Mahendra Arya

Mahendra Arya
The Poet
लफंग बन गए हैं दबंग आजकल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
लफंग बन गए हैं दबंग आजकल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 19 सितंबर 2010

लफंग बन गए हैं दबंग आजकल

सीमा पे अमन देश में है जंग आजकल
घुसपैठिये बना रहे सुरंग आजकल

ऊंचाइयों पे उड़ने का हम ख्वाब देखते
अपने ही अपनी काटते पतंग आजकल

बाहर के दुश्मनों से हम चाहे निपट  भी लें
अपने ही गिरेबान में भुजंग आजकल

जितने गदर्भ देश में , ओहदों पे मस्त है
धोबी के घाट पर खड़े तुरंग आजकल

संस्कार ख़त्म हो चले , अधिकार बच गए
अच्छे नहीं समाज के रंग-ढंग आजकल

छिछोरे - युवा पीढ़ी के आदर्श बन गए
लफंग बन गए हैं दबंग आजकल

शब्दार्थ
[ गदर्भ = गधा / तुरंग = घोडा ]