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रविवार, 18 जुलाई 2010

माफ़ करना मेरे बददिमाग पडोसी

क्या चाहता है आखिर
ये मुआ पाकिस्तान
भाई बन के ना रह सके
एक अच्छा पडोसी तो बनते
अपनी लुंगी इनसे संभलती नहीं
दूसरों की धोती खींचते हैं
कभी बात चीत के लिए बुलाते हैं
बुला कर  दांत भींचते हैं
अपनी समस्याओं से लड़ने की जगह
अपनी अक्ल से लड़ते हैं
अमरीका जब धमकाता है
वहीँ भाग पड़ते हैं
बलूचिस्तान को सँभालने की जगह
कश्मीर को समस्या बताते हैं
भारत के सैनिकों  पर वश नहीं चलता
भारत के गरीब मछुआरों को पकड़ के सताते हैं  
जो तुम्हारा है ही नहीं
वो तुम्हारी समस्या कैसे हो गया
शायद यही तुम्हारी समस्या है
जो तुम्हारा नहीं
उसे पाने का ख्वाब देखना
जो तुम्हारा है
उस से हाथ खींचना
मुंबई हमले के बदमाशों को ऐसे बचा रहे हो
जैसे तुम्हारे देश के हीरो हैं
माफ़ करना मेरे बददिमाग पडोसी
तुम्हारे सियासतदान सब जीरो है

4 टिप्‍पणियां:

  1. aapki lekhni me sir kafi dam hai hame isse prerna mili mai bhi aishi muddo par likhunga

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  2. कुछ तो है इस कविता में, जो मन को छू गयी।

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  3. मुझे आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा ! आप बहुत ही सुन्दर लिखते है ! मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है !

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