Mahendra Arya

Mahendra Arya
The Poet

मंगलवार, 6 अगस्त 2019

आर्टीकल 370












कश्मीर भारत का मुकुट सिर दर्द बना क्यों
कश्मीर का हर आदमी बेदर्द बना क्यों
अंग्रेज हमें दे गए आज़ादी मुल्क की
पर कर गए बंटवारे से बरबादी मुल्क की !

बिखरे हुए मोती सभी माला में पिरोये
सरदार ने मेहनत से दिल के घाव थे धोये
कश्मीर को नेहरू अलग ही भाग दे गए
इस देश को अलगाव का एक राग दे गए ।

इस तीन सौ सत्तर से सत्तर साल खप गए
तीन परिवारों में सारे साल नप गए
नेहरू के बोये जख्म को सब सींचते रहे
घर फूंक कर के भी यूँ थे आंख मींचते रहे ।

पाकिस्तान को कश्मीर तश्तरी पे दे दिया
हर पांचवां इंसान बना उनका भेदिया
बच्चों के हाथ से खिलोने छुड़ा लिए
और उसकी जगह पर उन्हें पथ्थर थमा दिए !

हर एक बुराई काअंत बोलता कभी
जब रक्त राष्ट्र भक्त का है खौलता कभी
जब भय से मुक्त हो के कोई युक्ति सोचता
जब कर के सामना विश्व का मुक्ति सोचता !

जब देश राष्ट्र भक्त के ही साथ खडा हो
कुछ कर गुजरने का भी हौसला यूँ बडा हो
तब सारी परिस्थिति समय के साथ होती है
तब हर समस्या चुटकियों में साफ होती है ।

गुरुवार, 23 मई 2019

मेरा रक्षक है मोदी

इस देश की बस आस है मोदी
इस देश में बस खास है मोदी
युग पुरुष इस विश्व का है  जो
इस देश का विश्वास है मोदी

नकली नेताओं को नक्कार दिया
गाली देने वालों को धिक्कार दिया
खुद चोर बताते मोदी जी को चोर
चोरों को जनता ने  दुत्कार दिया

टुकड़े टुकड़े बिखर गए भू  पर
खुद को थोपा था जिन ने जनता पर
गठबंधन की गाँठ पड़ी ढीली
बड़बोले हुए धरासायी घर पर

सीमा का मेरा  रक्षक है मोदी
मेरे जीवन का आरक्षक मोदी
नतमस्तक हूँ मैं उस के चरणों में
इस देश का है संरक्षक मोदी

रविवार, 19 मई 2019

पुलठी आवन जावन

पुलठी आवन  जावन

आज मन करता है चलो बच्चा बन जाएँ
एक दिन के लिए बुजुर्गियत का मुलम्मा उतार  फेंके
और अपने आप से सच्चा बन जाएँ !
याद है न , गाँव में जोहड़ के किनारे खड़ा वो नीम का पेड़
अब भी खड़ा है ,
थोड़ा बूढा हुआ है , लेकिन सीधा खड़ा है
चलो एक बार फिर से गलबहियां डालें
उस बालसखा के  गिर्द
और उसके आस पास पड़ी पकी  हुयी
निमोलियों को चुन के
मुंह में दबा कर मीठा रस पियें
मेरे बच्चे शायद विश्वास भी नहीं करेंगे
की नीम के पेड़ पर भी मिठाइयां उगती हैं !

और फिर चलें अपने मोहल्ले में
जहाँ अपनी हवेली के दोनों तरफ की गलियां
बन जाती हमारा अलग अलग क्षेत्र
दो टोलियां का !
और फिर टाइमर सेट हो  जाता था
हमारे मष्तिष्क में -
जिसके मिनट सेकेण्ड हमें पता नहीं होता था
फिर भी घंटी एक साथ बजती थी दोनों टोलियों में !

और घण्टी बजने के पहले का समय था
भाग भाग कर
चॉक , कोयला , सूखी मिटटी वैगरह से
ढेर सारी  छोटी छोटी समानांतर लाइने खींचने का
ऐसी जगह जहाँ कोई आसानी से ढूंढ न पाए
दरवाजों की सांकल पर,  हल की नोक पर
बाहर पड़ी किसी की बाल्टी पर
पथ्थर के टुकड़े पर , यहाँ तक की बैलों के सींगों पर
और फिर सब हाथ रुक जाते थे , एक उद्घोष के साथ
पुलठी आवन  जावन  , पुलठी आवन  जावन

और इस जयघोष के साथ
दोनों दल बदल लेते थे अपना अपना क्षेत्र
और फिर सिलसिला  शुरू होता
उतनी ही समय सीमा में एक दूसरे के छुपे हुए खजानों को खोजना
खोज कर उन समनांतर रेखाओं को काटना - एक आड़ी  रेखा से

और फिर वही जयघोष - पुलठी आवन  जावन
इस बार दोनों दल एक साथ प्रवेश करते थे
एक के बाद दुसरे क्षेत्र में
हर दल वाला दिखता था अपने छुपे हुए खजाने की रेखाएं
कटी हुयी रेखाओं का मतलब - लुटा  हुआ खजाना
अनकटी रेखाएँ यानी सुरक्षित खजाना
और खजाने की गणना होती रेखाओं की गिनती से
जिस दल का बड़ा खजाना सुरक्षित
वही दल विजेता उस दिन का !

सच कहता हूँ ,
आज के बड़े बड़े गोल्फ क्लब में
भरपूर पैसे खर्च के
वो आनन्द नहीं आता
जो आता था , उस बेफिक्र बचपन के 
मुफ्त के खेल - पुलठी आवन  जावन
का विजेता बनने में

महंगी महँगी पेस्ट्री उतनी स्वाद नहीं होती
जितना उस बालसखा नीम की
प्रेम से खिलाई हुयी वो मीठी निमोलियाँ !
यादों में ही सही - बच्चा तो हो गया मैं !