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मंगलवार, 23 जून 2015

ऐ दरख्त यार !


कुछ बात कर , ऐ दरख्त यार !
चुपचाप क्यूँ , कमबख्त यार !

तू बचपन का साथी
अब पचपन का साथी
मैं कितना बड़ा हुआ
तेरा रुका हुआ है वक्त यार !

ऋतुएँ आती जाती
तुझ पर है बरसाती
कभी धूप कभी बारिश
फिर भी तू कितना सख्त यार !

भूखे को  फल देता
गर्मी का हल देता
तेरे आँचल के नीचे
कटता सबका है वक्त यार !

आ तुझसे लिपट जाऊं
छाती से चिपट जाऊं
सारे रिश्ते हैं झूठे
सच्चा है तू बस फ़क्त यार !

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