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शनिवार, 22 मई 2010

मन

मिलने को व्याकुल था कितना , फिर भी क्यों कतराया मन
मैं ही झुकता जाऊं क्योंकर , यह कह कर इतराया मन

चाहत बिखरी कण कण में थी , इच्छाएं पल पल में थी
सब कुछ पाने की ख्वाहिश में , बिखरा और छितराया मन

फूलों की चाहत में कितनी , खुशियाँ दिल में बसती थी
अब फूलों के बीच खड़ा मैं, जाने क्यों मुरझाया मन

यह कर लूं मैं , वह कर लूं मैं , सपने हर दम बुनता था ,
करने का जब वक़्त हुआ तो , क्यों सोया सुस्ताया मन

जब तक थे अवसर , मन घूमा फिरता था आवारा सा
छूट गयी जब डोर समय की , अब है क्यों पछताया मन

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