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सोमवार, 15 अगस्त 2016

मैं कैसे तुम्हे मनाऊं मेरी आज़ादी !





मैं किस मुंह से आज़ादी तेरी बात करूँ

मैं कैसे मानूँ देश मेरा आज़ाद है अब !

गोरे  अंग्रेजों से तो हम आज़ाद हुए

काले अंग्रेजों से भी तो  बर्बाद हैं अब !



जिस मज़हब वाले मुद्दे पर था देश बंटा

वो ही मज़हब वाला झगड़ा फिर शुरू हुआ

संसद  पर हमले करने वाला अफ़ज़ल वो

क्योंकर इक हिस्से का वो जाने गुरु हुआ ?



मुम्बई का करने को  विनाश जो आया था

कुत्ता था , खुद को टाइगर वो कहता है 

उसके भी चाहने वाले हैं इस भारत में

जो  पकिस्तान में छिप चूहे सा रहता है !



गौरक्षा की है बात उठाना जुर्म यहाँ

गौहत्या अब इस देश में बहुत जरूरी है

भारत माँ  को माता कहने पर कष्ट यहाँ

इस देश को अपना कहना भी मजबूरी है !





आतंकवाद घुस कर बैठा हर कोने में

जैसे शोणित में मिले हुए कीटाणु से

कैंसर बन कर इस देश की जड़ को काट रहे

कब फूट पड़े बन कर बम वो परमाणु से !



खुद को आज़ादी के मालिक कहने वाले

क़दमों में पड़े हुये हैं देखो इटली के

जब चूस चुके हैं देश की सत्ता का  सब रस

अब भी हैं देखो चाट रहें हैं  गुठली वे



इस देश में नहीं सुरक्षित देखो नारी अब

डर डर  कर रहती बहुसंख्यक जो आबादी

मैं चाहूँ भी तो कैसे झंडा फहराऊं

मैं कैसे तुम्हे मनाऊं मेरी आज़ादी !


रविवार, 7 अगस्त 2016

मेरी दोस्ती मेरा प्यार


रिश्ते वो हैं जो जन्म के कारण बनते हैं

दोस्ती वो जो जीवन के कारण  बनती है



सरे राह चलते कोई मिल गया

दो चार बाते हुयी

कुछ मैंने कही उसने सुनी

कुछ उसने कही मैंने सुनी

और अनजाने ही एक दोस्ती शुरू हो गयी !



मैं हिन्दू था , वो मुसलमान निकला

पूर्वाग्रह था - मुसलमान अच्छे नहीं होते

फिर भी वो अच्छा लगा

शायद उसके भी मन में ऐसा था कुछ

फिर भी मैं उसे अच्छा लगा



उसे भी फ़िल्में , उपन्यास और कविताएँ पसंद थी

और मुझे भी

हमने साथ साथ न जाने कितनी फ़िल्में देखी

कितना संगीत सुना

कितने उपन्यास आपस में बदले

दोस्ती और गहरी होती गयी



उसने ईद पर मुझे बुलाया

मैं झिझका ; हमारा खाना पीना जो अलग था

उसे मेरी झिझक का पता था

उसने मेरे लिए अलग बर्तन मंगाये

शुद्ध शाकाहारी भोजन खिलाया



मुझे अपनी झिझक पे झिझक आयी

हम दोनों साथ साथ होटलों में खाते हैं

तब क्योँ नहीं ये झिझक आड़े आती

हवाई जहाज में कौन नए बर्तन में खाना बनाता होगा

इस सोच से दोस्ती और मजबूत हो गयी



दिवाली पर मैंने उसे बुलाया

वो नए कपडे पहन कर आया

माँ ने बड़े प्यार से उसका भी थाल सजाया

उसे हमारी दिवाली पसंद आयी

दोस्ती और मजबूत हो गयी



इस दोस्ती को इकतालीस साल बीत गए

सालों साल मिलना नहीं होता

लेकिन दिलों में दोस्ती अभी भी ताजा है

क्योंकि दोस्ती वो रिश्ता है

जो सभी रिश्तों का राजा है !

मंगलवार, 28 जून 2016

सिंगापुर

कुछ सीखने के लिए
अपने से बेहतर लोगों की तरफ देखो
अपने से बड़े लोगों की तरफ नहीं
बड़ा होना बेहतर होने की निशानी नहीं

भारत बहुत बड़ा देश है
सिंगापुर बहुत छोटा
शायद भारत के एक शहर जितना बड़ा
फिर भी भारत को सिखा सकता है
बहुत कुछ !

स्वच्छ्ता
सुंदरता
सुरक्षा
देशप्रेम
नागरिकता
अनुशासन
ईमानदारी
पर्यावरण
अच्छी शिक्षा
अच्छा उपचार
अच्छी सड़कें
सरल यातायात
मजबूत करेंसी
और सर्वोपरि -
मानवता !

और ये सब
सरकार से संभव नहीं
संभव है देश के लोगों से !
आइये सीखे सिंगापुर से।

भारत में रहने वाला हर व्यक्ति
भारतीय नहीं है -
वो बंगाली है , पंजाबी है
वो हिन्दू है मुस्लमान है
वो राजपूत है यादव है
वो उत्तर भारतीय है दक्षिण भारतीय है
वो शाकाहारी है , मांसाहारी है
वो पढ़ा लिखा है , वो अनपढ़ है
वो अमीर है गरीब है
वो कम्युनिस्ट है , समाजवादी है
वो दलित है , वो महादलित है
वो ब्राह्मण है वो शुद्र है
वो स्त्री है वो पुरुष है
वो माइनोरिटी है , मेजोरिटी है
वो सब कुछ है बस भारतीय नहीं है !

सिंगापुर में बसने वाला भारतीय भारतीय नहीं है -
सिंगापुर में रहने वाला चीनी भी चीनी नहीं है -
यहाँ रहने वाला मलेशियाई भी मलेशियाई नहीं है
यहाँ का हर नागरिक
सिंगापुरियन है ! बस सिंगापुरियन है !

रविवार, 3 अप्रैल 2016

कोलकाता का कहर



आज फिर एक पुल गिरा
वर्षों पहले यहाँ जब ये पुल नहीं था
बहुत से लोग आते जाते थे इस चौरस्ते से
गाड़ियां , रिक्शे ,पैदल , झाका  वाले

चौरस्ते के एक कोने पर था -एक सिनेमा हाल
गणेश टॉकीज
दूसरी तरफ एक मिठाई की दुकान
तीसरी तरफ एक शरबत वाला
और चौथी तरफ एक रिहायशी मकान

सब सुखी थे
किसी को शिकायत नहीं थी
इस भीड़ से
इस चौरस्ते से

फिर एक दिन नजर पड़ी
सरकार की
और उसने फैसला लिया
एक पुल  बनाने का

वर्षों बीत गए
भीड़ बढ़ती रही
रास्ता घटता रहा
लेकिन कोई पुल नहीं बना

चुनाव हुआ
सत्ता बदल गयी
नयी सरकार आ गयी
लेकिन पुल नहीं बना

जनता सहती रही
जीवन को फिर आदत सी पड़  गयी
उस बिन बने पुल के कारण
घटे हुए रास्ते की

लेकिन फिर चुनाव आ गए
फिर नज़र पड़ी सरकार की
ये पुल अब तक क्यों नहीं बना
चुनाव से पहले बनना चाहिए

फिर हुआ जीवन अस्त व्यस्त
सुस्त पड़े पुल के निर्माण में सब व्यस्त
रातोंरात सब कुछ करना है
चुनाव से पहले लोकार्पण करना है

लेकिन ये क्या ?
पुल को सुस्त रहने की आदत थी
एक साथ इतना कुछ लाद दिया उस पर
किसी ने उससे नहीं पूछा -

भाई पुल , तुम ठीक तो हो न ?
कहीं बुढ़ापे ने तुम्हे कमजोर तो नहीं कर दिया न ?
तुम ये नया बोझ ढो  तो सकोगे न ?
तुम्हारे पैर धोखा तो नहीं देंगे  न ?

और उस रात पुल पर हुयी ढलाई
पुल की कमजोर आत्मा चरमराई
दोपहर तक जैसे तैसे झेला
लेकिन फिर ढह गया खेला

हाहाकार मच गया
कोई दब गया
कोई मर गया
कोई बच गया

राजनीति शुरू हुयी
ठेका पिछली सरकार ने दिया था
ठेका देने का पैसा
उसने लिया था

लेकिन तुमने क्या किया
कभी उस ठेकेदार का जायजा लिया
और फिर अचानक तुम्हे दिखा एक वोट बैंक
सोचा क्यूँ न इसका फायदा लिया

कितना कुछ दब गया
इस पुल के नीचे
किसी पत्नी का सुहाग
किसी परिवार का चिराग

किसी जवानी  के सपने
किसी  बुढ़ापे के अपने
किसी बच्चे का बाप
किसी पत्नी का प्रलाप

हाँ कुछ और भी तो दबा है
तुम्हारा वो वोट बैंक
तुम्हारी ये विधान सभा की गद्दी
अब हुयी रद्दी !

दोष किसका है ?
पिछली सरकार का ?
अगली सरकार का ?
ख़राब ठेकेदार का ?
या सरकारी भ्रष्टाचार का ?
मिलावटी सीमेंट और ग़ारे का ?
या भ्रष्ट भाईचारे का ?
आरक्षण कोटे के इंजीनियर का ?
या सिफारिश से आये ओवरसियर का ?
देश की दुर्भाग्यपूर्ण अवस्था का ?
या अवस्था के लिए जिम्मेवार व्यवस्था का ?





मेरी ख़ामोशी रज़ा सी हो गयी


जिंदगी कुछ बेमज़ा  सी हो गयी 
साँस लेना ही वजह सी हो गयी 

मुझसे कुछ पूछे बिना सब कुछ हुआ 
मेरी ख़ामोशी रज़ा सी हो गयी 

मुस्कुराने की वजह मिलती नहीं 
मुस्कराहट भी सज़ा  सी हो गयी

 फेफड़ों में जहर सा यूँ भर रहा 
जैसे ज़हरीली फ़िज़ा सी हो गयी 

लड़ रहा हर वक़्त कोई जिंदगी से 
जिंदगी भी यूँ कज़ा सी हो गयी 




गुरुवार, 24 मार्च 2016

देश मांगता आजादी

देश मांगता आजादी


गद्दारों से -आजादी
मक्कारों से -आजादी
देश को गाली देने वाले
सब नारों से -आजादी !

मुफ्तखोरों से -आजादी
छुपे चोरों से -आजादी
देश का खाकर  उल्टा बोले
उन छिछोरों से आजादी !

उन नेताओं से आजादी
उन श्रोताओं से आजादी
जेएनयू में राजनीती के
कर्ताओं से -आजादी !

अलगाववाद से -आजादी
आतंकवाद से - आजादी
इनको शह देने वाले दल की
हर बकवाद से आजादी !

सस्ते में मिल गयी - आजादी
धूर्तों को मिल गयी -आजादी
इसीलिए वो नहीं समझते
क्या होती है - आजादी !

दी भगत सिंह ने आजादी
दी राजगुरु ने आजादी
बिस्मिल, सुखदेव की क़ुरबानी
और दी आजाद ने आजादी !





रविवार, 6 मार्च 2016

बस शोर हो शोर है।

संसद

कभी तालियों का जोर है
कभी गलियों का जोर है
संसद अब कुछ नहीं
बस शोर हो शोर है।

जब प्रतिपक्ष गरियाता है
सत्तापक्ष सुनता है
जब सरकार धमकाती है
विपक्ष सर धुनता है।

हर बकवास का उत्तर देने को
एक नयी बकवास तैयार होती है
फिर उसके उत्तर के लिए
एक और बकवास की मार होती है।

जो बोल नहीं पाते
वो फड़कने लगते हैं
जिन्हे समय नहीं दिया जाता
वो भड़कने लगते हैं।

ऐसा लगता है -
संसद एक थिएटर है
जिसमे साढ़े पांच सौ
एक्टर हैं

जिसकी टिकट
यूँ तो मुफ्त है
लेकिन हमारी जेब के करोड़ों
हर घंटे लुप्त हैं

कभी कभी संसद
चलने नहीं देते
चलने देते
तो क्या कर लेते

उस अनदेखी
असहिष्णुता के लिए
दिनोदिन चलती है
बहस

लेकिन सियाचिन में
मरने वालों के लिए
होता है मौन
आधे मिनट का

सत्र पर सत्र
बीत जाते हैं
खजाने के खजाने
रीत जाते हैं

पर फैसले
कभी नहीं होते
जरुरी बिलों पर
देश के निराश दिलों पर

बाल की बस
खाल निकलती है
चाल पर चाल
निकलती है .

पांच साल
यूँ ही चलता है
फिर अगले पांच साल के लिए
दिल मचलता है


सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

हनुमंतप्पा


वो सफ़ेद कब्रिस्तान -सियाचिन
जहाँ जीवित रहना एक विजय है
साँसे ले पाना - एक दिलासा
वहां !
हाँ वहां , पहरा देते हैं कुछ जुझारू जवान
घर की सुरक्षा से दूर
परिवार के प्यार से परे
शहरों की रंगरेलियों से अनजान
झेलते बर्फ के तूफ़ान !

ऐसा ही तूफ़ान आया उस दिन
दौड़ शुरू हुयी जीवन और मृत्यु के बीच
वो दस जवान , पीछे तूफान
एक एक कर के हारते गए
उस अस्सी मील प्रति घंटा की रफ़्तार से
आ रही मौत से !

हार नहीं मानी - लांस नायक हनुमंतप्पा  ने
सो गया बर्फ की चादर पर
ओढ़ ली बर्फ की रजाई
मौत से कह दिया - दस्तक मत देना
थका हुआ हूँ सोने दे मुझे
और फिर वो बर्फ का तकिया लगा कर
सो गया भारत माँ की गोद  में !
मौत एकटक देखती रही
भारत माँ के उस बहादुर बेटे को
हिम्मत नहीं पड़ी उसे जगाने की
पूरे छह दिनों तक !

मृत्यु का विजेता
घर आया , देश को प्रणाम किया
और फिर चला गया
अपनी मृत्यु अपनी इच्छा से चुन कर !

और उसी दिन
एक जलसा हुआ जवाहर लाल विश्वविद्यालय में
श्रद्धांजलि देने के लिए
शहीदों को !
लांस नायक हनुमंतप्पा को नहीं -
देश की संसद के आक्रमणकारी
अफजल गुरु को !
कस्मे खायी गयी
बर्बाद करने की -
दुश्मन को नहीं अपने देश की !

कितना रोई  होगी हनुमंतप्पा की आत्मा -
हमने अपना जीवन गलाया
ऐसी खौफनाक मृत्यु को गले लगाया
इन गद्दारों के लिए !

दुर्भाग्य है देश का
शहीदों के लिए दो आंसू बहाने का वक़्त नहीं
जेएनयू में पहुँचते हैं हमारे नेता
गद्दारों को बचाने  के लिए
मौके को भुनाने के लिए
वोटों को बढ़ाने के लिए !


शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

Happy New Year !


हर साल आता है एक नया साल
अतीत और भविष्य के बीच
एक अर्ध विराम सी ३१ दिसंबर की रात्रि !

मनःस्थिति ऐसी होती है -
जो बीता वो सामान्य सा था
जो आएगा वो विशेष होगा।

जो बीत गया वो अनुभूत है
जो आएगा वो कल्पना
 बस यही अंतर है।

हम उस यथार्थ को भूलना चाहते है
जो हमने जिया
पीछा छुड़ाना चाहते हैं उससे।

लेकिन जीना चाहते है सपनों में
भरना चाहते हैं कल्पना की उड़ान
एक अंतहीन यात्रा का लक्ष्य ढूंढते हैं अगले साल में।

लो नया साल शुरू हो गया
१ जनवरी की गुलाबी ठण्ड वाली सुबह
वही चाय का प्याला , वही अख़बार।

बस अख़बार की तारीख नयी है
कल २०१५ थी , आज २०१६ है
आइये खुश हो जाते हैं !


सोमवार, 16 नवंबर 2015

एफिल टॉवर


गूँज रही चित्कारें पेरिस में
गलियों में  रोने की आवाजें हैं
फुटबॉल जहाँ पर खेला  जाना था
जहाँ जोश दर्शकों में भर आना था
अफरा तफरी है मची वहां पर भी
प्राणों को लेकर भाग रही जनता
संगीत प्रेमियों का वो मंदिर था
सुर के साधन का साधन अंदर था
कानों में मिश्री घोल रहे सुर से 
श्रोताओं की आँखे भी मूंदी  थी
फिर वहां अचानक कर्कश आवाजें
बम की गोली चलने की वहीँ कहीं
फिर खून से हुए लथ पथ श्रोता सब
लाशों से पटी पड़ी थी वो भूमि

ये कैसा शैतानी हंगामा बरपा
क्यूँ रास नहीं आती उनको दुनिया
क्यों मौत लिए फिरते ये वाशिंदे
ईश्वर ने  नहीं बनाये ये बन्दे
क्यूँ  अल्लाह के ही नाम लिखे जाते ये कृत्य
क्यूँ मजहब की दीवारों पर ही लिखते
ये कैसे बन्दे है ये  जेहादी
ये मानव के ही  रूप में दानव से दिखते

एफिल टॉवर  , तू  देख रहा है न
ऊंचाई से तुझको सब दीखता
पहचान जरा कर ले इन चेहरों की
गिन गिन  कर इनसे बदले तू लेना
हर एक जान की करले गिनती तू
कितना है खून बहा करले गणना
मानवता के इन हत्यारों से तू
मानवता का हिसाब चुकता करना



आइये चर्चा करेँ बिहार की

आइये चर्चा करेँ बिहार की
किस की जीत की
किस की हार की !

कुछ लोग प्यार करते हैं
अपनी बदनसीबी से
अपनी बदहाली से
अपनी गरीबी से
उस प्यार की ये  जीत
लेकिन हार बिहार की !

जाति के चुम्बक से
खींची आती जातियां
मुठ्ठियाँ भिंच जाती
फूल जाती छातियाँ
संकीर्णता की जीत
हार मुक्त विचार की !

इतिहास सामने था
पिछले छह दशक का
अपने ही देश में रहे
पिछड़े की कसक का
इतिहास की ही जीत
हार जीर्णोद्धार की !

देकर  जमानतें जो
जो छूट आये  जेल से
प्रतिबन्ध जिसपे था
की दूर रहे खेल से
अपराधियों की जीत
हार कर्णधार की !

लड़ते थे देके गालियां
प्यासे थे खून के
मिल कर हैं बैठे
वोट के प्यासे जूनून के
मौका-परस्तियों की जीत
हार तेज धार की !

है देश खा रहा तरस
तुझ पर यूँ ऐ बिहार
तूने चुनी है अपनी
बदनसीबी बार बार
टूटी हुयी  नौका की जीत
हार पतवार  की  !




रविवार, 23 अगस्त 2015

हे पाकिस्तान !

हे पाकिस्तान !
शर्म आती  है ये सोच कर
कि  तुम कभी मेरा ही हिस्सा थे !
चकित होता हूँ ये याद कर के
कि तुम भी अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई का हिस्सा थे !

आजादी क्या मिली
तुम्हारे तो सुर ही बदल गए थे
हजारों वर्षों की दासता में साथ थे
आजादी में बाहर निकल गए थे !

 तुम्हारा दोष नहीं
दोष है तुम्हारे रहनुमाओं का
शापित हो तुम , फल भुगत रहे हो
बंटवारे में मिली बद्दुआओं का !

आज मैं कहाँ और तुम कहाँ ?
देखता है सारा जहाँ
मैं हूँ  प्रगतिशील दुनिया का सिरमौर
तुम हो एक आतंकवादी , झूठे और चोर !

हाँ चोर ! क्योंकि चोरी छिपे वार करते हो !
अपनी ही जमीन पर  आतंकवादी तैयार करते हो
बना लिया मजहब को तुमने  हथियार
और हो गए किसी पागल घोड़े पर सवार !

ओसामा बिन लादेन जैसों के शरणदाता हो तुम
दावूद  इब्राहिम जैसे अपराधियों  के तो पिता और माता हो तुम
लाख झूठ बोलते हो दुनिया को , इनके लिए
वही मरवाएंगे तुम्हे , मरते हो जिनके लिए !

किस्मत अच्छी ही थी ,कि  तुम हमसे कट  गए
भले ही भारत माता के अंग बंट   गए
लेकिन कैंसर के हिस्से को काटना ही अच्छा है
कष्ट पाकर भी तन से छांटना ही अच्छा है !

सोमवार, 17 अगस्त 2015

मुस्कान है भारत

मेरा  मान है भारत
मेरी शान है भारत
मेरा जीवन है
मेरी जान है भारत !

मेरा धर्म है भारत
मेरा कर्म है भारत
भारत मेरी गीता
कुरान है भारत !

मेरा गर्व है भारत
मेरा पर्व है भारत
मेरी दिवाली है
रमजान है भारत।

मेरा ग्रन्थ है भारत
मेरा पंथ है भारत
मेरी ताकत है  ये
किरपान है भारत।

जग शांति है भारत
पर क्रांति है भारत
सरहद पर फौजी
बलिदान है भारत।

खुशहाल है भारत
यूँ निहाल है भारत
हर प्रीत का उत्तर
मुस्कान है भारत।  

रविवार, 2 अगस्त 2015

हे सविता !

[ आज मेरी बड़ी बहन सविता ने साठ साल पूरे किये। मुझसे बस एक साल बड़ी हैं। मैंने उन्हें ये कविता भेंट की अपनी आवाज में। मेरी बहुत सारी शुभकामनायें उनको। ]


हे सविता !
तुम हुयी साठ  की मैं उनसठ का
इस पर क्या हो कविता !
हे सविता !

लगती सब बातें कल की सी
जो बीत गयी हैं पल की सी
तुम पढ़ने में पागल रहती
तुम पर बलिहारी पिता !
हे सविता !

हम  भाई मस्ती करते थे
कभी लड़ते कुश्ती करते थे
तुम एक घुड़की देती हमको
माँ को दूँगी सब बता !
हे सविता !

तुम छोटी थी जब आठ साल की
हमको लगती तुम साठ  साल की
बस भजन हवन और पठन तेरा
हमको बोरिंग लगता !
हे सविता !

हम तुमसे कितना डरते थे
पीछे से हिटलर कहते थे
फिर भी तुम ढक  लेती थी
तब हाँ दोनों की खता !
हे सविता !

अब सच में हुई साठ  की तुम
बचपन के पढ़े पाठ की तुम
अब मूर्ति दिखाई देती हो
हैं नमन तुम्हे सविता !

हे सविता !

मंगलवार, 23 जून 2015

ऐ दरख्त यार !


कुछ बात कर , ऐ दरख्त यार !
चुपचाप क्यूँ , कमबख्त यार !

तू बचपन का साथी
अब पचपन का साथी
मैं कितना बड़ा हुआ
तेरा रुका हुआ है वक्त यार !

ऋतुएँ आती जाती
तुझ पर है बरसाती
कभी धूप कभी बारिश
फिर भी तू कितना सख्त यार !

भूखे को  फल देता
गर्मी का हल देता
तेरे आँचल के नीचे
कटता सबका है वक्त यार !

आ तुझसे लिपट जाऊं
छाती से चिपट जाऊं
सारे रिश्ते हैं झूठे
सच्चा है तू बस फ़क्त यार !

शनिवार, 20 जून 2015

योग आखिर क्या है













योग कोई  धर्म नहीं
योग कांड  कर्म नहीं
योग अर्चना नहीं
योग वंदना नहीं !

योग सीमित भी  नहीं
योग परिमित भी नहीं
योग देश का नहीं
योग परदेस का नहीं !

योग सृष्टि ज्ञान है
योग मानव गान है
योग एक साधना
योग तन आराधना !

योग तन नैरोग्य है 
योग तो आरोग्य है
योग तन का स्वास्थ्य है
योग मन का स्वास्थ्य है !

योग जीने की कला
योग साधन श्रृंखला
योग नित्य कर्म है
योग स्वास्थ मर्म है !

स्वास लेने की कला
स्वास तजने की कला
योग स्वच्छ रक्त है
योग रोग मुक्त है !

आत्म साथ  योग है
आत्मसात योग है
स्वयं साध्य योग है
स्व-आराध्य योग है !






मंगलवार, 19 मई 2015

सुख और दुःख

मेरे मन में खुशियाँ हैं
मेरे मन में दुःख भी हैं
खुशियों से खुश होता
दुःखों  से पर रोता

है सभी चाहते खुशियां
है कौन चाहता पीड़ा
पर दोनों का बंधन है
खुशियों के संग ही पीड़ा।

दुःखों  के बिन खुशियों का
खुशियों के बिन दुःखों  का
कुछ अर्थ नहीं होता है
कुछ व्यर्थ नहीं होता है।

अँधेरे बिना उजाले
भी लगते हमको काले
अँधेरे का कालापन
ही चमकाता उजलापन।

गर्मी में ही सर्दी की
सर्दी में ही गर्मी की
कीमत तय होती है
दोनों की जय होती है।

हर रात सुबह को लाती
हर सुबह ख़त्म हो जाती
फिर रात  नयी इक आती
जो नयी भोर बन जाती।

जैसे सुख जीवन में
ईश्वर का इक प्रसाद
वैसे ही बस आवश्यक
इस जीवन में अवसाद ।


शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

किसान रैली



सभा चल रही थी
आम आदमी बैठे थे
नेता मंच से भाषण दे रहे थे !

तभी एक आम आदमी
चढ़ गया पेड़ पर
कुछ आभास दिया
आत्महत्या का !

सभा चलती रही
आम आदमी बैठे रहे
नेता भाषण देते रहे !

लग गयी बाजियां
किसी ने कहा
ये सब है कलाबाजियां
कुछ मरने वरने  वाला नहीं ये
लग गयी सौ सौ की !

पेड़ पर हरकते बढ़ी
आम आदमी ने बनाया  एक फंदा
एक तरफ बाँधा पेड़ से
दूसरी तरफ गले से !

सभा फिर भी चलती रही
आम आदमी वैसे ही बैठे रहे
नेता बेखबर भाषण देते रहे !

उधर बाजियों के बाजार में तेजी आई
एक ने कहा - बोल बढ़ाता  है क्या ?
दूसरे ने कहा - हाँ हाँ , पाँच पाँच  सौ की !
तीसरा जुड़ गया - पाँच सौ मेरे भी मरने पर !

अचानक
पेड़ पर बैठा आम आदमी झूल गया
उसके पैर हवा में बल खाते रहे
उतनी देर तक
जितनी देर साँसें सह पायी कसन को
फिर सब कुछ ख़त्म !

सभा चलती रही
आदमी बैठे रहे
मंच पर भाषण चलते रहे -
लेकिन विषय बदल गया
किसान के शुभचिंतक
किसान की मातम पुरसी में लग गए
आनन फानन में कारण तैयार हो  गए
दोषारोपण के लिए

बाजी के सौदे भुगतान की मांग करने लगे
न मरने पर लगाने वाले का तर्क था -
अभी मरा कहाँ है
दूसरी तरफ वाला बोला -
क्या पोस्ट मोर्टम के बाद देगा
तीसरे ने कहा -
कौन इन्तजार करेगा ,
चले आधे आधे में फैसला कर लेते हैं

कुछ लोग पेड़ पर चढ़ गए
लटके  हुए आम आदमी को नीचे उतारा
गाड़ी में डाल कर ले गए

मंच से आवाज आई -
हमारे कार्यकर्ताओं ने उसे उतारा
पुलिस ने कुछ नहीं किया
क्यूंकि पुलिस हमारी नहीं है
छोड़िये ये सब …
आइये किसानों की बात आगे बढ़ाते हैं

बाजी आधे आधे पर सलट गयी

मीडिया को एक नया मसाला मिल गया

लोकसभा को गरमाने के लिए बहाना  मिल गया !

सोमवार, 30 मार्च 2015

आम आदमी भी फिर आम हो गया


जब आम आदमी का बड़ा नाम हो गया
अब आम आदमी भी फिर आम हो गया

बातें बड़ी बड़ी जो करते थे जोर से
बातों के हल्केपन से बदनाम हो गया

भाईचारे के गाने जो गाते थे मंच पर
भाई बेचारे को  रो रो जुकाम  हो गया

जो लोकपाल के नारे से दिल्ली पर छा गए
उनका  ही लोकपाल अब गुमनाम हो गया

जो बात करते थे हमेशा प्रजातंत्र की
वो आज तानाशाह सरे आम हो गया

सत्ता का लोभ है नहीं, नारे लगाते  थे
सत्ता मिली तो बस बेलगाम हो गया




मंगलवार, 3 मार्च 2015

सुबह की शमां

क्यूँ  आजकल हवाएँ कुछ सर्द सर्द है
क्यूँ आजकल फ़िज़ाएं भी गर्द गर्द  हैं

चेहरे सुबह की शमां  से यूँ बुझे हुए
हर आँख में उदासी क्यूँ जर्द जर्द है

खुशियां सभी की जैसे काफूर हो गयी 
मुस्कान में भी दिखता क्यूँ दर्द दर्द है

ये नौजवान पीढ़ी क्यूँ बुजुर्ग हो गयी
नामर्द बन रहा क्यूँ हर मर्द मर्द है



रविवार, 11 जनवरी 2015

स्मृति - विस्मृति


जीवन में कभी कभी कुछ प्यारा खो जाता है
जीवन की प्रियतम वस्तु के खो जाने से
जीवन फिर जैसे अर्थहीन सा  हो जाता है !

दुखों का सागर खूब हिलोरें लेने लगता
मन का विषाद मन को कुंठित करता रहता
तन थका हुआ हो फिर भी मन  जगता रहता !

कुछ खो जाने से समय नहीं थम जाता है
जीवन की गति चलती रहती साँसों के संग
दुःख के क्षण पीछे छोड़ समय बढ़ जाता है।

पीछे मुड़ कर हम कभी पकड़ नहीं पाएंगे
सुख के लम्हे दुःख के लम्हे खो जाएंगे
आने वाले  दिन कुछ और नया दिखलायेंगे !

स्मृति जैसे मनुष्य के मन का मान है
विस्मृति मनुष्य को ईश्वर का वरदान है
दोनों के होने से  जीवन आसान है  !



गुरुवार, 1 जनवरी 2015

ईश्वर हमें शक्ति दे !

समय का एक खंड बीत गया
समय का अगला खंड शुरू हुआ
क्या यही नहीं होता
हर महीने , हर सप्ताह , हर दिन
हर घंटे हर मिनट हर क्षण !

समय यूँ  बीत रहा है
उम्र हर क्षण हार रही है
समय हर क्षण जीत रहा है
सूर्य बूढा नहीं होता
चाँद थकता नहीं है
बूढा होता है शरीर
थकता रहता यह तन

हर वर्ष हम नापते हैं
एक दूरी को
जो घट रही है निरंतर
हमारे जीवन
और हमारी मृत्यु के बीच

हम झुठलाते हैं एक  दूसरे को
ये कह कर कि
अगला वर्ष शुभ हो
एक क्षीणतर तन के साथ ?
हमारी दुआएं
कर्ण प्रिय भी नहीं लगती 
क्योंकि हम जानते हैं
की सब खोखली है !

हमारी सच्ची शुभकामना होती -
तुम्हारी सारी समस्याओं से लड़ने के लिए
ईश्वर तुम्हे और हौसला दे
अगले काल खंड में !
समय के साथ संघर्ष बढ़ता है
हमें चाहिए आशीर्वाद
अपने संघर्ष को जीतने का
न की नया वर्ष आने का
पुराना  वर्ष बीतने का !

ईश्वर हमें शक्ति दे !


शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

कश्मीर नहीं समस्या

कौन  कहता है
कश्मीर कोई विवाद है
देश के अन्य राज्यों जैसा है
कहाँ कोई अपवाद है ?

कश्मीर को भी चाहिए
आजीविका के  अवसर
शांति का जीवन
स्वच्छ साफ़ परिसर

बच्चों को शिक्षा
बड़ों को रोजगार
बूढ़ों को आदर
महिलाओं को अधिकार

पर्यटकों की भीड़ 
डल में रौनक
दिलों में ख़ुशी
चेहरों पर चमक

बता दिया विश्व को
पिछले चुनाव में
ये अभिन्न है भारत से
नहीं अन्य प्रभाव में

समस्या है कश्मीर
पर कश्मीर में नहीं
किसी और ही मुल्क की
तकदीर में नहीं

कश्मीर का हर दल अब
सरकार चाहता है
कश्मीर की तरक्की
सौ बार चाहता है

इस बार की सरकार तो
गर काम यूँ करेगी
कश्मीर समस्या का
 इंतजाम यूँ करेगी

अलगाववादियों का
अलगाव वादियों से
ऐसा करेगी पुख्ता
ठहराव वादियों से

आतंकवादियों को
दहशत में ऐसी डाले
आतंक  से मरे सब
आतंक करने वाले


बुधवार, 24 दिसंबर 2014

माँ

ठन्डे पहाड़ों के बीच
बसा  वो छोटा सा शहर
कभी कोहरा कभी बादल
कभी वर्षा हर पहर !

इस ठन्डे शहर में
थी इक बड़ी हवेली
जिसमे बसती  इक दुनिया
दुनिया से अलबेली !

ठंडा आँगन ठंडी धरती
ठंडा था आसमां
इस ठंडेपन के बीच मगर
ऊष्मा थी प्यारी माँ !

उसकी ममता की निवाच में
सब कुछ ही सबका था
उस दिल की बड़ी रजाई में
सारा घर दुबका था !

सबसे पहले उठती थी माँ
सबकी खातिर उठती
छत  पर चौके में जाने को
सीढ़ी पहले चढ़ती !

चौके में चूल्हा एक तरफ
एक तरफ बनी  क्यारी
एक तरफ बैठ तकती सबको
माँ थी कितनी प्यारी !

बाबूजी रहते शांत सदा
जीवन बिलकुल सादा
माँ उनकी सेवा में रहती
बन घर की मर्यादा !

कितने बेटे कितनी बहुएं
कितने पोती पोते
सबका रखती वो ध्यान
हमेशा जगते या सोते !

वेदों ने माना मनु जीवन
जीवन सौ वर्षों तक
उत्तम जीवन जीने वाले ही
जीते पूर्ण शतक !

इन सौ वर्षों के जीवन में
इक दुनिया बना गयी
सौ लोगों के इस घर की
यादों में समा  गयी  !

माँ , आज तुम्हारा अभिनन्दन
करते हम सब बच्चे
तुम दूर कहाँ हमसे, माँ

कहते मन से सच्चे !