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रविवार, 27 नवंबर 2016

सर्जिकल स्ट्राइक




पाकिस्तान पर जो हुआ

वो सर्जिकल स्ट्राइक का रिहर्सल था

नवम्बर को जो हुआ वो असल था !



घर बैठे ही सब के यहाँ रेड पड़  गयी

डिनर पर न्यूज़ देखने वालों की भूख मर गयी

छापा टीवी पर बोल के ही मार दिया

दारु वालों का नशा  उतार दिया



उस रात लोग गिनते रहे हजार और पांच सौ के

छुपा कर जो बचाये थे मियां बीवी ने एक दुसरे  से

सब का वोलंटरी डिस्क्लोजर हो गया

बरसों की चोरी का एक्सपोजर हो गया



नोट के ढेरों को टेबल पे रख के

लगे सोचने यूँ माथा पकड़ के

इस माया को ठिकाने लगाएं कहाँ

जाए तो आखिर जाए कहाँ ?



नोटों पर ये जो दिखा  है

धारक को हजार पांच सौ देना लिखा है

इसमें अब लिखो एक सफाई

कंडीशन्स अप्लाई



ये नोट काला है या सफ़ेद - बताओ

इसपर कोई तो निशान लगाओ

जिससे भविष्य में तो बचाव रहे

जीवन में खिंचाव रहे



प्रधानमंत्री का उत्तर स्पष्ट है 

अगर तुम्हारे अंदर कपट है

तो है तुम्हारा नोट काला

वर्ना चाँदी सा उजाला



नोट काला या सफ़ेद नहीं होता है मित्र

काला या सफ़ेद होता  है चरित्र

अगर देश का हक़ मारा

तो फिर नोट नहीं है तुम्हारा



जीवन में परिवर्तन लाओ

पैसा चाहे जितना भी कमाओ

देश को उसका टैक्स चुकाओ

फिर चाहे मखन मलाई खाओ !

सोमवार, 31 अक्तूबर 2016

Naman







नमन


रंगोली है वहां , रंगोली है यहाँ
कभी होली है वहां , कभी होली है यहाँ

बारूद है वहां , बारूद है यहाँ
बम फटते  हैं वहां , बम फटते हैं यहाँ

जुआ भी है वहां , जुआ भी है यहाँ
प्राणों का दांव वहां , पैसो का दांव यहाँ

अंतर बस इतना है , अंतर बस इतना है
सीमा पर वो खड़े , शहरों में हम पड़े

दिवाली देश में हो , दिवाली देश में है
वो वहाँ प्रतिक्षित हैं , हम यहाँ सुरक्षित हैं

[ दिवाली के अवसर पर भारत की सेना को हमारा नमन !]

बुधवार, 5 अक्तूबर 2016

Chahiye praman !


चाहिए प्रमाण ?

हम ने लड़ा दिए प्राण
तुम्हे चाहिए प्रमाण
इस बार नहीं दे सकेंगे
क्योंकि इस बार
हम में से कोई नहीं मरा
उनके जो मरे
उन्हें हम ला नहीं पाए।

ऐसी अग्नि परीक्षा तो
सीता ने भी नहीं दी थी
हमसे हमारे जीने का हिसाब मांगते हो
जो आज से पहले किसी ने नहीं माँगा
तुम तोपों में पैसा खा गए
तुम हमारे हेलीकोपटरों में दलाली खा गए
हमने तो नहीं माँगा कभी हिसाब
क्योंकि नहीं रखी कोई किताब


हमेशा से सीखा  था
जन्मभूमि माँ होती है
और माँ के दूध का हिसाब नहीं होता है !
फिर भी देंगे तुम्हे जवाब
साथ में देंगे हिसाब
जब कभी हमारी वर्दी में मांगने आओगे
नहीं तो , माँ कसम
बहुत मार खाओगे !

सोमवार, 15 अगस्त 2016

मैं कैसे तुम्हे मनाऊं मेरी आज़ादी !





मैं किस मुंह से आज़ादी तेरी बात करूँ

मैं कैसे मानूँ देश मेरा आज़ाद है अब !

गोरे  अंग्रेजों से तो हम आज़ाद हुए

काले अंग्रेजों से भी तो  बर्बाद हैं अब !



जिस मज़हब वाले मुद्दे पर था देश बंटा

वो ही मज़हब वाला झगड़ा फिर शुरू हुआ

संसद  पर हमले करने वाला अफ़ज़ल वो

क्योंकर इक हिस्से का वो जाने गुरु हुआ ?



मुम्बई का करने को  विनाश जो आया था

कुत्ता था , खुद को टाइगर वो कहता है 

उसके भी चाहने वाले हैं इस भारत में

जो  पकिस्तान में छिप चूहे सा रहता है !



गौरक्षा की है बात उठाना जुर्म यहाँ

गौहत्या अब इस देश में बहुत जरूरी है

भारत माँ  को माता कहने पर कष्ट यहाँ

इस देश को अपना कहना भी मजबूरी है !





आतंकवाद घुस कर बैठा हर कोने में

जैसे शोणित में मिले हुए कीटाणु से

कैंसर बन कर इस देश की जड़ को काट रहे

कब फूट पड़े बन कर बम वो परमाणु से !



खुद को आज़ादी के मालिक कहने वाले

क़दमों में पड़े हुये हैं देखो इटली के

जब चूस चुके हैं देश की सत्ता का  सब रस

अब भी हैं देखो चाट रहें हैं  गुठली वे



इस देश में नहीं सुरक्षित देखो नारी अब

डर डर  कर रहती बहुसंख्यक जो आबादी

मैं चाहूँ भी तो कैसे झंडा फहराऊं

मैं कैसे तुम्हे मनाऊं मेरी आज़ादी !


रविवार, 7 अगस्त 2016

मेरी दोस्ती मेरा प्यार


रिश्ते वो हैं जो जन्म के कारण बनते हैं

दोस्ती वो जो जीवन के कारण  बनती है



सरे राह चलते कोई मिल गया

दो चार बाते हुयी

कुछ मैंने कही उसने सुनी

कुछ उसने कही मैंने सुनी

और अनजाने ही एक दोस्ती शुरू हो गयी !



मैं हिन्दू था , वो मुसलमान निकला

पूर्वाग्रह था - मुसलमान अच्छे नहीं होते

फिर भी वो अच्छा लगा

शायद उसके भी मन में ऐसा था कुछ

फिर भी मैं उसे अच्छा लगा



उसे भी फ़िल्में , उपन्यास और कविताएँ पसंद थी

और मुझे भी

हमने साथ साथ न जाने कितनी फ़िल्में देखी

कितना संगीत सुना

कितने उपन्यास आपस में बदले

दोस्ती और गहरी होती गयी



उसने ईद पर मुझे बुलाया

मैं झिझका ; हमारा खाना पीना जो अलग था

उसे मेरी झिझक का पता था

उसने मेरे लिए अलग बर्तन मंगाये

शुद्ध शाकाहारी भोजन खिलाया



मुझे अपनी झिझक पे झिझक आयी

हम दोनों साथ साथ होटलों में खाते हैं

तब क्योँ नहीं ये झिझक आड़े आती

हवाई जहाज में कौन नए बर्तन में खाना बनाता होगा

इस सोच से दोस्ती और मजबूत हो गयी



दिवाली पर मैंने उसे बुलाया

वो नए कपडे पहन कर आया

माँ ने बड़े प्यार से उसका भी थाल सजाया

उसे हमारी दिवाली पसंद आयी

दोस्ती और मजबूत हो गयी



इस दोस्ती को इकतालीस साल बीत गए

सालों साल मिलना नहीं होता

लेकिन दिलों में दोस्ती अभी भी ताजा है

क्योंकि दोस्ती वो रिश्ता है

जो सभी रिश्तों का राजा है !

मंगलवार, 28 जून 2016

सिंगापुर

कुछ सीखने के लिए
अपने से बेहतर लोगों की तरफ देखो
अपने से बड़े लोगों की तरफ नहीं
बड़ा होना बेहतर होने की निशानी नहीं

भारत बहुत बड़ा देश है
सिंगापुर बहुत छोटा
शायद भारत के एक शहर जितना बड़ा
फिर भी भारत को सिखा सकता है
बहुत कुछ !

स्वच्छ्ता
सुंदरता
सुरक्षा
देशप्रेम
नागरिकता
अनुशासन
ईमानदारी
पर्यावरण
अच्छी शिक्षा
अच्छा उपचार
अच्छी सड़कें
सरल यातायात
मजबूत करेंसी
और सर्वोपरि -
मानवता !

और ये सब
सरकार से संभव नहीं
संभव है देश के लोगों से !
आइये सीखे सिंगापुर से।

भारत में रहने वाला हर व्यक्ति
भारतीय नहीं है -
वो बंगाली है , पंजाबी है
वो हिन्दू है मुस्लमान है
वो राजपूत है यादव है
वो उत्तर भारतीय है दक्षिण भारतीय है
वो शाकाहारी है , मांसाहारी है
वो पढ़ा लिखा है , वो अनपढ़ है
वो अमीर है गरीब है
वो कम्युनिस्ट है , समाजवादी है
वो दलित है , वो महादलित है
वो ब्राह्मण है वो शुद्र है
वो स्त्री है वो पुरुष है
वो माइनोरिटी है , मेजोरिटी है
वो सब कुछ है बस भारतीय नहीं है !

सिंगापुर में बसने वाला भारतीय भारतीय नहीं है -
सिंगापुर में रहने वाला चीनी भी चीनी नहीं है -
यहाँ रहने वाला मलेशियाई भी मलेशियाई नहीं है
यहाँ का हर नागरिक
सिंगापुरियन है ! बस सिंगापुरियन है !

रविवार, 3 अप्रैल 2016

कोलकाता का कहर



आज फिर एक पुल गिरा
वर्षों पहले यहाँ जब ये पुल नहीं था
बहुत से लोग आते जाते थे इस चौरस्ते से
गाड़ियां , रिक्शे ,पैदल , झाका  वाले

चौरस्ते के एक कोने पर था -एक सिनेमा हाल
गणेश टॉकीज
दूसरी तरफ एक मिठाई की दुकान
तीसरी तरफ एक शरबत वाला
और चौथी तरफ एक रिहायशी मकान

सब सुखी थे
किसी को शिकायत नहीं थी
इस भीड़ से
इस चौरस्ते से

फिर एक दिन नजर पड़ी
सरकार की
और उसने फैसला लिया
एक पुल  बनाने का

वर्षों बीत गए
भीड़ बढ़ती रही
रास्ता घटता रहा
लेकिन कोई पुल नहीं बना

चुनाव हुआ
सत्ता बदल गयी
नयी सरकार आ गयी
लेकिन पुल नहीं बना

जनता सहती रही
जीवन को फिर आदत सी पड़  गयी
उस बिन बने पुल के कारण
घटे हुए रास्ते की

लेकिन फिर चुनाव आ गए
फिर नज़र पड़ी सरकार की
ये पुल अब तक क्यों नहीं बना
चुनाव से पहले बनना चाहिए

फिर हुआ जीवन अस्त व्यस्त
सुस्त पड़े पुल के निर्माण में सब व्यस्त
रातोंरात सब कुछ करना है
चुनाव से पहले लोकार्पण करना है

लेकिन ये क्या ?
पुल को सुस्त रहने की आदत थी
एक साथ इतना कुछ लाद दिया उस पर
किसी ने उससे नहीं पूछा -

भाई पुल , तुम ठीक तो हो न ?
कहीं बुढ़ापे ने तुम्हे कमजोर तो नहीं कर दिया न ?
तुम ये नया बोझ ढो  तो सकोगे न ?
तुम्हारे पैर धोखा तो नहीं देंगे  न ?

और उस रात पुल पर हुयी ढलाई
पुल की कमजोर आत्मा चरमराई
दोपहर तक जैसे तैसे झेला
लेकिन फिर ढह गया खेला

हाहाकार मच गया
कोई दब गया
कोई मर गया
कोई बच गया

राजनीति शुरू हुयी
ठेका पिछली सरकार ने दिया था
ठेका देने का पैसा
उसने लिया था

लेकिन तुमने क्या किया
कभी उस ठेकेदार का जायजा लिया
और फिर अचानक तुम्हे दिखा एक वोट बैंक
सोचा क्यूँ न इसका फायदा लिया

कितना कुछ दब गया
इस पुल के नीचे
किसी पत्नी का सुहाग
किसी परिवार का चिराग

किसी जवानी  के सपने
किसी  बुढ़ापे के अपने
किसी बच्चे का बाप
किसी पत्नी का प्रलाप

हाँ कुछ और भी तो दबा है
तुम्हारा वो वोट बैंक
तुम्हारी ये विधान सभा की गद्दी
अब हुयी रद्दी !

दोष किसका है ?
पिछली सरकार का ?
अगली सरकार का ?
ख़राब ठेकेदार का ?
या सरकारी भ्रष्टाचार का ?
मिलावटी सीमेंट और ग़ारे का ?
या भ्रष्ट भाईचारे का ?
आरक्षण कोटे के इंजीनियर का ?
या सिफारिश से आये ओवरसियर का ?
देश की दुर्भाग्यपूर्ण अवस्था का ?
या अवस्था के लिए जिम्मेवार व्यवस्था का ?





मेरी ख़ामोशी रज़ा सी हो गयी


जिंदगी कुछ बेमज़ा  सी हो गयी 
साँस लेना ही वजह सी हो गयी 

मुझसे कुछ पूछे बिना सब कुछ हुआ 
मेरी ख़ामोशी रज़ा सी हो गयी 

मुस्कुराने की वजह मिलती नहीं 
मुस्कराहट भी सज़ा  सी हो गयी

 फेफड़ों में जहर सा यूँ भर रहा 
जैसे ज़हरीली फ़िज़ा सी हो गयी 

लड़ रहा हर वक़्त कोई जिंदगी से 
जिंदगी भी यूँ कज़ा सी हो गयी 




गुरुवार, 24 मार्च 2016

देश मांगता आजादी

देश मांगता आजादी


गद्दारों से -आजादी
मक्कारों से -आजादी
देश को गाली देने वाले
सब नारों से -आजादी !

मुफ्तखोरों से -आजादी
छुपे चोरों से -आजादी
देश का खाकर  उल्टा बोले
उन छिछोरों से आजादी !

उन नेताओं से आजादी
उन श्रोताओं से आजादी
जेएनयू में राजनीती के
कर्ताओं से -आजादी !

अलगाववाद से -आजादी
आतंकवाद से - आजादी
इनको शह देने वाले दल की
हर बकवाद से आजादी !

सस्ते में मिल गयी - आजादी
धूर्तों को मिल गयी -आजादी
इसीलिए वो नहीं समझते
क्या होती है - आजादी !

दी भगत सिंह ने आजादी
दी राजगुरु ने आजादी
बिस्मिल, सुखदेव की क़ुरबानी
और दी आजाद ने आजादी !





रविवार, 6 मार्च 2016

बस शोर हो शोर है।

संसद

कभी तालियों का जोर है
कभी गलियों का जोर है
संसद अब कुछ नहीं
बस शोर हो शोर है।

जब प्रतिपक्ष गरियाता है
सत्तापक्ष सुनता है
जब सरकार धमकाती है
विपक्ष सर धुनता है।

हर बकवास का उत्तर देने को
एक नयी बकवास तैयार होती है
फिर उसके उत्तर के लिए
एक और बकवास की मार होती है।

जो बोल नहीं पाते
वो फड़कने लगते हैं
जिन्हे समय नहीं दिया जाता
वो भड़कने लगते हैं।

ऐसा लगता है -
संसद एक थिएटर है
जिसमे साढ़े पांच सौ
एक्टर हैं

जिसकी टिकट
यूँ तो मुफ्त है
लेकिन हमारी जेब के करोड़ों
हर घंटे लुप्त हैं

कभी कभी संसद
चलने नहीं देते
चलने देते
तो क्या कर लेते

उस अनदेखी
असहिष्णुता के लिए
दिनोदिन चलती है
बहस

लेकिन सियाचिन में
मरने वालों के लिए
होता है मौन
आधे मिनट का

सत्र पर सत्र
बीत जाते हैं
खजाने के खजाने
रीत जाते हैं

पर फैसले
कभी नहीं होते
जरुरी बिलों पर
देश के निराश दिलों पर

बाल की बस
खाल निकलती है
चाल पर चाल
निकलती है .

पांच साल
यूँ ही चलता है
फिर अगले पांच साल के लिए
दिल मचलता है