शब्दों की भाषा से बढ़कर एक भाषा होती है
वह भाषा मन के भावों की परिभाषा होती है
हर शब्द नहीं बोला, समझा , समझाया जाता है
इक शब्द उतर कर आँखों में सब कुछ कह जाता है
है नहीं जरूरत मन की भाषा को तो वैया-करण की
है नहीं जरूरत शब्दकोष के साधन और शरण की
सुख की भाषा, दुःख की भाषा, भाषा क्रोधित भावों की
मौन प्रेम की अभिव्यक्ति , आंसू - आहत घावों की
यदि शब्द नहीं होते जीवन में शायद अच्छा होता
अपशब्दों की भाषा से बचता मानव बच्चा होता