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शुक्रवार, 18 जून 2010

हम दिन भर कितनी बातें करते रहते हैं

हम दिन भर कितनी बातें करते रहते हैं
उतनी ही बातें औरों की सहते रहते हैं

मीठी बातें, खट्टी बातें .प्यारी बातें, खारी बातें
सुख की बातें, दुःख की बातें ,करते कितनी सारी बातें
हम अपने कानों में क्या कुछ भरते रहते हैं

कभी कभी ज्ञानी बन कर करते ऊँची बातें
और कभी हलके बन कर करते ओछी बातें
औरों की बुद्धि तुला पर हम तुलते रहते हैं

कभी खुद की खातिर थोडा वक़्त निकालो
खुद को कह लो, खुद को सुन लो , समझा लो
हम अपने आप से जाने क्यों डरते रहते हैं

खुद की बातों से ही हम खुद को जान सकेंगे
हम अपने जीवन को बेहतर पहचान सकेंगे
औरों  के संग तो आडम्बर करते रहते हैं

3 टिप्‍पणियां:

  1. स्‍वयं बात करना ही तो आज कोई नहीं चाहता है, जिस दिन हम स्‍वयं को जानने लगेंगे उस दिन से दुनिया बदलने लगेगी। आध्‍यात्‍म का अर्थ भी यही है कि स्‍वयं को जानो। वर्तमान में तो हम केवल मौज मस्‍ती की ही बातें करते हैं सामाजिक बाते तो होती ही नहीं है इस कारण मानवीय चरित्र ही सामने नहीं आ पा रहे हैं।

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