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शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

सैलाब

कोई  चुपके  से  मेरे कानों  में यूँ कुछ कह गया
आँख के पीछे थमा सारा समंदर बह गया

दर्द की नीवों पे कितने पत्थरों के दुर्ग थे
इक जरा जज्बात के झोंके से सब कुछ ढह गया

मैं समझता था कि मेरा ख़त्म सब कुछ हो चुका
फिर भी सीने में धडकता दिल बेचारा रह गया 

सह ना पाया प्यार के जज्बात के दो बोल मैं 
वक़्त के हालात के चुपचाप थप्पड़ सह गया 

3 टिप्‍पणियां:

  1. महेंद्र जी बहुत ही सुन्दर प्रस्तुती , दिल से कही बात दिल तक ही पहुंचती है चलिए इक शेर सुनिए " आखों में ही रहा , उसने कभी दिल में उतर कर नहीं देखा , कश्ती के मुसाफिर ने कभी समन्दर नहीं देखा , पत्थर कहता है मुझे मेरा चाहने वाला , मैं मोम था उसने मुझे छू कर नहीं देखा -ममता

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  2. खूबसूरत शेर ! कम से कम कोई तो है यहाँ जो दिल से अपनी बात लिखता है , मात्र भ्रमर रुपी टिपण्णी नहीं छोडता :-) . धन्यवाद ममता , अच्छा लिखने के लिए एक अच्छा पाठक ही काफी है . मेरी पत्नी मेरी सब सी बड़ी आलोचक और प्रंशसक दोनों हुआ करती है , इसलिए लिखना निरंतर जारी रहता है . अब यहाँ तुम हौसला बढाती हो, इसलिए लिखना अच्छा लगता है .

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  3. प्रिय महेंद्र!
    विचारों की गहराई को सही शब्दों में अभिव्यक्त किया है. सच पूछो तो मैं रोज़ सवेरे अपने mailbox में तुम्हारा लिखा हुआ कुछ नया पढने के लिए उत्सुक रहता हूँ. जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं, वैसे-वैसे तुम्हारी रचनाओं में भी निखार आता जा रहा है. तुम किताब लिखो न लिखो मुझे मेरी रोज़ की खुराक मिल ही जाती है.
    लगे रहो!
    शशि मीमानी

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