Mahendra Arya

Mahendra Arya
The Poet
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शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

सैलाब

कोई  चुपके  से  मेरे कानों  में यूँ कुछ कह गया
आँख के पीछे थमा सारा समंदर बह गया

दर्द की नीवों पे कितने पत्थरों के दुर्ग थे
इक जरा जज्बात के झोंके से सब कुछ ढह गया

मैं समझता था कि मेरा ख़त्म सब कुछ हो चुका
फिर भी सीने में धडकता दिल बेचारा रह गया 

सह ना पाया प्यार के जज्बात के दो बोल मैं 
वक़्त के हालात के चुपचाप थप्पड़ सह गया