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मंगलवार, 8 जून 2010

आईने में

अपना चेहरा जब भी देखा आईने में ,
कितना झूठा पाया खुद को आईने में .

झूठी शान दिखाता रहता दुनिया में ,
कितना हल्का खुद को लगता आईने में .

दुनिया कहती मुझको मैं कोई फ़रिश्ता हूँ ,
खुद को मैं क्यों पापी लगता आईने में .

अकड़ा फिरता हूँ ऊँची इज्जत की धुन में ,
बस नाटक सा करता दिखता आईने में .

7 टिप्‍पणियां:

  1. अति सुन्दर लिखा है। बधाई।

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  2. बेहद उम्दा अभिव्यक्ति………………आईना दिखाती हुयी।

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  3. आईने के समक्ष खुद को रख पाने की हिम्मत कम लोग ही कर पाते हैं...आप की रचना शशक्त है...बधाई
    नीरज

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  4. आईये जानें ....मानव धर्म क्या है।

    आचार्य जी

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  5. How true depiction of the actual self within everyone

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