मैंने यहाँ खुला रख छोड़ा है , अपने मन का दरवाजा! जो कुछ मन में होता है , सब लिख डालता हूँ शब्दों में , जो बन जाती है कविता! मुझे जानना हो तो पढ़िए मेरी कवितायेँ !
Mahendra Arya
The Poet
रविवार, 3 अप्रैल 2016
गुरुवार, 24 मार्च 2016
देश मांगता आजादी
देश मांगता आजादी
गद्दारों से -आजादी
मक्कारों से -आजादी
देश को गाली देने वाले
सब नारों से -आजादी !
मुफ्तखोरों से -आजादी
छुपे चोरों से -आजादी
देश का खाकर उल्टा बोले
उन छिछोरों से आजादी !
उन नेताओं से आजादी
उन श्रोताओं से आजादी
जेएनयू में राजनीती के
कर्ताओं से -आजादी !
अलगाववाद से -आजादी
आतंकवाद से - आजादी
इनको शह देने वाले दल की
हर बकवाद से आजादी !
सस्ते में मिल गयी - आजादी
धूर्तों को मिल गयी -आजादी
इसीलिए वो नहीं समझते
क्या होती है - आजादी !
दी भगत सिंह ने आजादी
दी राजगुरु ने आजादी
बिस्मिल, सुखदेव की क़ुरबानी
और दी आजाद ने आजादी !
गद्दारों से -आजादी
मक्कारों से -आजादी
देश को गाली देने वाले
सब नारों से -आजादी !
मुफ्तखोरों से -आजादी
छुपे चोरों से -आजादी
देश का खाकर उल्टा बोले
उन छिछोरों से आजादी !
उन नेताओं से आजादी
उन श्रोताओं से आजादी
जेएनयू में राजनीती के
कर्ताओं से -आजादी !
अलगाववाद से -आजादी
आतंकवाद से - आजादी
इनको शह देने वाले दल की
हर बकवाद से आजादी !
सस्ते में मिल गयी - आजादी
धूर्तों को मिल गयी -आजादी
इसीलिए वो नहीं समझते
क्या होती है - आजादी !
दी भगत सिंह ने आजादी
दी राजगुरु ने आजादी
बिस्मिल, सुखदेव की क़ुरबानी
और दी आजाद ने आजादी !
रविवार, 6 मार्च 2016
बस शोर हो शोर है।
संसद 
कभी तालियों का जोर है
कभी गलियों का जोर है
संसद अब कुछ नहीं
बस शोर हो शोर है।
जब प्रतिपक्ष गरियाता है
सत्तापक्ष सुनता है
जब सरकार धमकाती है
विपक्ष सर धुनता है।
हर बकवास का उत्तर देने को
एक नयी बकवास तैयार होती है
फिर उसके उत्तर के लिए
एक और बकवास की मार होती है।
जो बोल नहीं पाते
वो फड़कने लगते हैं
जिन्हे समय नहीं दिया जाता
वो भड़कने लगते हैं।
ऐसा लगता है -
संसद एक थिएटर है
जिसमे साढ़े पांच सौ
एक्टर हैं
जिसकी टिकट
यूँ तो मुफ्त है
लेकिन हमारी जेब के करोड़ों
हर घंटे लुप्त हैं
कभी कभी संसद
चलने नहीं देते
चलने देते
तो क्या कर लेते
उस अनदेखी
असहिष्णुता के लिए
दिनोदिन चलती है
बहस
लेकिन सियाचिन में
मरने वालों के लिए
होता है मौन
आधे मिनट का
सत्र पर सत्र
बीत जाते हैं
खजाने के खजाने
रीत जाते हैं
पर फैसले
कभी नहीं होते
जरुरी बिलों पर
देश के निराश दिलों पर
बाल की बस
खाल निकलती है
चाल पर चाल
निकलती है .
पांच साल
यूँ ही चलता है
फिर अगले पांच साल के लिए
दिल मचलता है

कभी तालियों का जोर है
कभी गलियों का जोर है
संसद अब कुछ नहीं
बस शोर हो शोर है।
जब प्रतिपक्ष गरियाता है
सत्तापक्ष सुनता है
जब सरकार धमकाती है
विपक्ष सर धुनता है।
हर बकवास का उत्तर देने को
एक नयी बकवास तैयार होती है
फिर उसके उत्तर के लिए
एक और बकवास की मार होती है।
जो बोल नहीं पाते
वो फड़कने लगते हैं
जिन्हे समय नहीं दिया जाता
वो भड़कने लगते हैं।
ऐसा लगता है -
संसद एक थिएटर है
जिसमे साढ़े पांच सौ
एक्टर हैं
जिसकी टिकट
यूँ तो मुफ्त है
लेकिन हमारी जेब के करोड़ों
हर घंटे लुप्त हैं
कभी कभी संसद
चलने नहीं देते
चलने देते
तो क्या कर लेते
उस अनदेखी
असहिष्णुता के लिए
दिनोदिन चलती है
बहस
लेकिन सियाचिन में
मरने वालों के लिए
होता है मौन
आधे मिनट का
सत्र पर सत्र
बीत जाते हैं
खजाने के खजाने
रीत जाते हैं
पर फैसले
कभी नहीं होते
जरुरी बिलों पर
देश के निराश दिलों पर
बाल की बस
खाल निकलती है
चाल पर चाल
निकलती है .
पांच साल
यूँ ही चलता है
फिर अगले पांच साल के लिए
दिल मचलता है
सोमवार, 15 फ़रवरी 2016
हनुमंतप्पा
वो सफ़ेद कब्रिस्तान -सियाचिन
जहाँ जीवित रहना एक विजय है
साँसे ले पाना - एक दिलासा
वहां !
हाँ वहां , पहरा देते हैं कुछ जुझारू जवान
घर की सुरक्षा से दूर
परिवार के प्यार से परे
शहरों की रंगरेलियों से अनजान
झेलते बर्फ के तूफ़ान !
ऐसा ही तूफ़ान आया उस दिन
दौड़ शुरू हुयी जीवन और मृत्यु के बीच
वो दस जवान , पीछे तूफान
एक एक कर के हारते गए
उस अस्सी मील प्रति घंटा की रफ़्तार से
आ रही मौत से !
हार नहीं मानी - लांस नायक हनुमंतप्पा ने
सो गया बर्फ की चादर पर
ओढ़ ली बर्फ की रजाई
मौत से कह दिया - दस्तक मत देना
थका हुआ हूँ सोने दे मुझे
और फिर वो बर्फ का तकिया लगा कर
सो गया भारत माँ की गोद में !
मौत एकटक देखती रही
भारत माँ के उस बहादुर बेटे को
हिम्मत नहीं पड़ी उसे जगाने की
पूरे छह दिनों तक !
मृत्यु का विजेता
घर आया , देश को प्रणाम किया
और फिर चला गया
अपनी मृत्यु अपनी इच्छा से चुन कर !
और उसी दिन
एक जलसा हुआ जवाहर लाल विश्वविद्यालय में
श्रद्धांजलि देने के लिए
शहीदों को !
लांस नायक हनुमंतप्पा को नहीं -
देश की संसद के आक्रमणकारी
अफजल गुरु को !
कस्मे खायी गयी
बर्बाद करने की -
दुश्मन को नहीं अपने देश की !
कितना रोई होगी हनुमंतप्पा की आत्मा -
हमने अपना जीवन गलाया
ऐसी खौफनाक मृत्यु को गले लगाया
इन गद्दारों के लिए !
दुर्भाग्य है देश का
शहीदों के लिए दो आंसू बहाने का वक़्त नहीं
जेएनयू में पहुँचते हैं हमारे नेता
गद्दारों को बचाने के लिए
मौके को भुनाने के लिए
वोटों को बढ़ाने के लिए !
शुक्रवार, 1 जनवरी 2016
Happy New Year !
हर साल आता है एक नया साल
अतीत और भविष्य के बीच
एक अर्ध विराम सी ३१ दिसंबर की रात्रि !
मनःस्थिति ऐसी होती है -
जो बीता वो सामान्य सा था
जो आएगा वो विशेष होगा।
जो बीत गया वो अनुभूत है
जो आएगा वो कल्पना
बस यही अंतर है।
हम उस यथार्थ को भूलना चाहते है
जो हमने जिया
पीछा छुड़ाना चाहते हैं उससे।
लेकिन जीना चाहते है सपनों में
भरना चाहते हैं कल्पना की उड़ान
एक अंतहीन यात्रा का लक्ष्य ढूंढते हैं अगले साल में।
लो नया साल शुरू हो गया
१ जनवरी की गुलाबी ठण्ड वाली सुबह
वही चाय का प्याला , वही अख़बार।
बस अख़बार की तारीख नयी है
कल २०१५ थी , आज २०१६ है
आइये खुश हो जाते हैं !
सोमवार, 16 नवंबर 2015
एफिल टॉवर
गूँज रही चित्कारें पेरिस में
गलियों में रोने की आवाजें हैं
फुटबॉल जहाँ पर खेला जाना था
जहाँ जोश दर्शकों में भर आना था
अफरा तफरी है मची वहां पर भी
प्राणों को लेकर भाग रही जनता
संगीत प्रेमियों का वो मंदिर था
सुर के साधन का साधन अंदर था
कानों में मिश्री घोल रहे सुर से
श्रोताओं की आँखे भी मूंदी थी
फिर वहां अचानक कर्कश आवाजें
बम की गोली चलने की वहीँ कहीं
फिर खून से हुए लथ पथ श्रोता सब
लाशों से पटी पड़ी थी वो भूमि
ये कैसा शैतानी हंगामा बरपा
क्यूँ रास नहीं आती उनको दुनिया
क्यों मौत लिए फिरते ये वाशिंदे
ईश्वर ने नहीं बनाये ये बन्दे
क्यूँ अल्लाह के ही नाम लिखे जाते ये कृत्य
क्यूँ मजहब की दीवारों पर ही लिखते
ये कैसे बन्दे है ये जेहादी
ये मानव के ही रूप में दानव से दिखते
एफिल टॉवर , तू देख रहा है न
ऊंचाई से तुझको सब दीखता
पहचान जरा कर ले इन चेहरों की
गिन गिन कर इनसे बदले तू लेना
हर एक जान की करले गिनती तू
कितना है खून बहा करले गणना
मानवता के इन हत्यारों से तू
मानवता का हिसाब चुकता करना
आइये चर्चा करेँ बिहार की
आइये चर्चा करेँ बिहार की
किस की जीत की
किस की हार की !
कुछ लोग प्यार करते हैं
अपनी बदनसीबी से
अपनी बदहाली से
अपनी गरीबी से
उस प्यार की ये जीत
लेकिन हार बिहार की !
जाति के चुम्बक से
खींची आती जातियां
मुठ्ठियाँ भिंच जाती
फूल जाती छातियाँ
संकीर्णता की जीत
हार मुक्त विचार की !
इतिहास सामने था
पिछले छह दशक का
अपने ही देश में रहे
पिछड़े की कसक का
इतिहास की ही जीत
हार जीर्णोद्धार की !
देकर जमानतें जो
जो छूट आये जेल से
प्रतिबन्ध जिसपे था
की दूर रहे खेल से
अपराधियों की जीत
हार कर्णधार की !
लड़ते थे देके गालियां
प्यासे थे खून के
मिल कर हैं बैठे
वोट के प्यासे जूनून के
मौका-परस्तियों की जीत
हार तेज धार की !
है देश खा रहा तरस
तुझ पर यूँ ऐ बिहार
तूने चुनी है अपनी
बदनसीबी बार बार
टूटी हुयी नौका की जीत
हार पतवार की !
किस की जीत की
किस की हार की !
कुछ लोग प्यार करते हैं
अपनी बदनसीबी से
अपनी बदहाली से
अपनी गरीबी से
उस प्यार की ये जीत
लेकिन हार बिहार की !
जाति के चुम्बक से
खींची आती जातियां
मुठ्ठियाँ भिंच जाती
फूल जाती छातियाँ
संकीर्णता की जीत
हार मुक्त विचार की !
इतिहास सामने था
पिछले छह दशक का
अपने ही देश में रहे
पिछड़े की कसक का
इतिहास की ही जीत
हार जीर्णोद्धार की !
देकर जमानतें जो
जो छूट आये जेल से
प्रतिबन्ध जिसपे था
की दूर रहे खेल से
अपराधियों की जीत
हार कर्णधार की !
लड़ते थे देके गालियां
प्यासे थे खून के
मिल कर हैं बैठे
वोट के प्यासे जूनून के
मौका-परस्तियों की जीत
हार तेज धार की !
है देश खा रहा तरस
तुझ पर यूँ ऐ बिहार
तूने चुनी है अपनी
बदनसीबी बार बार
टूटी हुयी नौका की जीत
हार पतवार की !
रविवार, 23 अगस्त 2015
हे पाकिस्तान !
हे पाकिस्तान !
शर्म आती है ये सोच कर
कि तुम कभी मेरा ही हिस्सा थे !
चकित होता हूँ ये याद कर के
कि तुम भी अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई का हिस्सा थे !
आजादी क्या मिली
तुम्हारे तो सुर ही बदल गए थे
हजारों वर्षों की दासता में साथ थे
आजादी में बाहर निकल गए थे !
तुम्हारा दोष नहीं
दोष है तुम्हारे रहनुमाओं का
शापित हो तुम , फल भुगत रहे हो
बंटवारे में मिली बद्दुआओं का !
आज मैं कहाँ और तुम कहाँ ?
देखता है सारा जहाँ
मैं हूँ प्रगतिशील दुनिया का सिरमौर
तुम हो एक आतंकवादी , झूठे और चोर !
हाँ चोर ! क्योंकि चोरी छिपे वार करते हो !
अपनी ही जमीन पर आतंकवादी तैयार करते हो
बना लिया मजहब को तुमने हथियार
और हो गए किसी पागल घोड़े पर सवार !
ओसामा बिन लादेन जैसों के शरणदाता हो तुम
दावूद इब्राहिम जैसे अपराधियों के तो पिता और माता हो तुम
लाख झूठ बोलते हो दुनिया को , इनके लिए
वही मरवाएंगे तुम्हे , मरते हो जिनके लिए !
किस्मत अच्छी ही थी ,कि तुम हमसे कट गए
भले ही भारत माता के अंग बंट गए
लेकिन कैंसर के हिस्से को काटना ही अच्छा है
कष्ट पाकर भी तन से छांटना ही अच्छा है !
शर्म आती है ये सोच कर
कि तुम कभी मेरा ही हिस्सा थे !
चकित होता हूँ ये याद कर के
कि तुम भी अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई का हिस्सा थे !
आजादी क्या मिली
तुम्हारे तो सुर ही बदल गए थे
हजारों वर्षों की दासता में साथ थे
आजादी में बाहर निकल गए थे !
तुम्हारा दोष नहीं
दोष है तुम्हारे रहनुमाओं का
शापित हो तुम , फल भुगत रहे हो
बंटवारे में मिली बद्दुआओं का !
आज मैं कहाँ और तुम कहाँ ?
देखता है सारा जहाँ
मैं हूँ प्रगतिशील दुनिया का सिरमौर
तुम हो एक आतंकवादी , झूठे और चोर !
हाँ चोर ! क्योंकि चोरी छिपे वार करते हो !
अपनी ही जमीन पर आतंकवादी तैयार करते हो
बना लिया मजहब को तुमने हथियार
और हो गए किसी पागल घोड़े पर सवार !
ओसामा बिन लादेन जैसों के शरणदाता हो तुम
दावूद इब्राहिम जैसे अपराधियों के तो पिता और माता हो तुम
लाख झूठ बोलते हो दुनिया को , इनके लिए
वही मरवाएंगे तुम्हे , मरते हो जिनके लिए !
किस्मत अच्छी ही थी ,कि तुम हमसे कट गए
भले ही भारत माता के अंग बंट गए
लेकिन कैंसर के हिस्से को काटना ही अच्छा है
कष्ट पाकर भी तन से छांटना ही अच्छा है !
सोमवार, 17 अगस्त 2015
मुस्कान है भारत
मेरा मान है भारत
मेरी शान है भारत
मेरा जीवन है
मेरी जान है भारत !
मेरा धर्म है भारत
मेरा कर्म है भारत
भारत मेरी गीता
कुरान है भारत !
मेरा गर्व है भारत
मेरा पर्व है भारत
मेरी दिवाली है
रमजान है भारत।
मेरा ग्रन्थ है भारत
मेरा पंथ है भारत
मेरी ताकत है ये
किरपान है भारत।
जग शांति है भारत
पर क्रांति है भारत
सरहद पर फौजी
बलिदान है भारत।
खुशहाल है भारत
यूँ निहाल है भारत
हर प्रीत का उत्तर
मुस्कान है भारत।
मेरी शान है भारत
मेरा जीवन है
मेरी जान है भारत !
मेरा धर्म है भारत
मेरा कर्म है भारत
भारत मेरी गीता
कुरान है भारत !
मेरा गर्व है भारत
मेरा पर्व है भारत
मेरी दिवाली है
रमजान है भारत।
मेरा ग्रन्थ है भारत
मेरा पंथ है भारत
मेरी ताकत है ये
किरपान है भारत।
जग शांति है भारत
पर क्रांति है भारत
सरहद पर फौजी
बलिदान है भारत।
खुशहाल है भारत
यूँ निहाल है भारत
हर प्रीत का उत्तर
मुस्कान है भारत।
रविवार, 2 अगस्त 2015
हे सविता !
[ आज मेरी बड़ी बहन सविता ने साठ साल पूरे किये। मुझसे बस एक साल बड़ी हैं। मैंने उन्हें ये कविता भेंट की अपनी आवाज में। मेरी बहुत सारी शुभकामनायें उनको। ]
हे सविता !
तुम हुयी साठ की
मैं उनसठ का
इस पर क्या
हो कविता !
हे सविता !
लगती सब बातें
कल की सी
जो बीत गयी
हैं पल की
सी
तुम पढ़ने में
पागल रहती
तुम पर बलिहारी
पिता !
हे सविता !
हम भाई
मस्ती करते थे
कभी लड़ते कुश्ती
करते थे
तुम एक घुड़की
देती हमको
माँ को दूँगी
सब बता !
हे सविता !
तुम छोटी थी
जब आठ साल
की
हमको लगती तुम
साठ साल
की
बस भजन हवन
और पठन तेरा
हमको बोरिंग लगता !
हे सविता !
हम तुमसे कितना डरते
थे
पीछे से हिटलर
कहते थे
फिर भी तुम
ढक लेती
थी
तब हाँ दोनों
की खता !
हे सविता !
अब सच में
हुई साठ की तुम
बचपन के पढ़े
पाठ की तुम
अब मूर्ति दिखाई देती
हो
हैं नमन तुम्हे
सविता !
हे सविता !
मंगलवार, 23 जून 2015
ऐ दरख्त यार !
कुछ बात कर , ऐ दरख्त यार !
चुपचाप क्यूँ , कमबख्त यार !
तू बचपन का साथी
अब पचपन का साथी
मैं कितना बड़ा हुआ
तेरा रुका हुआ है वक्त यार !
ऋतुएँ आती जाती
तुझ पर है बरसाती
कभी धूप कभी बारिश
फिर भी तू कितना सख्त यार !
भूखे को फल देता
गर्मी का हल देता
तेरे आँचल के नीचे
कटता सबका है वक्त यार !
आ तुझसे लिपट जाऊं
छाती से चिपट जाऊं
सारे रिश्ते हैं झूठे
सच्चा है तू बस फ़क्त यार !
शनिवार, 20 जून 2015
योग आखिर क्या है
योग कोई धर्म नहीं
योग कांड कर्म नहीं
योग अर्चना नहीं
योग वंदना नहीं !
योग सीमित भी नहीं
योग परिमित भी नहीं
योग देश का नहीं
योग परदेस का नहीं !
योग सृष्टि ज्ञान है
योग मानव गान है
योग एक साधना
योग तन आराधना !
योग तन नैरोग्य है
योग तो आरोग्य है
योग तन का स्वास्थ्य है
योग मन का स्वास्थ्य है !
योग जीने की कला
योग साधन श्रृंखला
योग नित्य कर्म है
योग स्वास्थ मर्म है !
स्वास लेने की कला
स्वास तजने की कला
योग स्वच्छ रक्त है
योग रोग मुक्त है !
आत्म साथ योग है
आत्मसात योग है
स्वयं साध्य योग है
स्व-आराध्य योग है !
मंगलवार, 19 मई 2015
सुख और दुःख
मेरे मन में खुशियाँ हैं
मेरे मन में दुःख भी हैं
खुशियों से खुश होता
दुःखों से पर रोता
है सभी चाहते खुशियां
है कौन चाहता पीड़ा
पर दोनों का बंधन है
खुशियों के संग ही पीड़ा।
दुःखों के बिन खुशियों का
खुशियों के बिन दुःखों का
कुछ अर्थ नहीं होता है
कुछ व्यर्थ नहीं होता है।
अँधेरे बिना उजाले
भी लगते हमको काले
अँधेरे का कालापन
ही चमकाता उजलापन।
गर्मी में ही सर्दी की
सर्दी में ही गर्मी की
कीमत तय होती है
दोनों की जय होती है।
हर रात सुबह को लाती
हर सुबह ख़त्म हो जाती
फिर रात नयी इक आती
जो नयी भोर बन जाती।
जैसे सुख जीवन में
ईश्वर का इक प्रसाद
वैसे ही बस आवश्यक
इस जीवन में अवसाद ।
मेरे मन में दुःख भी हैं
खुशियों से खुश होता
दुःखों से पर रोता
है सभी चाहते खुशियां
है कौन चाहता पीड़ा
पर दोनों का बंधन है
खुशियों के संग ही पीड़ा।
दुःखों के बिन खुशियों का
खुशियों के बिन दुःखों का
कुछ अर्थ नहीं होता है
कुछ व्यर्थ नहीं होता है।
अँधेरे बिना उजाले
भी लगते हमको काले
अँधेरे का कालापन
ही चमकाता उजलापन।
गर्मी में ही सर्दी की
सर्दी में ही गर्मी की
कीमत तय होती है
दोनों की जय होती है।
हर रात सुबह को लाती
हर सुबह ख़त्म हो जाती
फिर रात नयी इक आती
जो नयी भोर बन जाती।
जैसे सुख जीवन में
ईश्वर का इक प्रसाद
वैसे ही बस आवश्यक
इस जीवन में अवसाद ।
शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015
किसान रैली
सभा चल रही थी
आम आदमी बैठे थे
नेता मंच से भाषण दे रहे थे !
तभी एक आम आदमी
चढ़ गया पेड़ पर
कुछ आभास दिया
आत्महत्या का !
सभा चलती रही
आम आदमी बैठे रहे
नेता भाषण देते रहे !
लग गयी बाजियां
किसी ने कहा
ये सब है कलाबाजियां
कुछ मरने वरने वाला नहीं ये
लग गयी सौ सौ की !
पेड़ पर हरकते बढ़ी
आम आदमी ने बनाया एक फंदा
एक तरफ बाँधा पेड़ से
दूसरी तरफ गले से !
सभा फिर भी चलती रही
आम आदमी वैसे ही बैठे रहे
नेता बेखबर भाषण देते रहे !
उधर बाजियों के बाजार में तेजी आई
एक ने कहा - बोल बढ़ाता है क्या ?
दूसरे ने कहा - हाँ हाँ , पाँच पाँच सौ की !
तीसरा जुड़ गया - पाँच सौ मेरे भी मरने पर !
अचानक
पेड़ पर बैठा आम आदमी झूल गया
उसके पैर हवा में बल खाते रहे
उतनी देर तक
जितनी देर साँसें सह पायी कसन को
फिर सब कुछ ख़त्म !
सभा चलती रही
आदमी बैठे रहे
मंच पर भाषण चलते रहे -
लेकिन विषय बदल गया
किसान के शुभचिंतक
किसान की मातम पुरसी में लग गए
आनन फानन में कारण तैयार हो गए
दोषारोपण के लिए
बाजी के सौदे भुगतान की मांग करने लगे
न मरने पर लगाने वाले का तर्क था -
अभी मरा कहाँ है
दूसरी तरफ वाला बोला -
क्या पोस्ट मोर्टम के बाद देगा
तीसरे ने कहा -
कौन इन्तजार करेगा ,
चले आधे आधे में फैसला कर लेते हैं
कुछ लोग पेड़ पर चढ़ गए
लटके हुए आम आदमी को नीचे उतारा
गाड़ी में डाल कर ले गए
मंच से आवाज आई -
हमारे कार्यकर्ताओं ने उसे उतारा
पुलिस ने कुछ नहीं किया
क्यूंकि पुलिस हमारी नहीं है
छोड़िये ये सब …
आइये किसानों की बात आगे बढ़ाते हैं
बाजी आधे आधे पर सलट गयी
मीडिया को एक नया मसाला मिल गया
लोकसभा को गरमाने के लिए बहाना मिल गया !
सोमवार, 30 मार्च 2015
आम आदमी भी फिर आम हो गया
जब आम आदमी का बड़ा नाम हो गया
अब आम आदमी भी फिर आम हो गया
बातें बड़ी बड़ी जो करते थे जोर से
बातों के हल्केपन से बदनाम हो गया
भाईचारे के गाने जो गाते थे मंच पर
भाई बेचारे को रो रो जुकाम हो गया
जो लोकपाल के नारे से दिल्ली पर छा गए
उनका ही लोकपाल अब गुमनाम हो गया
जो बात करते थे हमेशा प्रजातंत्र की
वो आज तानाशाह सरे आम हो गया
सत्ता का लोभ है नहीं, नारे लगाते थे
सत्ता मिली तो बस बेलगाम हो गया
मंगलवार, 3 मार्च 2015
सुबह की शमां
क्यूँ आजकल हवाएँ कुछ सर्द सर्द है
क्यूँ आजकल फ़िज़ाएं भी गर्द गर्द हैं
चेहरे सुबह की शमां से यूँ बुझे हुए
हर आँख में उदासी क्यूँ जर्द जर्द है
खुशियां सभी की जैसे काफूर हो गयी
मुस्कान में भी दिखता क्यूँ दर्द दर्द है
ये नौजवान पीढ़ी क्यूँ बुजुर्ग हो गयी
नामर्द बन रहा क्यूँ हर मर्द मर्द है
क्यूँ आजकल फ़िज़ाएं भी गर्द गर्द हैं
चेहरे सुबह की शमां से यूँ बुझे हुए
हर आँख में उदासी क्यूँ जर्द जर्द है
खुशियां सभी की जैसे काफूर हो गयी
मुस्कान में भी दिखता क्यूँ दर्द दर्द है
ये नौजवान पीढ़ी क्यूँ बुजुर्ग हो गयी
नामर्द बन रहा क्यूँ हर मर्द मर्द है
रविवार, 11 जनवरी 2015
स्मृति - विस्मृति
जीवन में कभी कभी कुछ प्यारा खो जाता है
जीवन की प्रियतम वस्तु के खो जाने से
जीवन फिर जैसे अर्थहीन सा हो जाता है !
दुखों का सागर खूब हिलोरें लेने लगता
मन का विषाद मन को कुंठित करता रहता
तन थका हुआ हो फिर भी मन जगता रहता !
कुछ खो जाने से समय नहीं थम जाता है
जीवन की गति चलती रहती साँसों के संग
दुःख के क्षण पीछे छोड़ समय बढ़ जाता है।
पीछे मुड़ कर हम कभी पकड़ नहीं पाएंगे
सुख के लम्हे दुःख के लम्हे खो जाएंगे
आने वाले दिन कुछ और नया दिखलायेंगे !
स्मृति जैसे मनुष्य के मन का मान है
विस्मृति मनुष्य को ईश्वर का वरदान है
दोनों के होने से जीवन आसान है !
गुरुवार, 1 जनवरी 2015
ईश्वर हमें शक्ति दे !
समय का एक खंड बीत गया
समय का अगला खंड शुरू हुआ
क्या यही नहीं होता
हर महीने , हर सप्ताह , हर दिन
हर घंटे हर मिनट हर क्षण !
समय यूँ बीत रहा है
उम्र हर क्षण हार रही है
समय हर क्षण जीत रहा है
सूर्य बूढा नहीं होता
चाँद थकता नहीं है
बूढा होता है शरीर
थकता रहता यह तन
हर वर्ष हम नापते हैं
एक दूरी को
जो घट रही है निरंतर
हमारे जीवन
और हमारी मृत्यु के बीच
हम झुठलाते हैं एक दूसरे को
ये कह कर कि
अगला वर्ष शुभ हो
एक क्षीणतर तन के साथ ?
हमारी दुआएं
कर्ण प्रिय भी नहीं लगती
क्योंकि हम जानते हैं
की सब खोखली है !
हमारी सच्ची शुभकामना होती -
तुम्हारी सारी समस्याओं से लड़ने के लिए
ईश्वर तुम्हे और हौसला दे
अगले काल खंड में !
समय के साथ संघर्ष बढ़ता है
हमें चाहिए आशीर्वाद
अपने संघर्ष को जीतने का
न की नया वर्ष आने का
पुराना वर्ष बीतने का !
ईश्वर हमें शक्ति दे !
समय का अगला खंड शुरू हुआ
क्या यही नहीं होता
हर महीने , हर सप्ताह , हर दिन
हर घंटे हर मिनट हर क्षण !
समय यूँ बीत रहा है
उम्र हर क्षण हार रही है
समय हर क्षण जीत रहा है
सूर्य बूढा नहीं होता
चाँद थकता नहीं है
बूढा होता है शरीर
थकता रहता यह तन
हर वर्ष हम नापते हैं
एक दूरी को
जो घट रही है निरंतर
हमारे जीवन
और हमारी मृत्यु के बीच
हम झुठलाते हैं एक दूसरे को
ये कह कर कि
अगला वर्ष शुभ हो
एक क्षीणतर तन के साथ ?
हमारी दुआएं
कर्ण प्रिय भी नहीं लगती
क्योंकि हम जानते हैं
की सब खोखली है !
हमारी सच्ची शुभकामना होती -
तुम्हारी सारी समस्याओं से लड़ने के लिए
ईश्वर तुम्हे और हौसला दे
अगले काल खंड में !
समय के साथ संघर्ष बढ़ता है
हमें चाहिए आशीर्वाद
अपने संघर्ष को जीतने का
न की नया वर्ष आने का
पुराना वर्ष बीतने का !
ईश्वर हमें शक्ति दे !
शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014
कश्मीर नहीं समस्या
कौन कहता है
कश्मीर कोई विवाद है
देश के अन्य राज्यों जैसा है
कहाँ कोई अपवाद है ?
कश्मीर को भी चाहिए
आजीविका के अवसर
शांति का जीवन
स्वच्छ साफ़ परिसर
बच्चों को शिक्षा
बड़ों को रोजगार
बूढ़ों को आदर
महिलाओं को अधिकार
पर्यटकों की भीड़
डल में रौनक
दिलों में ख़ुशी
चेहरों पर चमक
बता दिया विश्व को
पिछले चुनाव में
ये अभिन्न है भारत से
नहीं अन्य प्रभाव में
समस्या है कश्मीर
पर कश्मीर में नहीं
किसी और ही मुल्क की
तकदीर में नहीं
कश्मीर का हर दल अब
सरकार चाहता है
कश्मीर की तरक्की
सौ बार चाहता है
इस बार की सरकार तो
गर काम यूँ करेगी
कश्मीर समस्या का
इंतजाम यूँ करेगी
अलगाववादियों का
अलगाव वादियों से
ऐसा करेगी पुख्ता
ठहराव वादियों से
आतंकवादियों को
दहशत में ऐसी डाले
आतंक से मरे सब
आतंक करने वाले
कश्मीर कोई विवाद है
देश के अन्य राज्यों जैसा है
कहाँ कोई अपवाद है ?
कश्मीर को भी चाहिए
आजीविका के अवसर
शांति का जीवन
स्वच्छ साफ़ परिसर
बच्चों को शिक्षा
बड़ों को रोजगार
बूढ़ों को आदर
महिलाओं को अधिकार
पर्यटकों की भीड़
डल में रौनक
दिलों में ख़ुशी
चेहरों पर चमक
बता दिया विश्व को
पिछले चुनाव में
ये अभिन्न है भारत से
नहीं अन्य प्रभाव में
समस्या है कश्मीर
पर कश्मीर में नहीं
किसी और ही मुल्क की
तकदीर में नहीं
कश्मीर का हर दल अब
सरकार चाहता है
कश्मीर की तरक्की
सौ बार चाहता है
इस बार की सरकार तो
गर काम यूँ करेगी
कश्मीर समस्या का
इंतजाम यूँ करेगी
अलगाववादियों का
अलगाव वादियों से
ऐसा करेगी पुख्ता
ठहराव वादियों से
आतंकवादियों को
दहशत में ऐसी डाले
आतंक से मरे सब
आतंक करने वाले
बुधवार, 24 दिसंबर 2014
माँ
ठन्डे पहाड़ों के
बीच
बसा
वो छोटा सा
शहर
कभी कोहरा
कभी बादल
कभी वर्षा
हर पहर !
इस ठन्डे
शहर में
थी इक
बड़ी हवेली
जिसमे बसती इक दुनिया
दुनिया से अलबेली
!
ठंडा आँगन
ठंडी धरती
ठंडा था
आसमां
इस ठंडेपन
के बीच मगर
ऊष्मा थी प्यारी
माँ !
उसकी ममता
की निवाच में
सब कुछ
ही सबका था
उस दिल
की बड़ी रजाई
में
सारा घर
दुबका था !
सबसे पहले
उठती थी माँ
सबकी खातिर
उठती
छत
पर चौके में
जाने को
सीढ़ी पहले
चढ़ती !
चौके में
चूल्हा एक तरफ
एक तरफ
बनी क्यारी
एक तरफ
बैठ तकती सबको
माँ थी
कितनी प्यारी !
बाबूजी रहते शांत
सदा
जीवन बिलकुल
सादा
माँ उनकी
सेवा में रहती
बन घर
की मर्यादा !
कितने बेटे कितनी
बहुएं
कितने पोती पोते
सबका रखती
वो ध्यान
हमेशा जगते या
सोते !
वेदों ने माना
मनु जीवन
जीवन सौ
वर्षों तक
उत्तम जीवन जीने
वाले ही
जीते पूर्ण
शतक !
इन सौ
वर्षों के जीवन
में
इक दुनिया
बना गयी
सौ लोगों
के इस घर
की
यादों में समा गयी !
माँ , आज तुम्हारा
अभिनन्दन
करते हम
सब बच्चे
तुम दूर
कहाँ हमसे, माँ
कहते मन
से सच्चे !
रविवार, 26 अक्टूबर 2014
पहाड़ पर
क्यों लोग गर्मियों में जाते पहाड़ पर
शहरों से दूर रहने ऊंचे पहाड़ पर
सड़कों की चिल्ल पों से जब फट रहे हों कान
खामोशियों की खोज में जाते पहाड़ पर
आबोहवा शहर की जब जहर घोलती
अमृत को ढूंढने सब जाते पहाड़ पर
हर वक़्त दौड़ता तन पैसे की दौड़ में
फिर वक़्त अपना ढूंढने जाते पहाड़ पर
रिश्तों के मायने जब खो जाते शहर में
रिश्तों को फिर से जीने जाते पहाड़ पर
सोमवार, 20 अक्टूबर 2014
सब के कद नप गए
चुनाव की भट्टी में सारे दल तप गए
बड़ों के छोटों के सब के कद नप गए
बड़ी बड़ी हांकते थे जनता के आगे
जनता की आंधी में सारे ही खप गए
जिनको परहेज था मोदी की बातों से
दोस्ती की चाहत में खड़े खड़े थक गए
जहर जो उगलते थे , आज फ़िक्र करते हैं
बेवजह ही इतना तब किस लिए यूँ बक गए
रस्सियाँ तो जल गयी , बट लेकिन बाकी है
बट सीधे होंगे कब , बंट बंट के बंट गए।
रविवार, 12 अक्टूबर 2014
अलग दिवाली
घर घर
दीप जलायें
अँधियारा मिट जाए।
अंधियारे की आज
देश में
बदल गयी
परिभाषा
इस
बदले युग की
हम सब से
भिन्न हुई है
आशा
आओ हम
सब इस दिवाली
कुछ
ऐसा कर जाएँ
!
रहे देश
का कोई बालक
शिक्षा बिन न
अधूरा
हर बालक जो
सपना देखे
सपना हो
वो पूरा
हर नन्हे
सपने को , नन्हे
पंख नए
मिल जाएँ।
इस दिवाली झाड़ू
लेकर
सड़कों पर निकले
हम
अपने शहर
मोहल्ले का सब
कचरा दूर
करें हम।
अपने घर
की साफ़ सफाई
से आगे
बढ़ जाएँ।
पटाखों का धूम
धड़ाका
अब यह
नहीं सुहाता
वायु का
प्रदूषण करता
कितना शोर मचाता
सीमा पर
दुश्मन से लड़ने
अपना धन
पहुँचायें।
लक्ष्मी के पूजन
की भी अब
बदल गयी
परिपाटी
अपनी लक्ष्मी
की कुछ राशि
यूँ समाज
में बाँटी
धूप दीप
नेवैद्य सभी के
जीवन को
महकाए।
दिए जलाएं
मिट्टी के
ही
तेल देश
का भर कर
एक दिया
अपने घर जलता
एक कुम्हार
के घर पर
त्यागे सस्ती चीनी
चीजें
देशी ही
अपनाएं।
मुठ्ठी मुठ्ठी दिवाली
से
जगमग देश
सजेगा
एक सौ
तीस कोटि लोगों
का
जीवन जब
बदलेगा
दुनिया का सिरमौर
बने यह
अपना
देश बनायें।
बुधवार, 1 अक्टूबर 2014
नमो बहुत खास है
नमो आम इंसान नहीं , नमो बहुत खास है
कितने सारे उदाहरण हमारे आस पास है
ओबामा ने नहीं दिया मोदी को वीसा
लेकिन मोदी ने दे दिया है पूरे अमेरिका को वीसा
पाकिस्तान ने अलापा अपना पुराने कश्मीरी झगडे का आलाप
मोदी ने कहा - बात करनी है तो अपनी करतूतें बात लायक करो
मोदी ने दिया ओबामा को मार्टिन लूथर किंग का ऐतिहासिक भाषण
ओबामा ले गए मोदी को मार्टिन की समाधि पर , अपने साथ
९० मिनट की वार्ता चली १४० मिनट तक
लगता है दोनों नेताओं के बीच समय की सीमायें समाप्त हो गयी
मोदी ने बात की हर मुश्किल विषय पर
लेकिन देश की प्राथमिकताओं को ऊपर रख कर
मेडिसन स्क्वायर के प्रांगण में भारतीय प्रवासी ही नहीं
दर्जनों अमेरिकी सीनेटर भी पहुंचे मोदी को सुनने
भारत और अमरीका मिल चुके हैं मंगल पर
एक बार फिर मिले हैं भारत और अमरीका मंगल के लिए
मोदी एक युग पुरुष है , जो भारत की तकदीर बदलेगा
भारत एक बार फिर विश्व का सिरमौर बन कर चलेगा
कितने सारे उदाहरण हमारे आस पास है
ओबामा ने नहीं दिया मोदी को वीसा
लेकिन मोदी ने दे दिया है पूरे अमेरिका को वीसा
पाकिस्तान ने अलापा अपना पुराने कश्मीरी झगडे का आलाप
मोदी ने कहा - बात करनी है तो अपनी करतूतें बात लायक करो
मोदी ने दिया ओबामा को मार्टिन लूथर किंग का ऐतिहासिक भाषण
ओबामा ले गए मोदी को मार्टिन की समाधि पर , अपने साथ
९० मिनट की वार्ता चली १४० मिनट तक
लगता है दोनों नेताओं के बीच समय की सीमायें समाप्त हो गयी
मोदी ने बात की हर मुश्किल विषय पर
लेकिन देश की प्राथमिकताओं को ऊपर रख कर
मेडिसन स्क्वायर के प्रांगण में भारतीय प्रवासी ही नहीं
दर्जनों अमेरिकी सीनेटर भी पहुंचे मोदी को सुनने
भारत और अमरीका मिल चुके हैं मंगल पर
एक बार फिर मिले हैं भारत और अमरीका मंगल के लिए
मोदी एक युग पुरुष है , जो भारत की तकदीर बदलेगा
भारत एक बार फिर विश्व का सिरमौर बन कर चलेगा
बुधवार, 10 सितंबर 2014
विश्व विजेता
इतिहास में विश्व विजेता था
यूनान का सिकंदर
जीता उसने विश्व
तलवार की नोक पर
खून की नदियां बहा कर
लाशों से मैदान पटा कर
मिला क्या उसे -
एक खानाबदोश जिंदगी
लाखों बद्दुआयें
एक अतृप्त अंत
एक शापित मौत !
आज हुआ है
एक और विश्व विजेता
जो जीत रहा है विश्व
पहला लक्ष्य
दुश्मनों को दोस्त बनाना
चीन हो या पाकिस्तान
सब को बढ़ाया
दोस्ती का हाथ
लेकिन इस चेतावनी के साथ
कि ये है एक शक्तिशाली हाथ
दोस्तों की मदद के लिए
दुश्मनों के मुकाबले के लिए
जीत लिया पड़ोसियों को
बांग्ला देश हो या नेपाल
श्री लंका हो या भूटान
छोटा हो या बड़ा
पडोसी सभी मित्र है
जन जन का दिल जीता
जापान में
जापान का धन आया हिंदुस्तान में
तोप तलवार से नहीं
दोस्ताना व्यवहार से
ऑस्ट्रेलिया चाहता है
भारत से सम्बन्ध
कर लिया यूरेनियम का अनुबंध
ओबामा गिन रहा है दिन
भारी लग रहा है एक एक दिन
नरेंद्र मोदी की प्रतीक्षा है
मिलने की भरपूर इच्छा है
हवा हो गयी
वो वीसा न देने की बात
बिछी है लाल कालीन की सौगात
कौन कहता है
सिर्फ महलों में पैदा होते हैं
विश्व विजेता
भारत के गाँवों में
गरीबों के घर में
हर चाय बेचने वाला भी
देश का नेता है
विश्व विजेता है !
शुक्रवार, 15 अगस्त 2014
शत शत वंदन देश तुम्हे !
आजादी के महा पर्व पर
शत शत वंदन देश तुम्हे !
कोई संकट कभी न आये
चाहे दुश्मन चढ़ चढ़ आये
जो आये वो मुंह की खाये
न हो कोई क्लेश तुम्हे !
शत शत वंदन देश तुम्हे !
ऐसा हो गणराज्य तुम्हारा
जन गण मन का राजदुलारा
दुनिया की आँखों का तारा
दे आशीष गणेश तुम्हे !
शत शत वंदन देश तुम्हे !
नदियों का है ताना बाना
भूमिगर्भ में दबा खजाना
ऋतुओं का है आना जाना
समृध्दि मिले हमेश तुम्हे !
शत शत वंदन देश तुम्हे !
दुनिया का सिरमोर बने तू
शान्तिमार्ग की ओर चले तू
थाम जगत की डोर चले तू
प्यार मिले हर देश तुम्हे !
शत शत वंदन देश तुम्हे !
रविवार, 25 मई 2014
मोदी है बस मोदी है।

रात अँधेरी भागी अब
भोर नयी इक जागी अब
सूरज कितना तेज हुआ
सब हैरत अंगेज हुआ !
जो दिखते थे बड़े बड़े
ढेर हुए सब खड़े खड़े
ऐसी आंधी आई इक
खड़ा कोई न रहा तनिक !
वंशवाद के वंशज सब
कब्ज़ा कर के संसद तब
रहते थे निखरे निखरे
आज धरातल पर बिखरे।
जाति वाद के पोषक भी
जनता के थे शोषक भी
धता बताया जनता ने
दूर भगाया जनता ने।
बीज घृणा का बो बो कर
नकली आंसू रो रो कर
मजहब का नारा भी सब
काम न आया उनके अब।
कदम कदम पर शुचितायी
नगर नगर में सच्चाई
बात बात थी दर्पण सी
जन जन को थी अर्पण सी।
जीवन में सच्चाई थी
चिंतन में गहराई थी
मिटटी से निकला था वो
तप तप कर पिघला था वो।
दुष्प्रचार से घिरा हुआ
झूठ तंत्र से भिड़ा हुआ
सच से खुद को जोड़ दिया
उत्तर भी मुँहतोड़ दिया।
आज देश का नेता है
सबका बड़ा चहेता है
भारत माँ की गोदी है
लाल नरेंदर मोदी है।
अच्छे दिन आने वाले
उनको है लाने वाले
गदगद आँखें रो दी है
मोदी है बस मोदी है।
मंगलवार, 29 अप्रैल 2014
अब की है मोदी सरकार
बहुत हो चुका भ्रष्टाचार
बहुत हो चुका अत्याचार
भागो गद्दी छोड़ो अब
अब की है मोदी सरकार !
क्या इसको कहते सरकार ?
किसको है इसकी दरकार ?
मँहगाई से मर गया देश
अब की है मोदी सरकार !
बिना असर का था सरदार
जैसे रोबट सा किरदार
जिसे चलाता जनपथ दस
अब की है मोदी सरकार !
राहुल करता है परचार
झूठी बातें बस हर बार
दस वर्षों तक झेल लिया
अब की है मोदी सरकार !
करे सोनिया की जयकार
कांग्रेस में है भरमार
चमचों की ,मक्कारों की
अब की है मोदी सरकार !
देश की नैया है मझदार
दिखती है बस एक पतवार
मोदी ही मल्लाह है
अब की है मोदी सरकार !
बहुत हो चुका अत्याचार
भागो गद्दी छोड़ो अब
अब की है मोदी सरकार !
क्या इसको कहते सरकार ?
किसको है इसकी दरकार ?
मँहगाई से मर गया देश
अब की है मोदी सरकार !
बिना असर का था सरदार
जैसे रोबट सा किरदार
जिसे चलाता जनपथ दस
अब की है मोदी सरकार !
राहुल करता है परचार
झूठी बातें बस हर बार
दस वर्षों तक झेल लिया
अब की है मोदी सरकार !
करे सोनिया की जयकार
कांग्रेस में है भरमार
चमचों की ,मक्कारों की
अब की है मोदी सरकार !
देश की नैया है मझदार
दिखती है बस एक पतवार
मोदी ही मल्लाह है
अब की है मोदी सरकार !
सोमवार, 17 मार्च 2014
बुरा न मानो होली है !
दस सालों की कई कहानी , अब तो पूरी हो ली है
बुरा न मानो होली है !
कांग्रेस का नाम बदल कर "कौन कर ऐश " बना है अब
देश की दौलत लूट लूट कर नेता 'कैश' बना है सब
कांग्रेस ने अपनी सूरत ज्यों कालिख से धो ली है
बुरा न मानो होली है !
मनमोहन थे अर्थशास्त्री , जग में नाम कमाया तब
हो गए क्यों वो अनर्थशास्त्री , देश का नाम डुबाया अब
ख़ामोशी की चादर ओढ़े , सूरत कर ली भोली है
बुरा न मानो होली है !
सपने चकनाचूर हुए अब , बेमतलब की भक्ति थी
ऊपर से जैसी हो बातें , अंदर से सब पोली है
बुरा न मानो होली है !
लोग कहा करते थे - भैया, दूजे बापू गांधी थे
ममता के चक्कर में पड़ कर जग में बने ठिठोली है
बुरा न मानो होली है !
और केजरीवाल अचानक, उठे क्रांति की ज्वाला से
सत्ता की चाहत में बिखरे , जैसे टूटी माला से
वोट मांगते फिरते निशदिन ये फैलाये झोली है
बुरा न मानो होली है !
आरोपों के दलदल से जो, निकला बनकर नायक सा
अब दल दल हैं कोरस गाते , वो जब गाता गायक सा
अगले युग का नेता मोदी , भारत की ये बोली है
बुरा न मानो होली है !
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