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शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

आग रिश्तों को लगा दो

रात गहरी चाँद मद्धम, मिल सकेगी राह क्योंकर
घोर जंगल मार्ग दुर्गम, कोई हो आगाह क्योंकर


आदमी से जानवर अब, जानवर से आदमी हैं
कौन किसको मीत समझे , और हो निर्वाह क्योंकर


जिसको था सर्वस्व सौंपा , उसने ही सर्वस्व लूटा
मौन अब वाणी बना है , सांस बन गयी आह क्योंकर


साथ जीने की कसम ली , साथ मरने की कसम ली
मृत्यु से पहले चिता दी , जिंदगी को दाह क्योंकर


आग रिश्तों को लगा दो , मृत्यु किश्तों की मिटा दो
ख़त्म कर दो बन्धनों को , अब चलें उस राह क्योंकर

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर , सर्वश्रेष्ट और सार्थक कविता ,हर पंक्तीं पर इक लेख लिखा जा सकता है ,हर पंक्तीं अपने आप में इक कहानी कहती है अगर कोई समझना चाहे तो --- ऐसे रिशतें जो दर्द बन जाए और ऐसा जीवन जो किश्तों में मौत दे उसे क्यों कर जिया जाये तभी तो मैं इच्छा म्रत्यु की पक्षधर हूँ बहुत ही क्रन्तिकारी विचार यही तो आपकी खूबी हैकि कभी आप फूलों सी नाजुक कवीता कहते है तो कभी सूरज से जलती हुई --जिन्दगी पर इक शेर सुनिए " जिन्दगी इस तरह आज लगने लगी रंग उड़ जाये जो दीवारों के अब छुपाने को बाकि कुछ ना बचा जख्म दिखने लगे हैं दरारों से

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  2. आपकी यह रचना कल के ( 11-12-2010 ) चर्चा मंच पर है .. कृपया अपनी अमूल्य राय से अवगत कराएँ ...

    http://charchamanch.uchcharan.com
    .

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  3. रिश्तों को आग लगाने से रिश्ते नहीं मिटते
    सुन्दर अभिव्यक्ति

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  4. आग रिश्तों को लगा दो , मृत्यु किश्तों की मिटा दो
    ख़त्म कर दो बन्धनों को , अब चलें उस राह क्योंकर
    लेकिन कसक फिर भी साथ रहती है।

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  5. बहुत ही अच्छा.....मेरा ब्लागः-"काव्य-कल्पना" at http://satyamshivam95.blogspot.com/ ....आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे...धन्यवाद

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  6. ममताजी , आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद . लेकिन एक बात से सहमत नहीं हूँ . आपने इस कविता की परिस्थिति को इच्छा मृत्यु से जोड़ दिया . मेरी प्रेरणा ये थी , कि जहाँ रिश्तों को आग में जलाया जाता है वहां किश्तों में मरने से अच्छा है कि ऐसे रिश्तों से छुट्टी लेकर एक नयी राह खोजी जाये . ये प्रेरणा भी उस स्थिति के लिए हैं जहाँ वाणी मौन हो जाती है और हर सांस आह बन जाती है .सामान्य घर गृहस्थी के झगड़ों के लिए ये बातें लागू नहीं होप्ती . सामान्य जीवन के मतभेद तो हर घर में होते ही हैं , क्योंकि इसी ताल मेल को बिठाने का नाम तो गृहस्थी है .
    वर्माजी और वंदनाजी , इस स्थिति में शायद आप भी मुझसे सहमत होंगे . कसक रह जाने वाली स्थिति कब की ख़तम हो चुकी होती है .

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  7. उत्कृष्ट रचना ..और आपके ब्लॉग का चित्र भी बहुत सुन्दर है .
    मेरे ब्लॉग पर इज्जत अफजाई का बहुत शुक्रिया.

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