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रविवार, 11 जनवरी 2015

स्मृति - विस्मृति


जीवन में कभी कभी कुछ प्यारा खो जाता है
जीवन की प्रियतम वस्तु के खो जाने से
जीवन फिर जैसे अर्थहीन सा  हो जाता है !

दुखों का सागर खूब हिलोरें लेने लगता
मन का विषाद मन को कुंठित करता रहता
तन थका हुआ हो फिर भी मन  जगता रहता !

कुछ खो जाने से समय नहीं थम जाता है
जीवन की गति चलती रहती साँसों के संग
दुःख के क्षण पीछे छोड़ समय बढ़ जाता है।

पीछे मुड़ कर हम कभी पकड़ नहीं पाएंगे
सुख के लम्हे दुःख के लम्हे खो जाएंगे
आने वाले  दिन कुछ और नया दिखलायेंगे !

स्मृति जैसे मनुष्य के मन का मान है
विस्मृति मनुष्य को ईश्वर का वरदान है
दोनों के होने से  जीवन आसान है  !



गुरुवार, 1 जनवरी 2015

ईश्वर हमें शक्ति दे !

समय का एक खंड बीत गया
समय का अगला खंड शुरू हुआ
क्या यही नहीं होता
हर महीने , हर सप्ताह , हर दिन
हर घंटे हर मिनट हर क्षण !

समय यूँ  बीत रहा है
उम्र हर क्षण हार रही है
समय हर क्षण जीत रहा है
सूर्य बूढा नहीं होता
चाँद थकता नहीं है
बूढा होता है शरीर
थकता रहता यह तन

हर वर्ष हम नापते हैं
एक दूरी को
जो घट रही है निरंतर
हमारे जीवन
और हमारी मृत्यु के बीच

हम झुठलाते हैं एक  दूसरे को
ये कह कर कि
अगला वर्ष शुभ हो
एक क्षीणतर तन के साथ ?
हमारी दुआएं
कर्ण प्रिय भी नहीं लगती 
क्योंकि हम जानते हैं
की सब खोखली है !

हमारी सच्ची शुभकामना होती -
तुम्हारी सारी समस्याओं से लड़ने के लिए
ईश्वर तुम्हे और हौसला दे
अगले काल खंड में !
समय के साथ संघर्ष बढ़ता है
हमें चाहिए आशीर्वाद
अपने संघर्ष को जीतने का
न की नया वर्ष आने का
पुराना  वर्ष बीतने का !

ईश्वर हमें शक्ति दे !