झुलसती है
स्वयं को समाप्त कर
शीतलता भरती है

बूँद कितनी सुन्दर है
बूँद खूबसूरत है
बूँद सिर्फ जल नहीं
माणिक की मूरत है

सूरज की किरणे जब
बूंदों पर पड़ती है
आकाश कैनवास
रंग कितने भरती है

सीपी के मुख में जब
बूँद एक गिरती है
चमत्कार होता है
बूँद बने मोती है

काम ऐसे कर चलें
फिर चाहे मार चलें
बूँद जैसे अश्रु सारी
आँखों में भर चलें

बूँद सी ही जिंदगी
हम सब को चाहिए
ना हो विराट भले
अर्थपूर्ण चाहिए

रविवार, 27 जून 2010

फ़ुटबाल विश्व कप

चमड़े की एक छोटी से गेंद
जिसमे रबर की एक थैली
उसमे भरी पूरी हवा
और लो बन गया फुटबाल
मारी  ठोकर जूते से
और फुटबाल हवा में
लगता है चढ़े ही जा रही है , चढ़े ही जा रही है
और उस के साथ हजारों  लाखों की निगाहें
भी ऊपर जा रही है
फिर आती है फुटबाल नीचे
और उसके साथ साथ लाखों निगाहें .
लोग ढूंढ रहे थे उसे ज़मीन पर
लेकिन इस बीच उस पीली जर्सी वाले ने
एक छलांग लगाई हवा में
और झेल लिया उसे अपने सर पर
कुछ इस अदा से कि वो घूम गयी
गोलकीपर की दिशा में
गोलकीपर उछला दायें
बाल गयी बाएं
और लो हो गया गोल
सारे स्टेडियम में खड़े हो गए लाखों लोग
आधे हवा में उछलते, चिल्लाते
बाकी आधे अपने सर पकड़ कर कोसते
पूरे साउथ अफ्रीका में यही माहोल बिखर गया
और बिखर  गया यही माहोल
ब्राजील में, मेक्सिको में, पुर्तगाल में , जर्मनी में
रूस में ,ग्रीस में, कोरिया में , भारत में
और सैंकड़ों देशों में
जिन्हें हम जानते हैं सिर्फ फुटबाल के लिए
टेलीविजन का कीमती समय
पूरा लग गया समीक्षा में
रेडियो इंटरनेट अखबार
भर गए इस गोल की चर्चा में
सारा विश्व दफ्तर में , घर में,
भोजन में ,यात्रा में
पूछ रहा जाने अनजाने लोगों से
विश्व कप में क्या हुआ आज?

है ना मजेदार बात
कितनी महत्वपूर्ण हो गयी
वो चमड़े की गेंद
या उसके अन्दर भरी हवा
या फिर वो करारी लात
या फिर वो सर पर झेला गया पतन
लेकिन शायद नहीं ,
ये सारी बातें जुडी थी
एक चुनौती से
अपने देश के स्वाभिमान से
उद्देश्य कैसा भी हो
कितना महत्वपूर्ण हो जाता है
जब बात जुडी हो स्वदेश से    

रविवार, 20 जून 2010

गुब्बारे सिर्फ रोटी हैं

सड़क पर बेच रहा है गुब्बारे
एक छोटा बच्चा !
लाल हरे पीले गुब्बारे
गुलाबी बैंगनी नीले गुब्बारे
गोल गुब्बारे लम्बे गुब्बारे
और कुछ नए किस्म के
दिलनुमा गुब्बारे

मैं अब तक समझता था
गुब्बारे प्रतीक है
ख़ुशी का, दावत का, जन्मदिन का , सपनों का
लेकिन आज जब मैंने झाँका
उस बच्चे की उदास आँखों में
तो सारे माने बदल गए
वो  सब कुछ नहीं
जो मैं समझता था

गुब्बारे सिर्फ रोटी हैं
गुब्बारे सिर्फ पैसे हैं
गुब्बारों में भरी हवा
इस बच्चे के पेट से निकली लपटें हैं
जिन पर यह सेक रहा है
अपने लिए रोटियां

काश! सब कुछ बादल जाए
और ये गुब्बारे बन जाए
फिर से
नन्हे नन्हे सपने
इस बच्चे के लिए
सब बच्चों के लिए

शनिवार, 19 जून 2010

टिकट लेके मिले ऐसे दर्शन नहीं चाहिये

आइये हम चलायें एक नया मजहब
जिसमे इंसान रहें इंसानों की तरह सब
ऐसा धर्म जो प्यार के सागर बहाए
ऐसा धर्म जो इंसान से इंसान को मिलाये

धर्म जिसमे मस्जिद की दीवालें ना हो
मंदिर गिरजे गुरूद्वारे शिवाले ना हो
धर्म जिसमे तन पर पहचान के प्रतीक ना हो
धर्म जिसमे दान के नाम पर भीख ना हो

पंडो की पूजा का कर्म नहीं चाहिए
झंडो की पूजा का धर्म  नहीं चाहिए
पाप कर के धोने वाली गंगा नहीं चाहिए
मुहर्रम रामनवमी का दंगा नहीं चाहिए

जीवों की बलि वाले देव नहीं चाहिए
खून में नहाये ऐसे देव नहीं चाहिए
अछूतों का  निषेध- ऐसे द्वार नहीं चाहिए
चंदे  के नाम पर व्यापार नहीं चाहिए

टिकट लेके मिले ऐसे दर्शन नहीं चाहिये
पंडों की तृप्ति वाला तर्पण नहीं चाहिए
ईश्वर की सेवा में चढ़ावे नहीं चाहिए
भक्ति के नाम पर दिखावे नहीं चाहिए

आपस में लडावे ऐसे वचन नहीं चाहिए
संकुचित भावों के प्रवचन नहीं चाहिए
मजहब के नाम पर जेहाद नहीं चाहिए
खून बन के रिसे वो मवाद नहीं चाहिए

कथनी ही कहे ऐसे ग्रन्थ नहीं चाहिए
करनी में फर्क ऐसे पंथ नहीं चाहिए
शाश्त्रों के शब्दों पर हठ नहीं चाहिए
पापों को शरण दे वो मठ नहीं चाहिए

भगवे में ठगने वाले संत नहीं चाहिए
सम्पति से चिपके महंत नहीं चाहिए
जादू से आने वाली भस्म नहीं चाहिए
गांजा चढाने वाली रस्म नहीं चाहिए

ईश्वर ने बनाये सिर्फ मानव हैं
मानव  ने बनाये किन्तु दानव हैं
हमने बना दिए इतने सारे मजहब
जिनके नीचे ईश्वर का मानव गया दब

हर मजहब ने बना दिए अपने कुछ कानून
कानूनों  ने पैदा किये धर्म के जूनून
जुनूनों से बह निकले खून के नाले
इंसान का नहीं, हुआ इंसानियत का खून

धर्म एक चलावें जिस में प्यार की ही पूजा हो
ईश्वर हो एक कोई, देव नहीं दूजा हो
कर्म जिसका केवल व्यवहार की सरलता हो
दूसरों के कष्ट देख आँख में तरलता हो

भजनों में गीत की संगीत की मिठास हो
हर किसी को देख परिवार का आभास हो
'वसुधैव कुटुम्बकम'* को माने वो समाज हो
सेवा सहयोग इस समाज का रिवाज हो

*['वसुधैव कुटुम्बकम' = विश्व मेरा परिवार ]

शुक्रवार, 18 जून 2010

हम दिन भर कितनी बातें करते रहते हैं

हम दिन भर कितनी बातें करते रहते हैं
उतनी ही बातें औरों की सहते रहते हैं

मीठी बातें, खट्टी बातें .प्यारी बातें, खारी बातें
सुख की बातें, दुःख की बातें ,करते कितनी सारी बातें
हम अपने कानों में क्या कुछ भरते रहते हैं

कभी कभी ज्ञानी बन कर करते ऊँची बातें
और कभी हलके बन कर करते ओछी बातें
औरों की बुद्धि तुला पर हम तुलते रहते हैं

कभी खुद की खातिर थोडा वक़्त निकालो
खुद को कह लो, खुद को सुन लो , समझा लो
हम अपने आप से जाने क्यों डरते रहते हैं

खुद की बातों से ही हम खुद को जान सकेंगे
हम अपने जीवन को बेहतर पहचान सकेंगे
औरों  के संग तो आडम्बर करते रहते हैं

गुरुवार, 17 जून 2010

मेज थपथपाओ मृदंग की तरह

उड़ चला है आज मन पतंग की तरह
बचपन की भोली उमंग की तरह

ज्ञान ध्यान ओहदों को छोड़ किसी दिन
मस्त होके गाओ मलंग की तरह

मर मर के जीने की चाह छोड़ दो
और जियो जीने के ढंग की तरह

जीवन को दर्शन का लेख मत कहो
जीवन है हास्य भरे व्यंग की तरह

खेलो गुलाल फाग साल में इक दिन
रंगों में मिल जाओ रंग की तरह

शाम को तनाव का चश्मा उतार कर
मेज थपथपाओ मृदंग की तरह

बुधवार, 16 जून 2010

ताजे टमाटर

थोडा सा जायका बदलें . एक मित्र ने एक sms भेजा कुछ दिनों पहले. बहुत मजा आया पढ़ कर. उसी को एक लघु कथा का रूप दे रहा हूँ.
एक भिखारी भीख मांग रहा था - ' खाने को रोटी दे दो .....खाने को रोटी दे दो ......'
लोग सुन रहे थे लेकिन कोई ध्यान ही नहीं दे रहा था . एक सज्जन बाजार से निकल रहे थे , सब्जी भाजी खरीद कर. उस भिखारी की पुकार सुन कर रुक गए उसके पास.
भिखारी फिर बोला-' भूखा हूँ , खाने को रोटी दे दो ....'
सज्जन बड़े आराम से बोले - 'टमाटर खाओ' .
भिखारी बोला- 'साहब क्यों मजाक करते हो , मुझे तो एक रोटी ही दे दो .'
सज्जन बोले -' बोला ना , टमाटर खाओ '
भिखारी ने सोचा की ये साहब बाजार से ताजे टमाटर खरीद कर आ रहें हैं , इस लिए टमाटर देना चाहते हैं. भिखारी बोला- ' ठीक है साहब , टमाटर दीजिये '
सज्जन गरम हो कर बोले- ' त्या बतते हो , अब तमा तर भी मैं ही दूं तुमतो '
जी हाँ श्रीमान तुतला कर बोलते थे . क्यों, आया ना मजा ?

सोमवार, 14 जून 2010

घर इंटों की ईमारत का नाम नहीं

घर इंटों की ईमारत का नाम नहीं
घर जमीन की तिजारत का नाम नहीं
घर नहीं है एक चमचमाता म्यूजियम
घर नहीं है सोने के लिए एक वेटिंग रूम
घर नहीं है टेलीफोन पर रूम सर्विस
घर नहीं है -
मतलबी मुस्कान और बचे हुए पैसों की टिप्स
ईंट पत्थर के निर्माण को घर नहीं कहते
ऐसा होता तो मकबरों में भी लोग रहते

घर एक सजीव रचना है
जिसमे प्राण होते हैं
जिसका दिल धडकता है
जिसमे भावनाएं होती हैं
जिसमे कामनाएं होती हैं
जिसमे अपने होते हैं
जिसमे सपने होते हैं

पर्व और त्योहारों पर हँसता है घर
दुःख और विपत्ति में उदास होता है
हमारे ग़म में ग़मगीन होता है घर
हमारे सुख में शरीक होता है

घर की नींव में होता है विश्वास का पत्थर
घर की दीवारें सहयोग की इंटों से बनती हैं
जिन पर त्याग और सच्चाई का रंग रोगन होता है
जिन पर सुरक्षा की छत टिकी होती है

घर एक रसोई है ,
जिसमे परिश्रम का चूल्हा जलता है
घर एक मंदिर है
जिसमे श्रद्धा का दीपक जलता है

घर के दरवाजे
प्रतीक्षा की लकड़ी से बने होते हैं
घर की चौखट   में
स्वागत के फूल खिलें होते हैं

थके हारे दिन के लिए चाय का प्याला है घर
स्कूल से भूखे लौटे बच्चों के लिए निवाला है घर
तनाव से भरे सर पर अँगुलियों का अहसास है
और तपती दोपहरी में ठन्डे पानी का गिलास है

प्यार है घर , ममता है घर
समर्पण है घर , समता है घर
करुणा है घर , संतोष है घर
आस्था है घर, श्रद्धा है घर
विश्वास है घर , एहसास है घर
उत्साह है घर ,आभास है घर
मुस्कान है घर , सन्मान है घर
अभिमान नहीं , स्वाभिमान है घर

चांदी रूप चमकीला नहीं करती

ओस की बूंदे कभी गीला नहीं करती
सूर्य की किरणे कभी पीला नहीं करती

आसमां के रंग से सागर लगे नीला
नील बदली जल कभी नीला नहीं करती

चांदनी का रंग चाँदी से नहीं बनता
और चांदी रूप चमकीला नहीं करती

स्वर्ण के बिन भी चमकते लोग चेहरे से
स्वर्ण की आभा ही दमकीला नहीं करती

रविवार, 13 जून 2010

मानसून

धरती थी तपती
राम राम जपती
झुलस रहा दिन
घंटे गिन गिन
उमस भरी  रात
तारों से बात 
गस खाके घूमी
जैसे ही भूमि

प्यास है ज्यादा
पानी है कम
अम्बर की ऑंखें
तब हुई नम
सूरज भी पिघला
ठन्डे से निकला
हवा भी जागी
मंद मंद भागी

घबरा के बादल
हो गया पागल
छिड़का जब पानी
तब धरती रानी
थोडा सा जागी
बेहोशी भागी
बिजली तब कडकी
सूरज पर भड़की

मारोगे इसको
अब यहाँ से खिसको
सुन बादल प्यारे
और छींटे मारें
और फिर जग में
धरती की रग में
दौड़  उठा खून
बन  मानसून

शनिवार, 12 जून 2010

दर्द को साथी बना कर देखिये

जिंदगी के ग़म भुला कर देखिये
दर्द को साथी बना कर देखिये

दूसरों के कष्ट को अपना समझ
एक क्षण भर तिलमिला कर देखिये

भूल कर अपनी व्यथाओं की चुभन
एक रोते को हंसा कर देखिये

अजनबी भी सामने आ जाये तो
दोस्ती से मुस्कुरा कर देखिये

ये जहाँ संगीतमय लगने लगेगा
कोई नगमा गुनगुना  कर देखिये

एक अँधेरे रास्ते पर भूल के डर
जोर से सीटी बजा कर देखिये

शुक्रवार, 11 जून 2010

आदमी

निकलो जो खोजने नहीं मिलता है आदमी
यूँ दर बदर फिरते कई हजार आदमी

कितना सुखी है जानवर उसको पता नहीं
रोटी की दौड़ में लगा लाचार आदमी

पैसा कमा लिया बहुत सेहत के दाम पर
पैसा बहा रहा है अब बीमार आदमी

आराम से जीने के सब साधन जुटा लिए
जीने को वक़्त का है तलबगार आदमी

कुत्ते की वफादारी है काबिल मिसाल के
कुत्ता  है पर नहीं है वफादार आदमी

अपना शिकार मार कर खाता है जानवर
खाता है रोटी छीन कर 'खुद्दार' आदमी

मंडी में सारे माल के कुछ दाम है मगर
बेदाम के खड़ा सरे बाजार आदमी

अपनी बनाई सभ्यता की भंवर में फंसा
मरता है झूठी शान की मझदार आदमी

दुनिया की भीड़ भाड़ में चेहरे अलग अलग
संसार तो नाटक है , बस किरदार आदमी  
 

Union Carbide Rap


Listen to a musical outrage on Bhopal Gas Disaster

गुरुवार, 10 जून 2010

मन और जीवन

जो चाहो वो हो ना पाता. ना चाहो वो होता -जीवन
मन की इच्छाओं को भूल  जा, हर दिन  इक समझौता - जीवन 

कभी मेघ को देख गगन में मन मयूर खिल खिल जाता है
लेकिन फिर तूफानी अंधड़, बस्ती कई डुबोता - जीवन

कभी ह्रदय की कोमल बातें बन कर कविता बहना चाहे
तभी सामने कोई पहुँच कर अपनी पीड़ा  रोता - जीवन

कभी किसी छुट्टी के दिन बस, मन कहता विश्राम करेंगे
तभी पडोसी की बुढिया माँ, मर जाती , ये होता -जीवन

अपने मन की करनी हो तो , मन में अपना कुछ मत सोचो
जो होता है हो जाने दो ,ये उपाय इकलौता - जीवन

बुधवार, 9 जून 2010

इति भोपाल प्रकरणम !!!

सोचता हूँ
क्या वो बड़ी त्रासदी थी ,जो १९८४ में हुई थी
या फिर वो जो उसके बाद हुई है पच्चीस सालों में
उस त्रासदी में एक शहर चपेट में था , भोपाल
एक खतरनाक गैस का बुन गया जाल ,
जो रात भर में हजारों घरों में पहुंची
और सोये हुए इंसानों के फेफड़ों में
जहर बन के जा घुसी

जो खुशकिस्मत थे सोये रह गए
बाकी बच गए
एक खौफनाक जिंदगी जीने के लिए
हवा पानी मिटटी फसल पशु
सब कुछ जहर बन गया
दिसंबर दो का वो दिन कहर बन गया

लेकिन उसके बाद हुये  शुरू
सरकारी तमाशे
घडियाली आंसुओं के बीच
बटने लगे बताशे
जिसे पकड़ा जाना था उसी दिन
वो वारन एन्डरसन
भगा दिया गया सरकारी विमान में
पहुँच गया अपने वतन
आज वो मौज में है
कहीं छुप कर नहीं
अमरीका की नाक न्यू योर्क में

सरकार ने ले ली कमान
या समझो खोल दी दुकान
पीड़ितों को न्याय दिलाने की
दो लाख जन्मे अजन्मे बच्चे
आठ लाख वयस्क ,जो मर गए तीन दिसम्बर को
बारह लाख जो मरते रहे किस्तों में
और असंख्य जो अब भी चुका रहें किस्ते
मरने तक की

सरकार ने फाइल सलटा दी
सैन्तालिश करोड़ डॉलर लेकर
और बन गयी दिलदार दिलासे देकर
लेकिन वो पैसा गया कहाँ
विधवाओं की शुरुवाती पेंसन दो सौ रुपैये महीने में ?
कम आय वालों  का फ़ाइनल निपटारा  पंद्रह सौ रुपैये में ?
और आखिर में
मरने वालों का फुल और फ़ाइनल औसत बासठ हजार
न मर पाने वालों का पच्चीस हजार
सवा दस लाख क्लैमों में
आधे निपट गए बिन पैसों के
क्योंकि वो गरीब सिद्ध नहीं कर पाए
कि उनके भी दर्द थे बाकी आधे जैसों के

यह था सरकारी न्याय आर्थिक रूप से
और जो बचा था गैर-जिम्मेवारी का दंड
उसका भी फैसला आखिर हो ही गया
भोपाल की कचहरी में , आज दो हजार दस में
सरकार की मंशा का मसला
जाहिर हो ही गया
दो दो साल की सजा कुछ बड़े लोगों को
जो उन्हें होनी नहीं इस जीवन काल में
जमानत ,तारीखें, अपील होती रहेंगी हर हाल में


और इस सरकारी त्रासदी के अन - उत्तरित प्रश्न
किसने भगाया वारन एन्डरसन को
और फिर क्यों नहीं माँगा गया वो अमरीका से
किसने दबा दी इनक्वारी की फाइल
कहाँ गए बचे हुए हजार करोड़ रुपैये
क्या मिला पीड़ितों की प्रभावित नस्लों को
क्यों नहीं दण्डित हुआ कोई

त्रासदी यह है मित्रों !
इस देश में इंसान की कीमत बहुत सस्ती है
और उस से भी सस्ती हमारे नेताओं की मानसिकता .
इति भोपाल प्रकरणम !!!

मंगलवार, 8 जून 2010

आईने में

अपना चेहरा जब भी देखा आईने में ,
कितना झूठा पाया खुद को आईने में .

झूठी शान दिखाता रहता दुनिया में ,
कितना हल्का खुद को लगता आईने में .

दुनिया कहती मुझको मैं कोई फ़रिश्ता हूँ ,
खुद को मैं क्यों पापी लगता आईने में .

अकड़ा फिरता हूँ ऊँची इज्जत की धुन में ,
बस नाटक सा करता दिखता आईने में .

शनिवार, 5 जून 2010

वक़्त

हम वक़्त से लड़ते रहे हर वक़्त बेवजह
पर वक़्त तो चलता रहा हर वक़्त बेवजह

हम बांध पाए कब समय का एक भी लम्हा
बांधी कलाई पर घडी हर वक़्त बेवजह

हम हर समय कहते, अभी तो वक़्त नहीं है
था वक़्त हर दम वक़्त , हम बेवक्त  बेवजह

हम सोचते रहते, वक़्त क्यों बीत रहा है
इस सोचने में बीत गया वक़्त बेवजह

हर जिंदगी दीवार पर लटकी हुई घडी
रुक जाये सांसों कि सुई किस वक़्त बेवजह

शुक्रवार, 4 जून 2010

कैंसर

संदेह होता है
ईश्वर की न्याय व्यवस्था पर
जब देखता हूँ किसी स्वस्थ इंसान को
जाते हुए कैंसर की गिरफ्त में

हँसता खेलता जीवन ,
पत्नी की ख़ुशी
बच्चों की खिलखिलाहट
माता पिता का संतोष
मित्रों की मस्ती
सब कुछ गायब हो जाता है

रह जाती है
एक उदास जिंदगी
बाथरूम में खुल कर रोने के बाद
 बाहर आकर
पत्नी की झूठी मुस्कराहट
स्कूल से लौट कर
सीधा खेल के लिए दौड़ लगाने वाले
बच्चों का सामान्य से अधिक समय देना
बात बात पर अपनी बीमारी
और जरूरतों के जिक्र की जगह
माता पिता की बातों से
शिकायतों का गुम हो जाना
होली दिवाली दिखने वाले
रिश्तेदारों का निरंतर आना जाना
बेदर्दी से घेर कर पार्टी लेने वाले
दोस्तों का बाहर चलने का आग्रह .

और इन सबके बाद
अपने अकेले का समय
सर पर हथोड़े से मारता है
क्या होगा पत्नी का ?
बच्चों का भविष्य ?
माता पिता का बुढ़ापा ?
बीमारी का कर्ज ?
और भी सैंकड़ों प्रश्न .

ईश्वर ! उत्तर दो !
क्या औचित्य है ?
एक पूरे परिवार को एक साथ दंड देने का .
कौन सा साझा पाप पुण्य है
कुछ समझ में नहीं आता ,
बस लगता है -
ये ईश्वर -विश्वर सब बकवास है
मनगढ़ंत कहानी है

मृत्यु से कौन डरता है !
डर लगता है जिंदगी से -
कैंसर के साथ.

गुरुवार, 3 जून 2010

सत्ता

हो रहा है आदमी हलाल देखिये
खा रहे हैं नोच कर दलाल देखिये,

चाटते  मलाई जो सत्ता में आ गए
आ न सके उनका मलाल देखिये,

सौ करोड़ लोग पसीना बहा रहे
पांच  सौ* का इत्र का रूमाल देखिये,

खून में सना है जो सीमा पे मर गया
टी वी पे मंत्रियों का जलाल देखिये .

(* सांसद)

सोमवार, 31 मई 2010

नीलकंठ

हम - हम सब
रोज पीते हैं - न जाने कितना विष
विष शब्दों का - विष अपशब्दों का
विष तानो का - विष तनावों का
विष गैरों का -विष अपनों का
जिन्दा रहते हैं हम फिर भी
इतना विष पीकर भी
पता हैं क्यों ?

क्योंकि
ढेर सारे विष के सामने
हमें मिलती है अमृत की कुछ बूंदे
कहीं न कहीं
कभी न कभी
किसी न किसी से .
यह अमृत हमें अमर बना देता
अगर हमारे अन्दर
इतना विष न भरा होता

फिर भी अमृत अमृत है
कुछ बूंदे भी काफी है
असंख्य विषों को प्रभावहीन करने को;
लेकिन जब विष भर जाये हलक तक
अमृत की बूंदे हो जाये अपर्याप्त
तब हमारे अन्दर का अंतर
उगल डालता है यह घोर विष
किसी और पर
और इस तरह हम सब
बांटते  रहते हैं ,अपने जीवन के विष को

जब हम थूक नहीं पाते अपने विषों को
उन पर
जिन्होंने हमें यह दिया था
तो हम उसे थूकते हैं उन पर
जो हमें अमृत देते हैं
इसलिए नहीं कि
हम उन्हें दुःख देना चाहते हैं
बल्कि इसलिए कि
वही लोग - सिर्फ वही लोग
हमारे उगले हुए विष को
अंजुरियों से पी लेंगे
और फिर भी लौटायेंगे
हमें अपना अमृत

हमारे विष से
उनका हलक सूख जायेगा 
गर्दन नीली पड़ जाएगी
लेकिन वे कहलायेंगे
नीलकंठ
शिव कि तरह
और फिर भी बाँटेंगे
अमृत
आजीवन !!
आमरण !!!

रविवार, 30 मई 2010

अनाम तुम!

चंद घंटों पहले
तुम कितने सुरक्षित थे
न सर्द हवा के झोंके
न भूख का तकाजा
न जीने की चिंता
 न मरने का डर
माँ के गर्भ में
नरम थे , गरम थे

शुरू हुआ तुम्हारा संघर्ष
तब , जब आये तुम बाहर
इस बेरहम दुनिया की दहलीज पर
जहाँ तुम्हारे लिए खड़ी थी
एक अनाम जिंदगी
एक बदनाम मौत
वर्षों जीने का पाप
न मर पाने का श्राप

आज से तुम्हारी मित्र है
भुखमरी और लाचारी
दुर्बलता और बीमारी
बिलखता बचपन
अपराधी यौवन
रिसता बुढ़ापा
प्रश्नवाचक जीवन

तुम्हारा दोष क्या ?
तुम्हारा 'तुम' होना
होकर भी गुम होना
बिन नाम के अनाम तुम
आये हो पर गुमनाम तुम
एक बिन पते के लिफाफे से
डाक के डब्बे  सी दुनिया में
जिस पर मुहर नहीं लगी
पोस्ट मास्टर समाज की
बेमानी रिवाज की

अनाम तुम! गुमनाम तुम!!

शनिवार, 29 मई 2010

अशांति

कितनी अशांति बिखरी है ,यूँ जग जीवन में
जैसे कोई धुआं फैले एक उपवन में

उपवन में हम खुशबू लेने को आये थे
कुछ अपना इस उपवन को देने आये थे
क्यूं फर्क आ गया लेने देने का मन में

हमने कुछ ताज़ा फूल यहाँ से तोड़े भी
उन फूलों के गुलदस्ते हमने जोड़े भी
फिर 'और अधिक' के कांटे बींध गए तन में

सूखे पत्तों को हमने आग दिखा डाली
फूलों की खुशबू  में दुर्गन्ध मिला डाली
ऐसे अशांति फैला डाली इस बगियन में

बुधवार, 26 मई 2010

जिन्दगी छोटी सी

कर चुके झगडा बहुत, मत रोइए
जिन्दगी छोटी सी है , मत खोइए

बात करने को समय मिलता नहीं
मौन रह कर वक़्त को मत खोइए

हो गया बस ,कह लिया कुछ सह लिया
पोंछ कर आंसू , ये चेहरा धोइए

फेर कर मुंह कर चुके अभिनय बहुत
अब जरा कंधे पे सर रख सोइए

शनिवार, 22 मई 2010

मन

मिलने को व्याकुल था कितना , फिर भी क्यों कतराया मन
मैं ही झुकता जाऊं क्योंकर , यह कह कर इतराया मन

चाहत बिखरी कण कण में थी , इच्छाएं पल पल में थी
सब कुछ पाने की ख्वाहिश में , बिखरा और छितराया मन

फूलों की चाहत में कितनी , खुशियाँ दिल में बसती थी
अब फूलों के बीच खड़ा मैं, जाने क्यों मुरझाया मन

यह कर लूं मैं , वह कर लूं मैं , सपने हर दम बुनता था ,
करने का जब वक़्त हुआ तो , क्यों सोया सुस्ताया मन

जब तक थे अवसर , मन घूमा फिरता था आवारा सा
छूट गयी जब डोर समय की , अब है क्यों पछताया मन

बुधवार, 19 मई 2010

माँ

हुई लड़ाई मित्रों से और लड़ कर लौटा घर मैं
मन में गुस्सा और हताशा लेकर लौटा घर मैं
आंसू अटके थे पलकों पर मन पर पत्थर था
अच्छा कुछ भी नहीं लग रहा था जब लौटा घर मैं

माँ ने देखा हाल मेरा और सब कुछ समझ लिया
सर पर फेरा हाथ और सीने से लगा लिया
अब न रुक सके आंसू मेरे झर झर बह निकले
कस कर माँ को पकड़ा मुह आँचल में छुपा लिया

कैसे समझ लिया करती हर बात मेरी बचपन में
मैं कुछ कह भी न पाता जब - व्यथा मेरी जो मन में
माँ , मैं तेरा ही हिस्सा तू हरदम यह कहती थी
चोट मुझे लगती होता था दर्द तुम्हारे तन में

माँ ही देवी , माँ ही भक्ति , माँ पूजा ,माँ इश्वर
माँ ही दीपक, माँ ही आरती ,माँ तीरथ, माँ मन्दिर
माँ की ममता से ज्यादा शीतल न मिलेगी गंगा
माँ के वचन रिचाओं जैसे छपे ग्रन्थ के अक्षर

सोमवार, 17 मई 2010

कुछ पता नहीं

कल जीवन में क्या होना है कुछ पता नहीं
है आज रात सोना और कल फिर उठना है
उठना भी है या नहीं - हमें कुछ पता नहीं

कितनी आपाधापी में चलता जीवन है
जीने की खातिर मरता रहता ये तन है
जिस रोटी को पाने को हम लड़ते रहते
थाली में है, पर मुख में हो, कुछ पता नहीं

रोटी की बात नहीं, चिंता है बरसों की
प्राणों को खबर नहीं अगले कल परसों की
न होने वाली बातों से डरते रहते
जो होना ही है, उस डर का कुछ पता नहीं

पंछी को कस कर पकड़ा तो मर जाएगा
जब चाहा पिंजरे से उड़ के घर जायेगा
पंछी को उड़ने दो पंखों को मत छेड़ो
यह कितनी दूर चला जाए कुछ पता नहीं

शनिवार, 15 मई 2010

एक पल

एक पल यूँ जी लिया ,बस जिंदगी को जी लिया
एक मधुकण पी लिया जीवन का अमृत पी लिया

जिंदगी की चाहतों का अंत कुछ होता नहीं
स्वप्न अपना जी लिया तो चाहतों को जी लिया

सौ बरस की जिंदगी को क्या करूँ जी कर भला
एक दिन में जैसे हमने एक जनम को जी लिया

प्यास बुझ सकती नहीं सावन की इक बरसात से
अंजुरी पर होठ रख कर सारा सावन पी लिया

बुधवार, 12 मई 2010

जिंदगी और मौत

जिंदगी का क्या भरोसा कब तलक चल पायेगी
मौत का पक्का है वादा एक दिन वो आएगी

सांस के तारों के सुर जिस दिन कहीं खो जायेंगे
गोद में रख सर , सिरहाने मौत गुनगुनायेगी

रात भर जो जल चुका उस दीप सी वीरान आँखें
जिंदगी के पार कोई लौ सी टिमटिमाएगी

शब्द अंतिम कह चुके होठों पे इक मुस्कान होगी
इक वही मुस्कान सब कुछ, अनकही कह जाएगी

स्पर्श की सीमा में सीमित , प्रेम जब बंधन न होगा
आत्मा ब्रह्माण्ड में घुल , प्रेममय हो जाएगी

बुधवार, 5 मई 2010

बुढ़ापा

जीवन एक वीरान हवेली सा
जिसमे यादों के उलझे से जाले
तन्हाई की हैं परतें उतर रही
पतझड़ के पेड़ों सी दीवालें

छत उलटी लटक रही सर पे कब से
इसने हर पल को है जाते देखा
इसने देखी रातों की परछाई
सूरज को खिड़की से आते देखा

इस जीवन के अन्दर कितनी हलचल
कितना असमंजस कितना कोलाहल
कितनी बातें दिखती , घटती रहती
मन के सागर में कितनी उथल पुथल

पर फिर भी अंतर में सन्नाटा है
सब कुछ होकर भी यह ख़ामोशी है
हो इन्तेजार जैसे कुछ होने का
दस्तक कब दे दे मौत पडोसी है