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रविवार, 23 अगस्त 2015

हे पाकिस्तान !

हे पाकिस्तान !
शर्म आती  है ये सोच कर
कि  तुम कभी मेरा ही हिस्सा थे !
चकित होता हूँ ये याद कर के
कि तुम भी अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई का हिस्सा थे !

आजादी क्या मिली
तुम्हारे तो सुर ही बदल गए थे
हजारों वर्षों की दासता में साथ थे
आजादी में बाहर निकल गए थे !

 तुम्हारा दोष नहीं
दोष है तुम्हारे रहनुमाओं का
शापित हो तुम , फल भुगत रहे हो
बंटवारे में मिली बद्दुआओं का !

आज मैं कहाँ और तुम कहाँ ?
देखता है सारा जहाँ
मैं हूँ  प्रगतिशील दुनिया का सिरमौर
तुम हो एक आतंकवादी , झूठे और चोर !

हाँ चोर ! क्योंकि चोरी छिपे वार करते हो !
अपनी ही जमीन पर  आतंकवादी तैयार करते हो
बना लिया मजहब को तुमने  हथियार
और हो गए किसी पागल घोड़े पर सवार !

ओसामा बिन लादेन जैसों के शरणदाता हो तुम
दावूद  इब्राहिम जैसे अपराधियों  के तो पिता और माता हो तुम
लाख झूठ बोलते हो दुनिया को , इनके लिए
वही मरवाएंगे तुम्हे , मरते हो जिनके लिए !

किस्मत अच्छी ही थी ,कि  तुम हमसे कट  गए
भले ही भारत माता के अंग बंट   गए
लेकिन कैंसर के हिस्से को काटना ही अच्छा है
कष्ट पाकर भी तन से छांटना ही अच्छा है !

सोमवार, 17 अगस्त 2015

मुस्कान है भारत

मेरा  मान है भारत
मेरी शान है भारत
मेरा जीवन है
मेरी जान है भारत !

मेरा धर्म है भारत
मेरा कर्म है भारत
भारत मेरी गीता
कुरान है भारत !

मेरा गर्व है भारत
मेरा पर्व है भारत
मेरी दिवाली है
रमजान है भारत।

मेरा ग्रन्थ है भारत
मेरा पंथ है भारत
मेरी ताकत है  ये
किरपान है भारत।

जग शांति है भारत
पर क्रांति है भारत
सरहद पर फौजी
बलिदान है भारत।

खुशहाल है भारत
यूँ निहाल है भारत
हर प्रीत का उत्तर
मुस्कान है भारत।  

रविवार, 2 अगस्त 2015

हे सविता !

[ आज मेरी बड़ी बहन सविता ने साठ साल पूरे किये। मुझसे बस एक साल बड़ी हैं। मैंने उन्हें ये कविता भेंट की अपनी आवाज में। मेरी बहुत सारी शुभकामनायें उनको। ]


हे सविता !
तुम हुयी साठ  की मैं उनसठ का
इस पर क्या हो कविता !
हे सविता !

लगती सब बातें कल की सी
जो बीत गयी हैं पल की सी
तुम पढ़ने में पागल रहती
तुम पर बलिहारी पिता !
हे सविता !

हम  भाई मस्ती करते थे
कभी लड़ते कुश्ती करते थे
तुम एक घुड़की देती हमको
माँ को दूँगी सब बता !
हे सविता !

तुम छोटी थी जब आठ साल की
हमको लगती तुम साठ  साल की
बस भजन हवन और पठन तेरा
हमको बोरिंग लगता !
हे सविता !

हम तुमसे कितना डरते थे
पीछे से हिटलर कहते थे
फिर भी तुम ढक  लेती थी
तब हाँ दोनों की खता !
हे सविता !

अब सच में हुई साठ  की तुम
बचपन के पढ़े पाठ की तुम
अब मूर्ति दिखाई देती हो
हैं नमन तुम्हे सविता !

हे सविता !