Mahendra Arya

Mahendra Arya
The Poet
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शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

खुदगर्ज हूँ मैं

खुद पे ही खुद का कर्ज हूँ मैं
खुद हूँ दवा खुद मर्ज हूँ मैं


जी रहा हूँ मैं बस अपने वास्ते
हूँ कितना स्वार्थी खुदगर्ज हूँ मैं


सोचता हूँ मैं मेरे परिवार तक
बस इतने दायरे में अपना फर्ज हूँ मैं


जिन्दा रह सकूँ बस इतना सोच कर
सांस लेने की महज इक गर्ज हूँ मैं


जिंदगी का साज यूँ ही बज रहा
सुर में बेसुर में जो तर्ज हूँ मैं


उसकी फेहरिस्त से भला बचा है कौन
थोडा आगे या पीछे - पर दर्ज हूँ मैं