Mahendra Arya

Mahendra Arya
The Poet
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गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

इरादे

 दुखों के जंगल में
सुख की पगडण्डी है
चौराहा उलझन का
निर्णय की मंजिल है

कुछ अनजाने डर से
रातें अन्धियायी है 
चिंताओं की रेखा
माथे पर छाई है

फिर भी राहें दिखती
बिजली की तड़पन से
डर भी मिट मिट जाता
पत्तों की खडकन से

राहों में शूल बिछे
अनबूझी मुश्किल  के
शूलों में फूल खिले
खुशियों के दो पल के

पग में कांटे चुभते
जीवन के वादों के
पावों  में जूते हैं
मजबूत इरादों के