Mahendra Arya

Mahendra Arya
The Poet

सोमवार, 30 अगस्त 2010

मुट्ठी भर रेत

क्षण क्षण चिराग जल रहा
हर वक़्त यह तन गल रहा

हर सांस कुछ ले जा रही
हर वक़्त जीवन जल रहा

हर सुबह उगता एक दिन
हर शाम इक दिन ढल रहा

मुट्ठी में भींचा रेत को
सब कुछ मगर फिसल रहा

चेहरे पे झुर्री आ गयी
परतों में एक एक पल रहा

जो भविष्य था वो तो आज है
वो जो आज था हुआ कल रहा

हम तेज कितना भाग लें
पर काल सब निगल रहा

यूँ ही जिंदगी तो खिसक गयी
अब हाथ बैठा मल रहा

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

सैलाब

कोई  चुपके  से  मेरे कानों  में यूँ कुछ कह गया
आँख के पीछे थमा सारा समंदर बह गया

दर्द की नीवों पे कितने पत्थरों के दुर्ग थे
इक जरा जज्बात के झोंके से सब कुछ ढह गया

मैं समझता था कि मेरा ख़त्म सब कुछ हो चुका
फिर भी सीने में धडकता दिल बेचारा रह गया 

सह ना पाया प्यार के जज्बात के दो बोल मैं 
वक़्त के हालात के चुपचाप थप्पड़ सह गया 

रविवार, 22 अगस्त 2010

कमबख्त जिंदगी

हमको कभी हंसाती है कमबख्त जिंदगी
अक्सर मगर रुलाती है कमबख्त जिंदगी


जो चाहते जीना जिंदगी शाम ढले तक
पहले उन्हें भगाती है कमबख्त जिंदगी


जो मांगते हैं मौत जिंदगी के ग़मजदा
घुट घुट उन्हें जिलाती है कमबख्त जिंदगी


हंसने की चाह में हैं , जो रो रो के जी रहे
आंसू उन्हें पिलाती है कमबख्त जिंदगी


जो सरफिरे करते नहीं परवाहे -जिंदगी
सर पर उन्हें बिठाती है कमबख्त जिंदगी

शनिवार, 21 अगस्त 2010

संपूर्ण समर्पण

अनुभूति तुम , अनुभूत मैं
अविभाव तुम, अविभूत मैं


अनुराग तुम , अनुरक्त मैं
आशक्ति तुम, आशक्त मैं


दुर्लब्ध  तुम, उपलब्ध मैं
हो शब्द तुम, निःशब्द मैं


अभिव्यक्ति तुम , अभिव्यक्त मैं
हो भक्ति तुम , हूँ भक्त मैं

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

चल मेरे भाई खेलें खेल

चल मेरे भाई खेलें खेल
लुक्का छिपी छुक छुक रेल
खूब चटपटी बनती है
खेलों की चल खा लें भेल


खेलें चल किरकेट यहाँ
बनते धन्ना  सेठ यहाँ
कुछ तो घपला हुआ जरूर
एक था मोदी एक थरूर
दोनों का क्यों निकला तेल
चल मेरे भाई खेलें खेल


या फिर चल होकी खेलें
महिलाओं को संग ले ले
बन जाये आशिक ऐसे
कोच बने कौशिक जैसे
करें प्रेम का प्यारा मेल
चल मेरे भाई खेले खेल


चल कोई ऊंचा काम करें
दुनिया भर में नाम करें
खेलें खेल खिलाडी सा
नेता हो कलमाड़ी सा
नीचे वाला जाये जेल
चल मेरे भाई खेलें खेल

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

अतीत - एक शाश्वत सत्य

घडी रुक जाती है
समय नहीं रुकता
भागता रहता है निरंतर
क्षण भर को नहीं मध्यांतर

कितनी तेजी से बदलता है
भविष्य वर्तमान में
वर्तमान अतीत में

भविष्य! एक भ्रम है
जो अज्ञात है वो भ्रम है
वर्तमान एक प्रक्रिया है
एक नए अतीत के निर्माण की
जो बीत रहा है
जो व्यतीत हो रहा है
हाँ, वही तो अतीत हो रहा है

अतीत एक शाश्वत सत्य
जो स्थाई है
जो अपरिवर्तनीय है

अतीत-
समय कि शिलाओं पर
घटनाओं के लेख
घटनाएँ जो बन जाती है हिस्सा
हमारे जीवन का
एक एक दृश्य
जो अंकित हो जाते हैं
हमारे स्मृति पटल पर
हमारा अतीत बन जाता है
एक प्यारा सा एल्बम
जिसे हम पलटते  रहते हैं
अपने एकाकी समय में
मृत्यु पर्यंत 

रविवार, 8 अगस्त 2010

टिपण्णी रुपी भ्रमर

क्यों लिखूं मैं
कौन पढना चाहता है
कौन मेरी भावनाओं के भंवर में
क्यों फसेगा
कौन मरना चाहता है


ब्लॉग सारे
हैं समंदर की लहर से
शब्द उतने
जितना है पानी जलधि में
हर कोई
लहरों पे जैसे छोड़ता है
अपनी कागज की
वो छोटी नाव जैसे
रोज कितनी नाव
जाने है उतरती
रोज जाने नाव कितनी
डूब जाती


कौन किसकी
नाव को देखे संभाले
हर कोई अपनी ही
नैय्या खे रहा है
बिन सुने ही
बिन पढ़े ही
बिन गढ़े ही
एक नन्ही टिपण्णी सी दे रहा है


कुछ बड़े होशियार
ब्लॉगर घूमते हैं
हर नए ब्लॉगर को
टेस्ट करते हैं
एक दिन में एक
टिपण्णी लिख कर
दस जगह फिर
कॉपी पेस्ट करते हैं

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

अपना खयाल रखना

मित्र !
क्या कर रहे हो?
खाली बैठे-
यूँ धुंए के छल्ले बना कर
होठों को गोल करके
हवा में छोड़  रहे हो
हर छल्ला जैसे जैसे आगे बढ़ता है
फैलता जाता है

उसने  कहा
किलिंग टाइम ....
उदास हूँ

मैंने पूछा
किलिंग टाइम
यानि समय का शिकार
बहुत खूब मित्र
तुम समय का शिकार कर रहे हो
या समय तुम्हारा शिकार कर रहा है
यू आर किलिंग योर सेल्फ
खुद को मार रहे हो

झुंझला कर बोला मित्र
तुम्हे क्या ?
खुद को ही मार रहा हूँ ना '
तुम्हे तो नहीं मार रहा ना ?

मुझे ?
मुझे तो तुम अपने आप से पहले मार रहे हो
ये जो है ना तुम्हारा छल्ला
ये मेरी तरफ आते आते
बन जाता है
फांसी का एक फंदा
जिसमे मैं
ना चाहते हुए भी
लटक जाता हूँ
क्योंकि तुम्हारा मित्र हूँ
इसके पहले कि
समय के शिकार कि जगह
तुम मेरा शिकार करो
मैं चलता हूँ, मित्र
अपना खयाल रखना 

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

इस तरह कुछ जियें

आज जीने दो इस कदर मुझको
कल जो मर जाएँ भी तो ग़म न रहे
इस तरह कुछ जियें ज़माने में
कोई ये कह न सके की हम न रहे


रहने को घर की क्या जरूरत है
दिल के कोने में घर बना लेंगे
बस इसी जन्म की यादें काफी
इस के बाद फिर कोई जनम न रहे


सैकड़ों साल यूँही जीने से
चंद खुशियों के दिन ही काफी है
उम्र की शाम ढल चले; पहले
उठ के चल दें ,कोई भरम न रहे


कोई रोता है जब कोई मरता
बस ये रस्मों रवाज ऐसे हैं
हर कोई हंस के विदाई दे दे
आँख जरा सी भी कोई नम न रहे

बुधवार, 4 अगस्त 2010

बिखरा और छितराया मन

मिलने को व्याकुल था कितना ,
फिर भी क्यों कतराया मन
मैं ही झुकता जाऊं क्योंकर ,
यह कह कर इतराया मन .

चाहत बिखरी कण कण में थी  ,
इच्छाएं पल पल में थी
सब कुछ पाने की ख्वाहिश में
बिखरा और छितराया मन

फूलों की चाहत में कितनी
खुशियाँ दिल में बसती थी
अब फूलों के बीच खड़ा मैं 
जाने क्यों मुरझाया मन 

यह कर लूं मैं , वह कर लूं मैं 
सपने हरदम बुनता था 
करने का कुछ वक़्त हुआ तो 
क्यों सोया सुस्ताया मन 

जब तक थे अवसर मन घूमा- 
फिरता था आवारा सा 
छूट गयी जब डोर समय की 
अब है क्यों पछताया मन

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

पूरा जीवन एक चलचित्र है

हर पल
कोई भी पल
कभी मरता नहीं 
बीत जाता है 
ख़त्म नहीं होता 

वास्तव में 
हर पल वहीँ रहता है 
जहाँ वो था 
हम  ही आगे बढ़ जाते हैं
हम ही बीत जाते हैं 
हम ही ख़त्म होते रहते हैं 
हर दिन 
हर पल 

कभी पीछे मुड़ के देखो
तो नजर आयेंगे 
वो तमाम पल 
जिन्हें हम समझते थे 
कि ख़त्म हो गए हैं 
वे पल छिपे होते हैं 
कहीं ना कहीं 

कुछ धुंधले ख्वाबों में 
कुछ स्कूल की किताबों में 
कुछ पुराने कपड़ों में 
कुछ आकाश   को तकती छत में 
कुछ तुड़े मुड़े पुराने ख़त में 
कुछ पुराने बिना तार वाले गिटार में 
कुछ कमरों के बीच खुलने वाले किवाड़ में 

ये पल बड़े विचित्र हैं 
आँखे मूँद कर देखो 
हर पल एक चित्र है 
दिल के परदे पर देख 
पूरा जीवन एक चलचित्र है     

सोमवार, 26 जुलाई 2010

जिंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात






मुंबई जुलाई २६, २००५


जिंदगी भर नहीं भूलेगी
वो बरसात की रात
जानलेवा थी वो वर्षा
बुरे हालात की रात

दफ्तरों से तो निकलना हुआ उस दिन सबका
घर नहीं पहुंचा कोई चाहे हो निकला कब का
खड़े पानी में सभी लोगों की
इक जमात की रात

डूबते देखे वो रस्तों पे गाड़ियों के काफिले
मरते देखे सड़क पे इन्सां जैसे हो बुलबुले
क़यामत का दिन है - ऐसे ही
खयालात की रात

लोग मेहमान थे उस रात किसी अनजाने के
ऐसा लगता था की सब थे जाने पहचाने से
जात मजहब से अलग हो रही
वो मुलाकात की रात

था बुरा सब कुछ मगर कुछ हुआ अच्छा भी था
था सुखी जो भी वो उसदिन हुआ सच्चा भी था
एक दूजे के लिए दर्द और
जज्बात की रात

रविवार, 25 जुलाई 2010

समर्पित जोन कीट्स को

बहुत सालों के बाद

निकला हूँ शहर से बाहर
अपनी गाडी में बैठ कर
एक छोटे बच्चे सा उत्साह लिए
गाडी अभी तक मोहल्ले से निकली भी नहीं
और मन ने कल्पना शुरू कर दी
हरे भरे खेतों की
सड़क के किनारे खड़े दरख्तों की
खुले आसमान की
पंक्षियों के कलरव की
गाँव के बच्चों के झुण्ड की
रस्ते में आने वाले पनघट की

सोचता हूँ कुछ रास्ता तय होने के बाद
किसी ढाबे पर रुक कर चाय पीऊँगा
मसाले वाली
कल्पना करते करते काफी समय निकल गया
लेकिन ये शहर तो -
ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा
आखिर झुंझला कर पूछा
ड्राईवर से - क्यों भैया
शहर से बाहर ही जा रहे हो न ?
ड्राईवर ने कहा - साहब , शहर से बाहर तो कब के आ चुके
कुछ समझ में नहीं आया


पूछा- अरे भाई , शहर कहाँ ख़त्म हुआ ?
कोई खेत नहीं,
कोई गाँव नहीं
कोई पनघट नहीं
कोई ढाबा नहीं
वो हंस के बोला -
साहब , लगता है कभी बाहर निकले नहीं
सर, मुंबई के बाहर ये सब कहाँ मिलेगा
मुंबई के बाहर यही गाँव है
पक्की इमारतें
सड़क के किनारे होटल
दारू के अड्डे
और टायर पंक्चर की दुकाने
जहाँ लोकल नहीं पहुँचती समझो गाँव है
और इस प्रकार मुझे समझा दिया
गाँव का असली मतलब
उस ड्राईवर ने


और तभी मुझे याद आयी
अंग्रेजी के मशहूर कवि जोन कीट्स की एक रचना
जिसका शीर्षक था -
'वो जो बहुत लम्बे समय से शहर के घेरे में था'**
जिसमे कवि एक दिन शहर के बाहर बिता कर लौटता है
खुले नीले आसमान और
घनी हरी भरी घास की स्मृतियों के साथ
पृकृति के साथ बिताया वो दिन
उसे लगता है कितनी जल्दी ख़त्म हो गया
और उस एक दिन ने
जन्म दे दिया एक खूबसूरत कविता को


अच्छा हुआ तुम पैदा नहीं हुए इक्कीसवी सदी में
और मुंबई में
वर्ना विश्व वंचित रह जाता एक महान कवि से






**To One who has been Long in City Pent

To one who has been long in city pent,
'Tis very sweet to look into the fair
And open face of heaven,--to breathe a prayer
Full in the smile of the blue firmament.
Who is more happy, when, with heart's content,
Fatigued he sinks into some pleasant lair
Of wavy grass, and reads a debonair
And gentle tale of love and languishment?
Returning home at evening, with an ear
Catching the notes of Philomel,--an eye
Watching the sailing cloudlet's bright career,
He mourns that day so soon has glided by:
E'en like the passage of an angel's tear
That falls through the clear ether silently.

[By John Keats (1795-1821) ]

शनिवार, 24 जुलाई 2010

अपने आप से बातें

























मैं अपने आप से बातें करता रहता हूँ

अपना साथी खुद बन जाता
सुख दुःख की सब बातें कहता
सुख दुःख की सब बातें सुनता
फिर मन के घोड़े पर चढ़  कर
मैं चाहूं जहाँ चला जाता

मैं अपने आप से बातें करता रहता हूँ

' तू कौन?'- कभी यह प्रश्न किया खुद से
'मैं कौन ?' - प्रश्न ही उत्तर बन आया
कितना साधारण प्रश्न किया मैंने
कितना मुश्किल उत्तर पाया मैंने
क्या मैं हूँ - वो जो नाम मेरा लिखा
पर वह तो बस एक शब्द मुझे दिखा
मैं शब्द नहीं , बस नाम नहीं हूँ मैं
'मैं कौन?;- प्रश्न वैसा ही खड़ा रहा

मैं अपने आप से बातें करता रहता हूँ

दर्पण के अन्दर जो है खड़ा हुआ
वह ही तो 'मैं हूँ ' - ऐसा ही तो दिखता  हूँ
पर वह तो इक परछाई है - फिर प्रश्न उठा
जब तक दर्पण तब तक ही बस परछाई है

' इतना लम्बा चौड़ा तन ही तो बस तू है '
अन्दर से फिर आवाज कोई आयी
' यह मैं हूँ'- तो फिर ढूंढ रहा है कौन ?
'यह मैं हूँ' - तो फिर प्रश्न पूछता कौन ?

मेरे अन्दर क्या है - यह मुझको पता नहीं
मेरे अन्दर क्या क्या घटता कुछ पता नहीं
कैसे  साँसे अन्दर जाती बाहर आती
कब तक आती कब तक जाती यह पता नहीं
कैसे तन के अन्दर शोणित बहता रहता
कैसे दिल धड़क धड़क के कुछ कहता रहता
कैसे सब कुछ चलते चलते फिर रुक जाता
कैसे यह तन सूखी डाली सा झुक जाता

क्या बस शरीर के रहने तक ही मैं रहता
क्या इसके आगे फिर मेरा अस्तित्व नहीं
क्या इसके आगे इन प्रश्नों का अर्थ नहीं
इतना ही है तो यह जीवन क्या व्यर्थ नहीं

कितने सारे प्रश्नों की झड़ी लगा डाली
मैंने खुद को ही उलझन में है डाल लिया
अब बहुत हो चुकी खुद से खुद की बात बहुत
कह कर अपने प्रश्नों को खुद ही टाल लिया

खुद से बातें करना कितना अच्छा लगता
पल भर को भी तन्हाई पास नहीं आती
पर खुद से इतने जटिल प्रश्न भी मत करना
खुद को खुद की सच्चाई रास नहीं आती

मैं अपने आप से बातें करता रहता हूँ


 

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

डरा डरा आदमी

रात के अँधेरे में
डरा डरा आदमी
अंगुली पकड़ के चल रहा
मन के भय के भूत की
डरता है मन क्यों?
शायद अँधेरे से !

फिर बिजली जब कड़कती है
अँधेरा भाग खड़ा होता है
पर मन का भय
भागने की जगह
अट्टहास सुनकर
और बड़ा होता है
मन शायद डरता है -
शायद आवाज से !

अब सब कुछ शांत है
मौन सब , निस्तब्ध  सब
तब भी अशांत है
आदमी का मन क्यों?
अब डर की बात क्या ?
शायद भयभीत है -
इस गहन मौन से !

प्रश्न खड़ा रह गया
आखिर भयभीत क्यों ?
रात के अँधेरे में ,
दामिनी की चमक में ,
गरजती आवाज में ,
परम गहन चुप्पी में
आदमी के मन में
भय इतना गहरा क्यों?

शहरों की सड़कों पर
शेर नहीं होते हैं
सांप नहीं होते है
और नहीं होता है
जंगली कोई जानवर
निःसंदेह सत्य है
आदमी नहीं डरता
शहर की सड़कों पर
जंगल के जीव से

प्रश्न अब कठिन है
प्रश्न है सरल भी
प्रश्न आदमी है
उत्तर भी आदमी है
रात के अँधेरे में
शहर की सड़क पर
आदमी बस डरता है
आदमी की जात से

लिखो कुछ और तुम

दर्द की कविता मत लिखो
कोई लेने वाला नहीं है
कागजों में मत ढूंढो दवा
कोई देने वाला नहीं है

देंगे सब झूठी तसल्ली
और झूठी आह भी
शेर अच्छा ना लगा तो
देंगे झूठी वाह भी

फायदा क्या शब्द को
कलम बना कर
आंसुओं की दवात में
गहरा डुबा कर

चंद रोते ओ बिलखते
शेर लिख कर
बेचारा, मासूम,
परेशान दिख कर

लोग तो पढ़ते हैं
टाइम पास को
है कहाँ टाइम
कि दें  उदास को

लिखना ही है
तो लिखो कुछ और तुम
कुछ रूमानी,
आसमानी छोर तुम

या तो जो
दिल को जरा सहला सके
या किसी को
जो समझ ना आ सके

रविवार, 18 जुलाई 2010

माफ़ करना मेरे बददिमाग पडोसी

क्या चाहता है आखिर
ये मुआ पाकिस्तान
भाई बन के ना रह सके
एक अच्छा पडोसी तो बनते
अपनी लुंगी इनसे संभलती नहीं
दूसरों की धोती खींचते हैं
कभी बात चीत के लिए बुलाते हैं
बुला कर  दांत भींचते हैं
अपनी समस्याओं से लड़ने की जगह
अपनी अक्ल से लड़ते हैं
अमरीका जब धमकाता है
वहीँ भाग पड़ते हैं
बलूचिस्तान को सँभालने की जगह
कश्मीर को समस्या बताते हैं
भारत के सैनिकों  पर वश नहीं चलता
भारत के गरीब मछुआरों को पकड़ के सताते हैं  
जो तुम्हारा है ही नहीं
वो तुम्हारी समस्या कैसे हो गया
शायद यही तुम्हारी समस्या है
जो तुम्हारा नहीं
उसे पाने का ख्वाब देखना
जो तुम्हारा है
उस से हाथ खींचना
मुंबई हमले के बदमाशों को ऐसे बचा रहे हो
जैसे तुम्हारे देश के हीरो हैं
माफ़ करना मेरे बददिमाग पडोसी
तुम्हारे सियासतदान सब जीरो है

शनिवार, 17 जुलाई 2010

जिनको मिलें हैं दर्द ,बड़े खुशनसीब हैं

जिंदगी का दर्द से रिश्ता अजीब है
आँखों से आंसुओं की तरह बस करीब है

वो चाहते ही क्या जो अधूरी ना रह गयी
जिसको मिला है सब वही सबसे गरीब है

जो खुरदरी जमीं को ना महसूस कर सका
उसका नरम बिछोना ही उसका सलीब है

कैसे सुखी हैं लोग जिन्हें कोई ग़म नहीं
जिनको मिलें हैं दर्द ,बड़े खुशनसीब हैं

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

खिड़की के बाहर की दुनिया

मेरे कमरे के पूरब में एक खिड़की है
जिससे सूरज छन छन कर आया करता था
अपनी किरणों से सर मेरा सहला कर
तडके ही मुझको रोज जगाया करता था

कमरे के दक्षिण में भी एक खिड़की है
जिसके बाहर एक नीम पेड़ का झुरमुट था
जब दूर क्षितिज पर सूरज अस्त हुआ करता
कलरव करता चिड़ियों का उस पर जमघट था

पूनम की रातों को मेरे कमरे में
दूधिया चांदनी खिड़की से भर आती थी
बरसातों में इक इन्द्रधनुष का टुकड़ा
दिखता, जब बूँदें गीत सुनाती थी

ये सब बातें इतिहास हो चुकी है अब तो
अब पहले जैसा नहीं रहा मेरा कमरा
कमरे के बाहर सब कुछ बदल गया है अब
कहने को अब भी है वो ही मेरा कमरा

पूरब की खिड़की के बाहर अब दिखती है
दस मंजिल से भी ऊंची एक इमारत अब
सूरज,चंदा,किरणे,पानी और इन्द्रधनुष
शहरों के जीवन में बन गए तिजारत सब

दक्षिण की खिड़की के बाहर का नीम पेड़
बेदर्दी से जाने किसने है काट दिया
वो झुरमुट, वो जमघट , चिड़ियों का कोलाहल
जैसे जमीन के अन्दर ही है गाड़ दिया

मुझसे बिन पूछे लूट ले गए मुझसे वो
वो मेरे कमरे में छाई मेरी खुशियाँ
मेरे हिस्से का आसमान भी छीन लिया
मुझसे छीनी खिड़की के बाहर की दुनिया

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

बूँद सी जिंदगी

वर्षा की एक बूँद
जल का छोटा सा कण
नन्हा अस्तित्व पर
कितनी बड़ी प्रेरणा

खेत में किसान जब
डालता है बीजों को
खून और पसीने सी
तन मन की चीजों को

मन में एक प्रार्थना
उसके गूंजती रहती
ईश्वर! दे वृष्टि अब
ईश्वर! दे बूँद अब

गर्मी की प्यास से
तन मन निढाल हो
तन जब निर्जीव सा
सुस्त मंद चाल हो

वर्षा की एक बूँद
होठों पे गिरती है
निर्जीव तन मन में
नया प्राण भरती है

गर्म गर्म पत्थर  पर
बूँद जब उतरती है
गर्म तप्त स्पर्श से
अणु सी बिखरती है 

पत्थर की आग में
ऐसे झुलसती है
स्वयं को समाप्त कर
शीतलता भरती है

बूँद कितनी सुन्दर है
बूँद खूबसूरत है
बूँद सिर्फ जल नहीं
माणिक की मूरत है

सूरज की किरणे जब
बूंदों पर पड़ती है
आकाश कैनवास
रंग कितने भरती है

सीपी के मुख में जब
बूँद एक गिरती है
चमत्कार होता है
बूँद बने मोती है

काम ऐसे कर चलें
फिर चाहे मार चलें
बूँद जैसे अश्रु सारी
आँखों में भर चलें

बूँद सी ही जिंदगी
हम सब को चाहिए
ना हो विराट भले
अर्थपूर्ण चाहिए

रविवार, 27 जून 2010

फ़ुटबाल विश्व कप

चमड़े की एक छोटी से गेंद
जिसमे रबर की एक थैली
उसमे भरी पूरी हवा
और लो बन गया फुटबाल
मारी  ठोकर जूते से
और फुटबाल हवा में
लगता है चढ़े ही जा रही है , चढ़े ही जा रही है
और उस के साथ हजारों  लाखों की निगाहें
भी ऊपर जा रही है
फिर आती है फुटबाल नीचे
और उसके साथ साथ लाखों निगाहें .
लोग ढूंढ रहे थे उसे ज़मीन पर
लेकिन इस बीच उस पीली जर्सी वाले ने
एक छलांग लगाई हवा में
और झेल लिया उसे अपने सर पर
कुछ इस अदा से कि वो घूम गयी
गोलकीपर की दिशा में
गोलकीपर उछला दायें
बाल गयी बाएं
और लो हो गया गोल
सारे स्टेडियम में खड़े हो गए लाखों लोग
आधे हवा में उछलते, चिल्लाते
बाकी आधे अपने सर पकड़ कर कोसते
पूरे साउथ अफ्रीका में यही माहोल बिखर गया
और बिखर  गया यही माहोल
ब्राजील में, मेक्सिको में, पुर्तगाल में , जर्मनी में
रूस में ,ग्रीस में, कोरिया में , भारत में
और सैंकड़ों देशों में
जिन्हें हम जानते हैं सिर्फ फुटबाल के लिए
टेलीविजन का कीमती समय
पूरा लग गया समीक्षा में
रेडियो इंटरनेट अखबार
भर गए इस गोल की चर्चा में
सारा विश्व दफ्तर में , घर में,
भोजन में ,यात्रा में
पूछ रहा जाने अनजाने लोगों से
विश्व कप में क्या हुआ आज?

है ना मजेदार बात
कितनी महत्वपूर्ण हो गयी
वो चमड़े की गेंद
या उसके अन्दर भरी हवा
या फिर वो करारी लात
या फिर वो सर पर झेला गया पतन
लेकिन शायद नहीं ,
ये सारी बातें जुडी थी
एक चुनौती से
अपने देश के स्वाभिमान से
उद्देश्य कैसा भी हो
कितना महत्वपूर्ण हो जाता है
जब बात जुडी हो स्वदेश से    

रविवार, 20 जून 2010

गुब्बारे सिर्फ रोटी हैं

सड़क पर बेच रहा है गुब्बारे
एक छोटा बच्चा !
लाल हरे पीले गुब्बारे
गुलाबी बैंगनी नीले गुब्बारे
गोल गुब्बारे लम्बे गुब्बारे
और कुछ नए किस्म के
दिलनुमा गुब्बारे

मैं अब तक समझता था
गुब्बारे प्रतीक है
ख़ुशी का, दावत का, जन्मदिन का , सपनों का
लेकिन आज जब मैंने झाँका
उस बच्चे की उदास आँखों में
तो सारे माने बदल गए
वो  सब कुछ नहीं
जो मैं समझता था

गुब्बारे सिर्फ रोटी हैं
गुब्बारे सिर्फ पैसे हैं
गुब्बारों में भरी हवा
इस बच्चे के पेट से निकली लपटें हैं
जिन पर यह सेक रहा है
अपने लिए रोटियां

काश! सब कुछ बादल जाए
और ये गुब्बारे बन जाए
फिर से
नन्हे नन्हे सपने
इस बच्चे के लिए
सब बच्चों के लिए

शनिवार, 19 जून 2010

टिकट लेके मिले ऐसे दर्शन नहीं चाहिये

आइये हम चलायें एक नया मजहब
जिसमे इंसान रहें इंसानों की तरह सब
ऐसा धर्म जो प्यार के सागर बहाए
ऐसा धर्म जो इंसान से इंसान को मिलाये

धर्म जिसमे मस्जिद की दीवालें ना हो
मंदिर गिरजे गुरूद्वारे शिवाले ना हो
धर्म जिसमे तन पर पहचान के प्रतीक ना हो
धर्म जिसमे दान के नाम पर भीख ना हो

पंडो की पूजा का कर्म नहीं चाहिए
झंडो की पूजा का धर्म  नहीं चाहिए
पाप कर के धोने वाली गंगा नहीं चाहिए
मुहर्रम रामनवमी का दंगा नहीं चाहिए

जीवों की बलि वाले देव नहीं चाहिए
खून में नहाये ऐसे देव नहीं चाहिए
अछूतों का  निषेध- ऐसे द्वार नहीं चाहिए
चंदे  के नाम पर व्यापार नहीं चाहिए

टिकट लेके मिले ऐसे दर्शन नहीं चाहिये
पंडों की तृप्ति वाला तर्पण नहीं चाहिए
ईश्वर की सेवा में चढ़ावे नहीं चाहिए
भक्ति के नाम पर दिखावे नहीं चाहिए

आपस में लडावे ऐसे वचन नहीं चाहिए
संकुचित भावों के प्रवचन नहीं चाहिए
मजहब के नाम पर जेहाद नहीं चाहिए
खून बन के रिसे वो मवाद नहीं चाहिए

कथनी ही कहे ऐसे ग्रन्थ नहीं चाहिए
करनी में फर्क ऐसे पंथ नहीं चाहिए
शाश्त्रों के शब्दों पर हठ नहीं चाहिए
पापों को शरण दे वो मठ नहीं चाहिए

भगवे में ठगने वाले संत नहीं चाहिए
सम्पति से चिपके महंत नहीं चाहिए
जादू से आने वाली भस्म नहीं चाहिए
गांजा चढाने वाली रस्म नहीं चाहिए

ईश्वर ने बनाये सिर्फ मानव हैं
मानव  ने बनाये किन्तु दानव हैं
हमने बना दिए इतने सारे मजहब
जिनके नीचे ईश्वर का मानव गया दब

हर मजहब ने बना दिए अपने कुछ कानून
कानूनों  ने पैदा किये धर्म के जूनून
जुनूनों से बह निकले खून के नाले
इंसान का नहीं, हुआ इंसानियत का खून

धर्म एक चलावें जिस में प्यार की ही पूजा हो
ईश्वर हो एक कोई, देव नहीं दूजा हो
कर्म जिसका केवल व्यवहार की सरलता हो
दूसरों के कष्ट देख आँख में तरलता हो

भजनों में गीत की संगीत की मिठास हो
हर किसी को देख परिवार का आभास हो
'वसुधैव कुटुम्बकम'* को माने वो समाज हो
सेवा सहयोग इस समाज का रिवाज हो

*['वसुधैव कुटुम्बकम' = विश्व मेरा परिवार ]

शुक्रवार, 18 जून 2010

हम दिन भर कितनी बातें करते रहते हैं

हम दिन भर कितनी बातें करते रहते हैं
उतनी ही बातें औरों की सहते रहते हैं

मीठी बातें, खट्टी बातें .प्यारी बातें, खारी बातें
सुख की बातें, दुःख की बातें ,करते कितनी सारी बातें
हम अपने कानों में क्या कुछ भरते रहते हैं

कभी कभी ज्ञानी बन कर करते ऊँची बातें
और कभी हलके बन कर करते ओछी बातें
औरों की बुद्धि तुला पर हम तुलते रहते हैं

कभी खुद की खातिर थोडा वक़्त निकालो
खुद को कह लो, खुद को सुन लो , समझा लो
हम अपने आप से जाने क्यों डरते रहते हैं

खुद की बातों से ही हम खुद को जान सकेंगे
हम अपने जीवन को बेहतर पहचान सकेंगे
औरों  के संग तो आडम्बर करते रहते हैं

गुरुवार, 17 जून 2010

मेज थपथपाओ मृदंग की तरह

उड़ चला है आज मन पतंग की तरह
बचपन की भोली उमंग की तरह

ज्ञान ध्यान ओहदों को छोड़ किसी दिन
मस्त होके गाओ मलंग की तरह

मर मर के जीने की चाह छोड़ दो
और जियो जीने के ढंग की तरह

जीवन को दर्शन का लेख मत कहो
जीवन है हास्य भरे व्यंग की तरह

खेलो गुलाल फाग साल में इक दिन
रंगों में मिल जाओ रंग की तरह

शाम को तनाव का चश्मा उतार कर
मेज थपथपाओ मृदंग की तरह

बुधवार, 16 जून 2010

ताजे टमाटर

थोडा सा जायका बदलें . एक मित्र ने एक sms भेजा कुछ दिनों पहले. बहुत मजा आया पढ़ कर. उसी को एक लघु कथा का रूप दे रहा हूँ.
एक भिखारी भीख मांग रहा था - ' खाने को रोटी दे दो .....खाने को रोटी दे दो ......'
लोग सुन रहे थे लेकिन कोई ध्यान ही नहीं दे रहा था . एक सज्जन बाजार से निकल रहे थे , सब्जी भाजी खरीद कर. उस भिखारी की पुकार सुन कर रुक गए उसके पास.
भिखारी फिर बोला-' भूखा हूँ , खाने को रोटी दे दो ....'
सज्जन बड़े आराम से बोले - 'टमाटर खाओ' .
भिखारी बोला- 'साहब क्यों मजाक करते हो , मुझे तो एक रोटी ही दे दो .'
सज्जन बोले -' बोला ना , टमाटर खाओ '
भिखारी ने सोचा की ये साहब बाजार से ताजे टमाटर खरीद कर आ रहें हैं , इस लिए टमाटर देना चाहते हैं. भिखारी बोला- ' ठीक है साहब , टमाटर दीजिये '
सज्जन गरम हो कर बोले- ' त्या बतते हो , अब तमा तर भी मैं ही दूं तुमतो '
जी हाँ श्रीमान तुतला कर बोलते थे . क्यों, आया ना मजा ?

सोमवार, 14 जून 2010

घर इंटों की ईमारत का नाम नहीं

घर इंटों की ईमारत का नाम नहीं
घर जमीन की तिजारत का नाम नहीं
घर नहीं है एक चमचमाता म्यूजियम
घर नहीं है सोने के लिए एक वेटिंग रूम
घर नहीं है टेलीफोन पर रूम सर्विस
घर नहीं है -
मतलबी मुस्कान और बचे हुए पैसों की टिप्स
ईंट पत्थर के निर्माण को घर नहीं कहते
ऐसा होता तो मकबरों में भी लोग रहते

घर एक सजीव रचना है
जिसमे प्राण होते हैं
जिसका दिल धडकता है
जिसमे भावनाएं होती हैं
जिसमे कामनाएं होती हैं
जिसमे अपने होते हैं
जिसमे सपने होते हैं

पर्व और त्योहारों पर हँसता है घर
दुःख और विपत्ति में उदास होता है
हमारे ग़म में ग़मगीन होता है घर
हमारे सुख में शरीक होता है

घर की नींव में होता है विश्वास का पत्थर
घर की दीवारें सहयोग की इंटों से बनती हैं
जिन पर त्याग और सच्चाई का रंग रोगन होता है
जिन पर सुरक्षा की छत टिकी होती है

घर एक रसोई है ,
जिसमे परिश्रम का चूल्हा जलता है
घर एक मंदिर है
जिसमे श्रद्धा का दीपक जलता है

घर के दरवाजे
प्रतीक्षा की लकड़ी से बने होते हैं
घर की चौखट   में
स्वागत के फूल खिलें होते हैं

थके हारे दिन के लिए चाय का प्याला है घर
स्कूल से भूखे लौटे बच्चों के लिए निवाला है घर
तनाव से भरे सर पर अँगुलियों का अहसास है
और तपती दोपहरी में ठन्डे पानी का गिलास है

प्यार है घर , ममता है घर
समर्पण है घर , समता है घर
करुणा है घर , संतोष है घर
आस्था है घर, श्रद्धा है घर
विश्वास है घर , एहसास है घर
उत्साह है घर ,आभास है घर
मुस्कान है घर , सन्मान है घर
अभिमान नहीं , स्वाभिमान है घर

चांदी रूप चमकीला नहीं करती

ओस की बूंदे कभी गीला नहीं करती
सूर्य की किरणे कभी पीला नहीं करती

आसमां के रंग से सागर लगे नीला
नील बदली जल कभी नीला नहीं करती

चांदनी का रंग चाँदी से नहीं बनता
और चांदी रूप चमकीला नहीं करती

स्वर्ण के बिन भी चमकते लोग चेहरे से
स्वर्ण की आभा ही दमकीला नहीं करती

रविवार, 13 जून 2010

मानसून

धरती थी तपती
राम राम जपती
झुलस रहा दिन
घंटे गिन गिन
उमस भरी  रात
तारों से बात 
गस खाके घूमी
जैसे ही भूमि

प्यास है ज्यादा
पानी है कम
अम्बर की ऑंखें
तब हुई नम
सूरज भी पिघला
ठन्डे से निकला
हवा भी जागी
मंद मंद भागी

घबरा के बादल
हो गया पागल
छिड़का जब पानी
तब धरती रानी
थोडा सा जागी
बेहोशी भागी
बिजली तब कडकी
सूरज पर भड़की

मारोगे इसको
अब यहाँ से खिसको
सुन बादल प्यारे
और छींटे मारें
और फिर जग में
धरती की रग में
दौड़  उठा खून
बन  मानसून

शनिवार, 12 जून 2010

दर्द को साथी बना कर देखिये

जिंदगी के ग़म भुला कर देखिये
दर्द को साथी बना कर देखिये

दूसरों के कष्ट को अपना समझ
एक क्षण भर तिलमिला कर देखिये

भूल कर अपनी व्यथाओं की चुभन
एक रोते को हंसा कर देखिये

अजनबी भी सामने आ जाये तो
दोस्ती से मुस्कुरा कर देखिये

ये जहाँ संगीतमय लगने लगेगा
कोई नगमा गुनगुना  कर देखिये

एक अँधेरे रास्ते पर भूल के डर
जोर से सीटी बजा कर देखिये

शुक्रवार, 11 जून 2010

आदमी

निकलो जो खोजने नहीं मिलता है आदमी
यूँ दर बदर फिरते कई हजार आदमी

कितना सुखी है जानवर उसको पता नहीं
रोटी की दौड़ में लगा लाचार आदमी

पैसा कमा लिया बहुत सेहत के दाम पर
पैसा बहा रहा है अब बीमार आदमी

आराम से जीने के सब साधन जुटा लिए
जीने को वक़्त का है तलबगार आदमी

कुत्ते की वफादारी है काबिल मिसाल के
कुत्ता  है पर नहीं है वफादार आदमी

अपना शिकार मार कर खाता है जानवर
खाता है रोटी छीन कर 'खुद्दार' आदमी

मंडी में सारे माल के कुछ दाम है मगर
बेदाम के खड़ा सरे बाजार आदमी

अपनी बनाई सभ्यता की भंवर में फंसा
मरता है झूठी शान की मझदार आदमी

दुनिया की भीड़ भाड़ में चेहरे अलग अलग
संसार तो नाटक है , बस किरदार आदमी  
 

Union Carbide Rap


Listen to a musical outrage on Bhopal Gas Disaster

गुरुवार, 10 जून 2010

मन और जीवन

जो चाहो वो हो ना पाता. ना चाहो वो होता -जीवन
मन की इच्छाओं को भूल  जा, हर दिन  इक समझौता - जीवन 

कभी मेघ को देख गगन में मन मयूर खिल खिल जाता है
लेकिन फिर तूफानी अंधड़, बस्ती कई डुबोता - जीवन

कभी ह्रदय की कोमल बातें बन कर कविता बहना चाहे
तभी सामने कोई पहुँच कर अपनी पीड़ा  रोता - जीवन

कभी किसी छुट्टी के दिन बस, मन कहता विश्राम करेंगे
तभी पडोसी की बुढिया माँ, मर जाती , ये होता -जीवन

अपने मन की करनी हो तो , मन में अपना कुछ मत सोचो
जो होता है हो जाने दो ,ये उपाय इकलौता - जीवन

बुधवार, 9 जून 2010

इति भोपाल प्रकरणम !!!

सोचता हूँ
क्या वो बड़ी त्रासदी थी ,जो १९८४ में हुई थी
या फिर वो जो उसके बाद हुई है पच्चीस सालों में
उस त्रासदी में एक शहर चपेट में था , भोपाल
एक खतरनाक गैस का बुन गया जाल ,
जो रात भर में हजारों घरों में पहुंची
और सोये हुए इंसानों के फेफड़ों में
जहर बन के जा घुसी

जो खुशकिस्मत थे सोये रह गए
बाकी बच गए
एक खौफनाक जिंदगी जीने के लिए
हवा पानी मिटटी फसल पशु
सब कुछ जहर बन गया
दिसंबर दो का वो दिन कहर बन गया

लेकिन उसके बाद हुये  शुरू
सरकारी तमाशे
घडियाली आंसुओं के बीच
बटने लगे बताशे
जिसे पकड़ा जाना था उसी दिन
वो वारन एन्डरसन
भगा दिया गया सरकारी विमान में
पहुँच गया अपने वतन
आज वो मौज में है
कहीं छुप कर नहीं
अमरीका की नाक न्यू योर्क में

सरकार ने ले ली कमान
या समझो खोल दी दुकान
पीड़ितों को न्याय दिलाने की
दो लाख जन्मे अजन्मे बच्चे
आठ लाख वयस्क ,जो मर गए तीन दिसम्बर को
बारह लाख जो मरते रहे किस्तों में
और असंख्य जो अब भी चुका रहें किस्ते
मरने तक की

सरकार ने फाइल सलटा दी
सैन्तालिश करोड़ डॉलर लेकर
और बन गयी दिलदार दिलासे देकर
लेकिन वो पैसा गया कहाँ
विधवाओं की शुरुवाती पेंसन दो सौ रुपैये महीने में ?
कम आय वालों  का फ़ाइनल निपटारा  पंद्रह सौ रुपैये में ?
और आखिर में
मरने वालों का फुल और फ़ाइनल औसत बासठ हजार
न मर पाने वालों का पच्चीस हजार
सवा दस लाख क्लैमों में
आधे निपट गए बिन पैसों के
क्योंकि वो गरीब सिद्ध नहीं कर पाए
कि उनके भी दर्द थे बाकी आधे जैसों के

यह था सरकारी न्याय आर्थिक रूप से
और जो बचा था गैर-जिम्मेवारी का दंड
उसका भी फैसला आखिर हो ही गया
भोपाल की कचहरी में , आज दो हजार दस में
सरकार की मंशा का मसला
जाहिर हो ही गया
दो दो साल की सजा कुछ बड़े लोगों को
जो उन्हें होनी नहीं इस जीवन काल में
जमानत ,तारीखें, अपील होती रहेंगी हर हाल में


और इस सरकारी त्रासदी के अन - उत्तरित प्रश्न
किसने भगाया वारन एन्डरसन को
और फिर क्यों नहीं माँगा गया वो अमरीका से
किसने दबा दी इनक्वारी की फाइल
कहाँ गए बचे हुए हजार करोड़ रुपैये
क्या मिला पीड़ितों की प्रभावित नस्लों को
क्यों नहीं दण्डित हुआ कोई

त्रासदी यह है मित्रों !
इस देश में इंसान की कीमत बहुत सस्ती है
और उस से भी सस्ती हमारे नेताओं की मानसिकता .
इति भोपाल प्रकरणम !!!

मंगलवार, 8 जून 2010

आईने में

अपना चेहरा जब भी देखा आईने में ,
कितना झूठा पाया खुद को आईने में .

झूठी शान दिखाता रहता दुनिया में ,
कितना हल्का खुद को लगता आईने में .

दुनिया कहती मुझको मैं कोई फ़रिश्ता हूँ ,
खुद को मैं क्यों पापी लगता आईने में .

अकड़ा फिरता हूँ ऊँची इज्जत की धुन में ,
बस नाटक सा करता दिखता आईने में .

शनिवार, 5 जून 2010

वक़्त

हम वक़्त से लड़ते रहे हर वक़्त बेवजह
पर वक़्त तो चलता रहा हर वक़्त बेवजह

हम बांध पाए कब समय का एक भी लम्हा
बांधी कलाई पर घडी हर वक़्त बेवजह

हम हर समय कहते, अभी तो वक़्त नहीं है
था वक़्त हर दम वक़्त , हम बेवक्त  बेवजह

हम सोचते रहते, वक़्त क्यों बीत रहा है
इस सोचने में बीत गया वक़्त बेवजह

हर जिंदगी दीवार पर लटकी हुई घडी
रुक जाये सांसों कि सुई किस वक़्त बेवजह

शुक्रवार, 4 जून 2010

कैंसर

संदेह होता है
ईश्वर की न्याय व्यवस्था पर
जब देखता हूँ किसी स्वस्थ इंसान को
जाते हुए कैंसर की गिरफ्त में

हँसता खेलता जीवन ,
पत्नी की ख़ुशी
बच्चों की खिलखिलाहट
माता पिता का संतोष
मित्रों की मस्ती
सब कुछ गायब हो जाता है

रह जाती है
एक उदास जिंदगी
बाथरूम में खुल कर रोने के बाद
 बाहर आकर
पत्नी की झूठी मुस्कराहट
स्कूल से लौट कर
सीधा खेल के लिए दौड़ लगाने वाले
बच्चों का सामान्य से अधिक समय देना
बात बात पर अपनी बीमारी
और जरूरतों के जिक्र की जगह
माता पिता की बातों से
शिकायतों का गुम हो जाना
होली दिवाली दिखने वाले
रिश्तेदारों का निरंतर आना जाना
बेदर्दी से घेर कर पार्टी लेने वाले
दोस्तों का बाहर चलने का आग्रह .

और इन सबके बाद
अपने अकेले का समय
सर पर हथोड़े से मारता है
क्या होगा पत्नी का ?
बच्चों का भविष्य ?
माता पिता का बुढ़ापा ?
बीमारी का कर्ज ?
और भी सैंकड़ों प्रश्न .

ईश्वर ! उत्तर दो !
क्या औचित्य है ?
एक पूरे परिवार को एक साथ दंड देने का .
कौन सा साझा पाप पुण्य है
कुछ समझ में नहीं आता ,
बस लगता है -
ये ईश्वर -विश्वर सब बकवास है
मनगढ़ंत कहानी है

मृत्यु से कौन डरता है !
डर लगता है जिंदगी से -
कैंसर के साथ.

गुरुवार, 3 जून 2010

सत्ता

हो रहा है आदमी हलाल देखिये
खा रहे हैं नोच कर दलाल देखिये,

चाटते  मलाई जो सत्ता में आ गए
आ न सके उनका मलाल देखिये,

सौ करोड़ लोग पसीना बहा रहे
पांच  सौ* का इत्र का रूमाल देखिये,

खून में सना है जो सीमा पे मर गया
टी वी पे मंत्रियों का जलाल देखिये .

(* सांसद)

सोमवार, 31 मई 2010

नीलकंठ

हम - हम सब
रोज पीते हैं - न जाने कितना विष
विष शब्दों का - विष अपशब्दों का
विष तानो का - विष तनावों का
विष गैरों का -विष अपनों का
जिन्दा रहते हैं हम फिर भी
इतना विष पीकर भी
पता हैं क्यों ?

क्योंकि
ढेर सारे विष के सामने
हमें मिलती है अमृत की कुछ बूंदे
कहीं न कहीं
कभी न कभी
किसी न किसी से .
यह अमृत हमें अमर बना देता
अगर हमारे अन्दर
इतना विष न भरा होता

फिर भी अमृत अमृत है
कुछ बूंदे भी काफी है
असंख्य विषों को प्रभावहीन करने को;
लेकिन जब विष भर जाये हलक तक
अमृत की बूंदे हो जाये अपर्याप्त
तब हमारे अन्दर का अंतर
उगल डालता है यह घोर विष
किसी और पर
और इस तरह हम सब
बांटते  रहते हैं ,अपने जीवन के विष को

जब हम थूक नहीं पाते अपने विषों को
उन पर
जिन्होंने हमें यह दिया था
तो हम उसे थूकते हैं उन पर
जो हमें अमृत देते हैं
इसलिए नहीं कि
हम उन्हें दुःख देना चाहते हैं
बल्कि इसलिए कि
वही लोग - सिर्फ वही लोग
हमारे उगले हुए विष को
अंजुरियों से पी लेंगे
और फिर भी लौटायेंगे
हमें अपना अमृत

हमारे विष से
उनका हलक सूख जायेगा 
गर्दन नीली पड़ जाएगी
लेकिन वे कहलायेंगे
नीलकंठ
शिव कि तरह
और फिर भी बाँटेंगे
अमृत
आजीवन !!
आमरण !!!

रविवार, 30 मई 2010

अनाम तुम!

चंद घंटों पहले
तुम कितने सुरक्षित थे
न सर्द हवा के झोंके
न भूख का तकाजा
न जीने की चिंता
 न मरने का डर
माँ के गर्भ में
नरम थे , गरम थे

शुरू हुआ तुम्हारा संघर्ष
तब , जब आये तुम बाहर
इस बेरहम दुनिया की दहलीज पर
जहाँ तुम्हारे लिए खड़ी थी
एक अनाम जिंदगी
एक बदनाम मौत
वर्षों जीने का पाप
न मर पाने का श्राप

आज से तुम्हारी मित्र है
भुखमरी और लाचारी
दुर्बलता और बीमारी
बिलखता बचपन
अपराधी यौवन
रिसता बुढ़ापा
प्रश्नवाचक जीवन

तुम्हारा दोष क्या ?
तुम्हारा 'तुम' होना
होकर भी गुम होना
बिन नाम के अनाम तुम
आये हो पर गुमनाम तुम
एक बिन पते के लिफाफे से
डाक के डब्बे  सी दुनिया में
जिस पर मुहर नहीं लगी
पोस्ट मास्टर समाज की
बेमानी रिवाज की

अनाम तुम! गुमनाम तुम!!

शनिवार, 29 मई 2010

अशांति

कितनी अशांति बिखरी है ,यूँ जग जीवन में
जैसे कोई धुआं फैले एक उपवन में

उपवन में हम खुशबू लेने को आये थे
कुछ अपना इस उपवन को देने आये थे
क्यूं फर्क आ गया लेने देने का मन में

हमने कुछ ताज़ा फूल यहाँ से तोड़े भी
उन फूलों के गुलदस्ते हमने जोड़े भी
फिर 'और अधिक' के कांटे बींध गए तन में

सूखे पत्तों को हमने आग दिखा डाली
फूलों की खुशबू  में दुर्गन्ध मिला डाली
ऐसे अशांति फैला डाली इस बगियन में

बुधवार, 26 मई 2010

जिन्दगी छोटी सी

कर चुके झगडा बहुत, मत रोइए
जिन्दगी छोटी सी है , मत खोइए

बात करने को समय मिलता नहीं
मौन रह कर वक़्त को मत खोइए

हो गया बस ,कह लिया कुछ सह लिया
पोंछ कर आंसू , ये चेहरा धोइए

फेर कर मुंह कर चुके अभिनय बहुत
अब जरा कंधे पे सर रख सोइए

शनिवार, 22 मई 2010

मन

मिलने को व्याकुल था कितना , फिर भी क्यों कतराया मन
मैं ही झुकता जाऊं क्योंकर , यह कह कर इतराया मन

चाहत बिखरी कण कण में थी , इच्छाएं पल पल में थी
सब कुछ पाने की ख्वाहिश में , बिखरा और छितराया मन

फूलों की चाहत में कितनी , खुशियाँ दिल में बसती थी
अब फूलों के बीच खड़ा मैं, जाने क्यों मुरझाया मन

यह कर लूं मैं , वह कर लूं मैं , सपने हर दम बुनता था ,
करने का जब वक़्त हुआ तो , क्यों सोया सुस्ताया मन

जब तक थे अवसर , मन घूमा फिरता था आवारा सा
छूट गयी जब डोर समय की , अब है क्यों पछताया मन

बुधवार, 19 मई 2010

माँ

हुई लड़ाई मित्रों से और लड़ कर लौटा घर मैं
मन में गुस्सा और हताशा लेकर लौटा घर मैं
आंसू अटके थे पलकों पर मन पर पत्थर था
अच्छा कुछ भी नहीं लग रहा था जब लौटा घर मैं

माँ ने देखा हाल मेरा और सब कुछ समझ लिया
सर पर फेरा हाथ और सीने से लगा लिया
अब न रुक सके आंसू मेरे झर झर बह निकले
कस कर माँ को पकड़ा मुह आँचल में छुपा लिया

कैसे समझ लिया करती हर बात मेरी बचपन में
मैं कुछ कह भी न पाता जब - व्यथा मेरी जो मन में
माँ , मैं तेरा ही हिस्सा तू हरदम यह कहती थी
चोट मुझे लगती होता था दर्द तुम्हारे तन में

माँ ही देवी , माँ ही भक्ति , माँ पूजा ,माँ इश्वर
माँ ही दीपक, माँ ही आरती ,माँ तीरथ, माँ मन्दिर
माँ की ममता से ज्यादा शीतल न मिलेगी गंगा
माँ के वचन रिचाओं जैसे छपे ग्रन्थ के अक्षर

सोमवार, 17 मई 2010

कुछ पता नहीं

कल जीवन में क्या होना है कुछ पता नहीं
है आज रात सोना और कल फिर उठना है
उठना भी है या नहीं - हमें कुछ पता नहीं

कितनी आपाधापी में चलता जीवन है
जीने की खातिर मरता रहता ये तन है
जिस रोटी को पाने को हम लड़ते रहते
थाली में है, पर मुख में हो, कुछ पता नहीं

रोटी की बात नहीं, चिंता है बरसों की
प्राणों को खबर नहीं अगले कल परसों की
न होने वाली बातों से डरते रहते
जो होना ही है, उस डर का कुछ पता नहीं

पंछी को कस कर पकड़ा तो मर जाएगा
जब चाहा पिंजरे से उड़ के घर जायेगा
पंछी को उड़ने दो पंखों को मत छेड़ो
यह कितनी दूर चला जाए कुछ पता नहीं

शनिवार, 15 मई 2010

एक पल

एक पल यूँ जी लिया ,बस जिंदगी को जी लिया
एक मधुकण पी लिया जीवन का अमृत पी लिया

जिंदगी की चाहतों का अंत कुछ होता नहीं
स्वप्न अपना जी लिया तो चाहतों को जी लिया

सौ बरस की जिंदगी को क्या करूँ जी कर भला
एक दिन में जैसे हमने एक जनम को जी लिया

प्यास बुझ सकती नहीं सावन की इक बरसात से
अंजुरी पर होठ रख कर सारा सावन पी लिया

बुधवार, 12 मई 2010

जिंदगी और मौत

जिंदगी का क्या भरोसा कब तलक चल पायेगी
मौत का पक्का है वादा एक दिन वो आएगी

सांस के तारों के सुर जिस दिन कहीं खो जायेंगे
गोद में रख सर , सिरहाने मौत गुनगुनायेगी

रात भर जो जल चुका उस दीप सी वीरान आँखें
जिंदगी के पार कोई लौ सी टिमटिमाएगी

शब्द अंतिम कह चुके होठों पे इक मुस्कान होगी
इक वही मुस्कान सब कुछ, अनकही कह जाएगी

स्पर्श की सीमा में सीमित , प्रेम जब बंधन न होगा
आत्मा ब्रह्माण्ड में घुल , प्रेममय हो जाएगी

बुधवार, 5 मई 2010

बुढ़ापा

जीवन एक वीरान हवेली सा
जिसमे यादों के उलझे से जाले
तन्हाई की हैं परतें उतर रही
पतझड़ के पेड़ों सी दीवालें

छत उलटी लटक रही सर पे कब से
इसने हर पल को है जाते देखा
इसने देखी रातों की परछाई
सूरज को खिड़की से आते देखा

इस जीवन के अन्दर कितनी हलचल
कितना असमंजस कितना कोलाहल
कितनी बातें दिखती , घटती रहती
मन के सागर में कितनी उथल पुथल

पर फिर भी अंतर में सन्नाटा है
सब कुछ होकर भी यह ख़ामोशी है
हो इन्तेजार जैसे कुछ होने का
दस्तक कब दे दे मौत पडोसी है

मंगलवार, 4 मई 2010

We The Civilised Society

Kasab is in news, once again. 26/11 has become history. Kasab is the only source of reminder of those dreadful three days. Media makes full use of Kasab's trial by recreating the scenes of attack by terrorists. Terror terrorises, but terror sells too. Court is busy telling Kasab, how many crimes he did. Today the court will pronounce the punishment! May be a death sentence.

Death sentence- how many times? Can the court senetence a man to death 52 times, or 100 times? No, as the criminal will not live to face the second one once he is hanged. Than why so much drama? If we need to complete the formalities of trial we may go on doing it forever. But why delay the execution of a dangerous terrorist like Kasab in the name of justice.

Our justice is funny. We have people arrested and locked in the lock up, just on the basis of petty complaints or suspicions. People are inside for years altogether as their trial never starts.And there is nobody to bail them out. A grave injustice to such innocent poor people.On the other hand people like Kasab are enjoying the right to live inspite of killing people at large in broad daylight.

This is not all. Even for the noose, Mr. Kasab will be in a long waiting list. There are dozens of people in waiting to be hanged. And he is in great company of other dreaded terrorists, who attacked Indian parliament , now almost a decade ago. And the same parliament can not find any ways and means to expedite such sentence fast.

It is all so absurd. I will never understand.However, waiting what the Judge Tahilyani has got to give to Kasab today!!

गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

तनहाइयाँ

रास्ते लम्बे नहीं , लम्बी हैं ये तनहाइयाँ
आदमी बौना मगर , लम्बी हैं ये परछाइयाँ

मन यूँ ही बस डूबता उतरा रहा हर लहर में
है किसी सागर से गहरी मन की ये गहराइयाँ

बेसुरा हर राग है मन में उदासी छा रही
मन दुखी तो बेसुरी लगती है ये शहनाइयां

कोई पत्ता भी नहीं हिलता हवा खामोश है
उमस तो घटती नहीं कितनी चले पुरवाइयां

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

Peacocks

Hi readers! I am travelling in South of India.Right now I am at Madurai in Tamilnadu. Came here for some work, but the pleasure element of this trip is also very strong. I am staying at a resort called Gateway-Pashumalai, owned by Taj group. Needless to stay any place ownned by Taj Group is classy. This place is different. You feel as if you are staying in some British property with touch of class.Lovely place on a slope.You can see whole of Madurai from here.

Let me come to the point. The best part of the stay here is Peacocks.This large lush green hilly resort is full of peacocks.You walk a little on the inside road and you may come across a beutiful peacock with long colourful feathers.And still the best part, the peacocks may appear in front of your glass window and start dancing. This is all natural. Not managed by the Taj management. The only good contribution of the management is that they let the peacocks live here with dignity and care. And they dont charge for this world class entertainmnemt.

A peacock is our national bird. I always knew that. But why? That I know now.

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

We the Indians?

Life is no more dull. We have life full of IPL now. IPL has gobbled up the entire news space in Indian print media. The whole nation is enjoying the spicy chaat. You start your day with hot updates about IT raids on IPL franchisees, BCCI's board meeting and Lalit Modi's attempt to postpone it. As if this much was not sufficient the whole of NCP has come into news. All for wrong reasons. One minister's daughter diverted Air India flights, keeping the original passengers stranded, to accomodate the IPL guys, another minister's daughter busy in explaining the status of her husband's share holding in a company which enjoyed the hefty bribe.

Shashi Tharoor was the first wicket down. Poor fellow lost his ministry. His girl friend still not decided how much was her share in the Kochchi IPL company. Busy explaining her friendhsip with Shashi. Congress party found it convenient to get rid of the twitter, as his twitting was getting on lot of people's nerves.

Tomorrow is the final of IPL-the cricket. Whole nation is excited about it. Large screens, IPL parties, Cricket over cocktails..... Its like having some national festival.And few lucky ones are busy telling for how much did they acquire the ticket for live viewing of the cheer girls (Cricket is better visible on TV, I feel). Lot of betting will start with the toss on the field. The odds of betting keep on changing with every ball, every four. every six and every wicket. Some smart people bet on both teams in such a way, that they finally get money. How, I do not know. If I had known I would not be wasting my time writing this blog.

Once this final is over, the second part of the IPl will start. The IPL of politics, IPL of corruption, IPL of mud slinging, IPL of political blackmails etc. The whole nation will continue to enjoy the hot chaat masala news through media.

Do we have a say in national affairs? Are we bystanders? Unfortunately we, Indians are more keen in being Mumbai Indians than INDIANS, we do not relate anything to ourselves. It is anybody else's duty always. That is why the nation runs this way. Am I wrong?

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

हे मानव

हे मानव ! हे मानव ! तू ईश्वर की स्तुति कर

जब दूर तलक दुःख के बादल छाए हों
घनघोर अँधेरे जीवन में आये हों
तब दोनों हाथ जोड़ कर के
तू ईश्वर की स्तुति कर

जब भी अभाव की चिंताएं घेरे हों
पापों की तरफ कदम बढ़ते तेरे हों
तब दोनों आँख मूँद कर के
तू ईश्वर की स्तुति कर

जब मन के दोषों से चाहो छुटकारा
मन में छेड़ो प्रभु चिंतन का इकतारा
फिर मन में खुशियाँ भर कर के
तू ईश्वर की स्तुति कर

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

आज कल

वक़्त पे जो काम आ गया वो मित्र है,
वर्ना एल्बम में लगा बस एक चित्र है ।

पाप है जो दूसरों को कष्ट दे रहा
दे सके जो मुस्कुराहटें पवित्र है ।

छल कपट के बाग़ में दुर्गन्ध है भरी
मेहनतों के खेत का पसीना इत्र है ।

झूठ, पाप, छल कपट तो आम बात है
आजकल ईमान धर्म ही विचित्र है ।

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

वाणी

जीवन का मधुरतम अंग -वाणी
जीवन का क्रूरतम अंग - भी वाणी

जब प्रसव की वेदना से ,
आहत होती है माँ
पराकाष्ठा शारीरिक कष्ट की वहां ;
तभी कानों में पड़ती है
शिशु के रोने की आवाज
कष्ट का उसी क्षण बदल जाता अंदाज
वेदना के बीच खिल उठते हैं
पुष्प कितने मन में ,कितने तन में
बन जाती है ममता का चरम रूप
शिशु की पहली वाणी

घर गृहस्थी की चक्की में
पिस रहा होता है जीवन
दौड़ धूप , आपा -धापी और उलझन
बौखलाया सा मन ,तिलमिलाया सा तन
इसी बीच -
शिशु ने पहली बार कहा माँ
सारे कोलाहल के बीच जैसे
मंदिर की घंटी बज गयी
पीछे रह गयी बौखलाहट
गायब हुई तिलमिलाहट
चमत्कार हो गया
मन जैसे पिघल कर
प्यार प्यार हो गया

और किसी देवी के
जीवन में सब कुछ है
वैभव हैं तन मन के
साधन हैं जीवन के
शान शौकत , नौकर चाकर
ऐश आराम सारे पाकर
ऐसा कुछ हो गया
जिससे मन रो दिया
सारा ऐश्वर्य धरा रह गया
कानों में जैसे
गरम शीशा बह गया
आता जाता कोई
बाँझ उसे कह गया
वाणी की मार से दिल छलनी हो गया

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

बेढंगी जिंदगी

हमने अजीब जीने का ,ये ढंग कर लिया
दुश्वारियों को खुद ही अपने संग कर लिया

खुसबू मेरे गुलों की है ,कोई दूसरा न ले
हमने चमन के रास्तों को तंग कर लिया

फूलों के तितलियों के रंग को जी न सके हम
दिल पे उदास स्याह हमने रंग कर लिया

औरों के इक मजाक से हम तिलमिला गए
औरों पे हमने जब भी चाहा व्यंग कर लिया

जो मिल गया उसी में ख़ुशी पा सके न हम
जो मिल न सका उन ग़मों को संग कर लिया

ढूँढा खुदा को मंदिरों की भीड़ भाड़ में
दिल के खुदा की बंदगी को बंद कर लिया

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

वो दिन

कैसे भूलूँ मैं उन्हें यादों से ना जाये वो दिन ,
कैसे बिसराऊँ उन्हें दिल में समाये हैं वो दिन

एक एक पल तो सजा है , दिल के दरवाजों पे यूँ
जैसे दिवाली के दीपक जगमगाए हैं वो दिन

भीड़ में तो फिर कभी खो जाते बच्चों की तरह
पर अकेले में हमें छाती लगाये हैं वो दिन

कितना रीता सा मैं हो जाऊँगा गर ये ना मिले
मेरे घर आते रहेंगे बिन बुलाये से वो दिन

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

मुफ्त

इस ज़माने में भी कुछ सामान मुफ्त है
हंस के देखिये अभी मुस्कान मुफ्त है

जिंदगी भर लेटने सोने के दाम थे
मर गए तो मौज है शमशान मुफ्त है

पेड़ से टूटे हुए गुल है बड़े महंगे
मेज पर टूटा हुआ गुलदान मुफ्त है

सांस लेने को हवा हासिल नहीं घर में
छत उड़ाने के लिए तूफ़ान मुफ्त है

मंदिरों में आज कल प्रसाद नहीं है
चाहिए जितने भी तो वरदान मुफ्त है

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

कुछ ढूंढता हूँ

गैर बेगानों में हमनशीन ढूँढता हूँ
मैं अपने पावों के लिए जमीन ढूंढता हूँ

दिमाग का हर काम तो मशीन कर रही
दिल का भी करे काम वो मशीन ढूंढता हूँ

हर शख्स दगाबाज है किस पे करें यकीन
हर शख्स में जरा सा यकीन ढूंढता हूँ

मतलब परस्त दौर में बदसूरती भरी
इंसानियत का चेहरा इक हसीं ढूंढता हूँ

What Cricket!!!!!!!!!!

IPL has taken the nation into an evening frenzy.Every evening almost 6 hours are spent by people in front of idiot box.I have always been fond of cricket.Always tried to watch matches. In my younger days I used to go to Eden Garden when I lived in Kolkata to watch Test Matches- for all five days.The stadium was not covered on top in those days.Sitting on cement slab, under scorching sun, with a cap on the head- I watched the whole match so religiously as if India's fate depended on my watching the match. Eight of ten matches used to get finished in a draw.Perhaps my driving force was loyalty to India.

Than came One Day matches. It took some time to get used to this new format. Gradually it was accepted.When Kerry Packer first introduced this format, it was called the Kerry Packer Circus.Played at night underflood light, in a picnic atmosphere.But the sense of loyalty was maintained.

Now this T20 thing. After watching many matches in this season, I realise that there is no entertainment in this.Ball after ball, the same cycle is repeated.A blind hit which may cause a six or a four or a wicket.It is a rut, which does not give a scope of any variation.In earlier two formats- a sixer or a four was a spice of the game.Here just another lofted shot.Yes some people enjoy it thorughly.Who? Those who bet on the teams. They have a sense of loyalty for the team which will make them earn some bucks.

This is business, friends! Those who play make money, organisers - huge money, telecasters- lots of it and the betters when they win. Others are wasting their time on it. What do you say?

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

Another one from Houston trip

Hi all ! While reading my own blog today I am reminded of another interesting experience during my latest trip to Houston. Sharing that here. Like me - Manju, my cousin sister was stayig with another neighbour of Bela. Raju Bhai….another Gujarati gentleman. Very friendly family. On the previous day of wedding, Manju had to return to her place of stay to get something from her room. Some car dropped her to Raju bhaii’s house. She entered the house through the garage as per the practice. She was not aware that the Electronic Security system of the house was activated by Raju bhai’s wife, presuming no one will return earlier than them that evening.

Lo! The alarm went off!!! In no time some Police guy, as narrated by Manju later( Could be some one from Security Company also) arrived at the house and rang the main door bell. Manju was scared to the bones. She was alone in the huge mansion and some Police guy was standing outside the glass door askng her to open the door. She did. He enquired who was she? She was shivering and was in tears. She somehow manage to tell him that she was a guest from India for the wedding. He checked with the wedding house and got the confirmation.

So that is the other side of Houston. People are casual with the Guests. Yet they secure their houses properly for uninvited strangers. In this case it misfired though. Ha…ha..ha

Humanity & Houston

Hi everyone! I am starting writing here on suggestion of my daughter Pallavi. I decided to write thinking that I already have at least one visitor to my blog. Let me narrate an experience of attending an Indian wedding in USA earlier this month. I went to Houston, USA to attend the wedding of my sister Bela’s son Vibhore. The wedding was kept small for personal reasons.

We, the guests from India- numbering about 15, other than direct family members were received and housed in the neighbourhood. Initially we had all kinds of doubts. Will it be practical to stay in some one unknown’s house? More concern was for the host. How will some one feel cmfortable with a stranger living in their house! Well, the stay turned out to be a memorable experience for all of us. I stayed with a Doctor family, in their lovely mansion. They spared three rooms for us, 5 of us from the guests from India. They are Gujaratis. Their stores were full of Gujarati farsan, fridge with lots of fruits, milk and yogurt and bar fully stocked. When they welcomed us, they gave us a nice tour of their house, telling what is available where. The kitchen was an open kitchen with all gadgets. It was easy for us to manage our morning tea. They had the computer installed in the living room with Internet connected. Finally they handed us over one remote controll of their entry through Garage, so that we may come and go any time.

Hospitality was at its best. They gave us car ride to reach my sister’s house for all functions and rituals. Huge collection of old hindi songs fed into their music system, audiable everywhere in the house was at our beck and call. I can not think of anything that could be required and was not available for us.

I always heard from my elders, how in our villages whenever a barat came for a wedding, all neighburs and villagers shared the burden of accomodating the guests in ther houses. An impression is set in our minds that such caring and sharing was possibe only in olden days. Ths visit to Houston has made me aware that humanility is same as it used to be in earlier days, only our environment, our circumstances make us less concerned. There , in USA also people have business and jobs, and have limited hours- what binds them is the need for mutual co-operation. Everyone needs there everyoe else as life is more community dependent.

Great Experience!!!