Mahendra Arya

Mahendra Arya
The Poet

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

एक थप्पड़

थप्पड़
जिसका कोई विशेष अस्तित्व नहीं होता
जब तक
उसके मारने वाले का
या उस गाल का
कोई विशेष अस्तित्व नहीं हो
जिस पर वो पड़ा था

रोज थप्पड़ खाते हैं
गरीब रिक्शेवाले
बेरोजगार युवक
असहाय आरोपी
पुलिस थाने में
वर्दी वाले पुलिसिया हाथों से
चुपचाप आंसू पोंछ कर
लग जाते हैं फिर से अपने काम में
क्योंकि थप्पड़ मारना पुलिस का स्वभाव  है
और उन गरीबों की नियति
मीडिया भी तब तक
न कुछ देखती
न कुछ दिखाती
जब तक पिटाई से थाने में
किसी गरीब की मौत न हो जाए   

लेकिन ये थप्पड़ कुछ अलग था
ये थप्पड़ था एक आम आदमी का
जो गुस्से में भरा हुआ था
गुस्सा गरीबी का
गुस्सा महंगाई का
गुस्सा सरकारी भ्रष्टाचार का
गुस्सा उसकी अपनी मामूली अपेक्षा का
गुस्सा उसकी  उपेक्षा का
और वो गाल था - एक अति खास आदमी का
एक राजनैतिक नेता का
देश के चुने हुए एक नायक का
सरकार को चलाने वाली मशीन का

और ये एक थप्पड़ बन गया
एक मुद्दा राष्ट्रीय बहस का
मीडिया को मिल गया -
एक और दिन का मसाला
राजनैतिक दलों को मिल गया बहाना -
संसद में चल रहे महत्वपूर्ण मुद्दों से ध्यान हटाने का
गाल वाले नेताजी के दल को मिल गया -
एक कारण सड़कों पर तोड़ फोड़ का

कोई नहीं पूछेगा कि
इस थप्पड़ के बदले कितने थप्पड़ मिले
हरविंदर सिंह को
अगली खबर बनेगी अगर
हरविंदर सिंह मरे तो -
वर्ना ये किस्सा ख़त्म !
कल से कोई नयी घटना ढूंढें !

सोमवार, 14 नवंबर 2011

भीड़ में इकाई हम


आज मैं  ग़रीब हूँ 
बिगड़ा नसीब हूँ 
दस  लाख रुपैये हैं
बस केवल रुपैये है  
दस  कम नहीं होते 
फिर भी  ग़म नहीं धोते 
कल मैं अमीर था 
जेब से फ़कीर था 
गाँव में जब रहता था 
मजे में रहता था 
झोपडी  इक  कच्ची थी 
लेकिन जो सच्ची   थी 
झोपडी के बाहर हल था
मुश्किलों  का हल था 
दूर कहीं दस बीघा खेत था 
पेड़ पौधे और फसलों  समेत था
जिसको मैं पालता था  
जिसमे मैं डालता था 
थोड़े से बीज और ढेर सा पसीना
गर्मी हो सर्दी हो या बारिश का महीना  
और फिर कटाई पर , उत्सव मनाते थे
रातों को बैठ कर सब  बिरहा सुनाते थे
बैलों को हांक कर राजा से चलते थे
गोबर बुहार कर चूल्हों पर मलते थे 
पत्नी जब मिटटी की
हांडी चढ़ाती थी 
बाजरे की खिचड़ी की 
खुशबू फ़ैल जाती  थी
खा कर जब मूंज की 
खटिया पर सोते थे 
थके हारे जीवन के 
सपने संजोते थे
फिर ये क्या हुआ अब है 
लुट गया मेरा सब है
दस बीघा बेच कर 
छोड़ दिया गाँव घर 
रुपैये ये पायें हैं 
शहर में आये हैं 
बदले में खेत के 
शहर में  इस रेत के  
दस फुट की एक दुकान 
भाड़े का एक मकान
मुश्किल से आएगा 
घर को चलाएगा 
होकर के शहरों  के
गूंगों के बहरों के 
आकर करीब हम 
कितने ग़रीब हम
क्या दें दुहाई हम 
भीड़ में इकाई हम    
  

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

अनचुना रस्ता ( अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि रॉबर्ट फ्रोस्ट की मशहूर कविता का हिंदी अनुवाद )



( अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि रॉबर्ट  फ्रोस्ट की मशहूर कविता का हिंदी अनुवाद )

उस जंगल से जाते थे  दो रस्ते 
हाय, मैं दोनों पर नहीं जा सकता था 
और एक यात्री की तरह देखता था वो रस्ते 
फिर एक रस्ते को देखा दूर तक, अहिस्ते अहिस्ते 
जहाँ वो मुड कर कहीं नीचे जा सकता था 

फिर वैसे ही नजर उठा कर देखा दूसरा रस्ता
जो शायद कुछ ज्यादा जंच रहा था
क्योंकि  ज्यादा हरा और कम दलित था वो रस्ता
जहाँ तक सवाल था चुनने का एक रस्ता 
एक से ही थे , मन में ये जंच रहा था    

और उस सुबह दोनों रस्तों में से एक को चुनना था 
दोनों रस्तों पर पड़ी पत्तियां कलुषाई नहीं थी 
मैंने  पहले को भविष्य के लिए छोड़ , उस दिन नहीं चुना था
कोई भी रस्ता कैसे कहीं जा पहुँचता है , ये सुना था 
कभी यहाँ वापस आऊँगा , ये उम्मीद भी नहीं थी  

आज ये बताता हूँ एक निःश्वास के साथ तुम्हे 
आज उस बात को बीत गयी उम्रे दराज  
दो अलग अलग रस्ते दिखे  एक जंगल में मुझे 
जो रस्ता कम दला गया था, मैंने चुना था उसे
और शायद उसी निर्णय का परिणाम है मेरा आज   


The Road Not Taken

Two roads diverged in a yellow wood,
And sorry I could not travel both
And be one traveler, long I stood
And looked down one as far as I could
To where it bent in the undergrowth;



Then took the other, as just as fair,
And having perhaps the better claim
Because it was grassy and wanted wear,
Though as for that the passing there
Had worn them really about the same,



And both that morning equally lay
In leaves no step had trodden black.
Oh, I marked the first for another day!
Yet knowing how
 way leads on to way
I doubted if I should ever come back.



I shall be telling this with a sigh
Somewhere ages and ages hence:
Two roads diverged in a wood, and I,
I took the one less traveled by,
And that has made all the difference.
 


Robert Frost