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रविवार, 2 अगस्त 2015

हे सविता !

[ आज मेरी बड़ी बहन सविता ने साठ साल पूरे किये। मुझसे बस एक साल बड़ी हैं। मैंने उन्हें ये कविता भेंट की अपनी आवाज में। मेरी बहुत सारी शुभकामनायें उनको। ]


हे सविता !
तुम हुयी साठ  की मैं उनसठ का
इस पर क्या हो कविता !
हे सविता !

लगती सब बातें कल की सी
जो बीत गयी हैं पल की सी
तुम पढ़ने में पागल रहती
तुम पर बलिहारी पिता !
हे सविता !

हम  भाई मस्ती करते थे
कभी लड़ते कुश्ती करते थे
तुम एक घुड़की देती हमको
माँ को दूँगी सब बता !
हे सविता !

तुम छोटी थी जब आठ साल की
हमको लगती तुम साठ  साल की
बस भजन हवन और पठन तेरा
हमको बोरिंग लगता !
हे सविता !

हम तुमसे कितना डरते थे
पीछे से हिटलर कहते थे
फिर भी तुम ढक  लेती थी
तब हाँ दोनों की खता !
हे सविता !

अब सच में हुई साठ  की तुम
बचपन के पढ़े पाठ की तुम
अब मूर्ति दिखाई देती हो
हैं नमन तुम्हे सविता !

हे सविता !

मंगलवार, 23 जून 2015

ऐ दरख्त यार !


कुछ बात कर , ऐ दरख्त यार !
चुपचाप क्यूँ , कमबख्त यार !

तू बचपन का साथी
अब पचपन का साथी
मैं कितना बड़ा हुआ
तेरा रुका हुआ है वक्त यार !

ऋतुएँ आती जाती
तुझ पर है बरसाती
कभी धूप कभी बारिश
फिर भी तू कितना सख्त यार !

भूखे को  फल देता
गर्मी का हल देता
तेरे आँचल के नीचे
कटता सबका है वक्त यार !

आ तुझसे लिपट जाऊं
छाती से चिपट जाऊं
सारे रिश्ते हैं झूठे
सच्चा है तू बस फ़क्त यार !

शनिवार, 20 जून 2015

योग आखिर क्या है













योग कोई  धर्म नहीं
योग कांड  कर्म नहीं
योग अर्चना नहीं
योग वंदना नहीं !

योग सीमित भी  नहीं
योग परिमित भी नहीं
योग देश का नहीं
योग परदेस का नहीं !

योग सृष्टि ज्ञान है
योग मानव गान है
योग एक साधना
योग तन आराधना !

योग तन नैरोग्य है 
योग तो आरोग्य है
योग तन का स्वास्थ्य है
योग मन का स्वास्थ्य है !

योग जीने की कला
योग साधन श्रृंखला
योग नित्य कर्म है
योग स्वास्थ मर्म है !

स्वास लेने की कला
स्वास तजने की कला
योग स्वच्छ रक्त है
योग रोग मुक्त है !

आत्म साथ  योग है
आत्मसात योग है
स्वयं साध्य योग है
स्व-आराध्य योग है !






मंगलवार, 19 मई 2015

सुख और दुःख

मेरे मन में खुशियाँ हैं
मेरे मन में दुःख भी हैं
खुशियों से खुश होता
दुःखों  से पर रोता

है सभी चाहते खुशियां
है कौन चाहता पीड़ा
पर दोनों का बंधन है
खुशियों के संग ही पीड़ा।

दुःखों  के बिन खुशियों का
खुशियों के बिन दुःखों  का
कुछ अर्थ नहीं होता है
कुछ व्यर्थ नहीं होता है।

अँधेरे बिना उजाले
भी लगते हमको काले
अँधेरे का कालापन
ही चमकाता उजलापन।

गर्मी में ही सर्दी की
सर्दी में ही गर्मी की
कीमत तय होती है
दोनों की जय होती है।

हर रात सुबह को लाती
हर सुबह ख़त्म हो जाती
फिर रात  नयी इक आती
जो नयी भोर बन जाती।

जैसे सुख जीवन में
ईश्वर का इक प्रसाद
वैसे ही बस आवश्यक
इस जीवन में अवसाद ।


शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

किसान रैली



सभा चल रही थी
आम आदमी बैठे थे
नेता मंच से भाषण दे रहे थे !

तभी एक आम आदमी
चढ़ गया पेड़ पर
कुछ आभास दिया
आत्महत्या का !

सभा चलती रही
आम आदमी बैठे रहे
नेता भाषण देते रहे !

लग गयी बाजियां
किसी ने कहा
ये सब है कलाबाजियां
कुछ मरने वरने  वाला नहीं ये
लग गयी सौ सौ की !

पेड़ पर हरकते बढ़ी
आम आदमी ने बनाया  एक फंदा
एक तरफ बाँधा पेड़ से
दूसरी तरफ गले से !

सभा फिर भी चलती रही
आम आदमी वैसे ही बैठे रहे
नेता बेखबर भाषण देते रहे !

उधर बाजियों के बाजार में तेजी आई
एक ने कहा - बोल बढ़ाता  है क्या ?
दूसरे ने कहा - हाँ हाँ , पाँच पाँच  सौ की !
तीसरा जुड़ गया - पाँच सौ मेरे भी मरने पर !

अचानक
पेड़ पर बैठा आम आदमी झूल गया
उसके पैर हवा में बल खाते रहे
उतनी देर तक
जितनी देर साँसें सह पायी कसन को
फिर सब कुछ ख़त्म !

सभा चलती रही
आदमी बैठे रहे
मंच पर भाषण चलते रहे -
लेकिन विषय बदल गया
किसान के शुभचिंतक
किसान की मातम पुरसी में लग गए
आनन फानन में कारण तैयार हो  गए
दोषारोपण के लिए

बाजी के सौदे भुगतान की मांग करने लगे
न मरने पर लगाने वाले का तर्क था -
अभी मरा कहाँ है
दूसरी तरफ वाला बोला -
क्या पोस्ट मोर्टम के बाद देगा
तीसरे ने कहा -
कौन इन्तजार करेगा ,
चले आधे आधे में फैसला कर लेते हैं

कुछ लोग पेड़ पर चढ़ गए
लटके  हुए आम आदमी को नीचे उतारा
गाड़ी में डाल कर ले गए

मंच से आवाज आई -
हमारे कार्यकर्ताओं ने उसे उतारा
पुलिस ने कुछ नहीं किया
क्यूंकि पुलिस हमारी नहीं है
छोड़िये ये सब …
आइये किसानों की बात आगे बढ़ाते हैं

बाजी आधे आधे पर सलट गयी

मीडिया को एक नया मसाला मिल गया

लोकसभा को गरमाने के लिए बहाना  मिल गया !

सोमवार, 30 मार्च 2015

आम आदमी भी फिर आम हो गया


जब आम आदमी का बड़ा नाम हो गया
अब आम आदमी भी फिर आम हो गया

बातें बड़ी बड़ी जो करते थे जोर से
बातों के हल्केपन से बदनाम हो गया

भाईचारे के गाने जो गाते थे मंच पर
भाई बेचारे को  रो रो जुकाम  हो गया

जो लोकपाल के नारे से दिल्ली पर छा गए
उनका  ही लोकपाल अब गुमनाम हो गया

जो बात करते थे हमेशा प्रजातंत्र की
वो आज तानाशाह सरे आम हो गया

सत्ता का लोभ है नहीं, नारे लगाते  थे
सत्ता मिली तो बस बेलगाम हो गया




मंगलवार, 3 मार्च 2015

सुबह की शमां

क्यूँ  आजकल हवाएँ कुछ सर्द सर्द है
क्यूँ आजकल फ़िज़ाएं भी गर्द गर्द  हैं

चेहरे सुबह की शमां  से यूँ बुझे हुए
हर आँख में उदासी क्यूँ जर्द जर्द है

खुशियां सभी की जैसे काफूर हो गयी 
मुस्कान में भी दिखता क्यूँ दर्द दर्द है

ये नौजवान पीढ़ी क्यूँ बुजुर्ग हो गयी
नामर्द बन रहा क्यूँ हर मर्द मर्द है



रविवार, 11 जनवरी 2015

स्मृति - विस्मृति


जीवन में कभी कभी कुछ प्यारा खो जाता है
जीवन की प्रियतम वस्तु के खो जाने से
जीवन फिर जैसे अर्थहीन सा  हो जाता है !

दुखों का सागर खूब हिलोरें लेने लगता
मन का विषाद मन को कुंठित करता रहता
तन थका हुआ हो फिर भी मन  जगता रहता !

कुछ खो जाने से समय नहीं थम जाता है
जीवन की गति चलती रहती साँसों के संग
दुःख के क्षण पीछे छोड़ समय बढ़ जाता है।

पीछे मुड़ कर हम कभी पकड़ नहीं पाएंगे
सुख के लम्हे दुःख के लम्हे खो जाएंगे
आने वाले  दिन कुछ और नया दिखलायेंगे !

स्मृति जैसे मनुष्य के मन का मान है
विस्मृति मनुष्य को ईश्वर का वरदान है
दोनों के होने से  जीवन आसान है  !



गुरुवार, 1 जनवरी 2015

ईश्वर हमें शक्ति दे !

समय का एक खंड बीत गया
समय का अगला खंड शुरू हुआ
क्या यही नहीं होता
हर महीने , हर सप्ताह , हर दिन
हर घंटे हर मिनट हर क्षण !

समय यूँ  बीत रहा है
उम्र हर क्षण हार रही है
समय हर क्षण जीत रहा है
सूर्य बूढा नहीं होता
चाँद थकता नहीं है
बूढा होता है शरीर
थकता रहता यह तन

हर वर्ष हम नापते हैं
एक दूरी को
जो घट रही है निरंतर
हमारे जीवन
और हमारी मृत्यु के बीच

हम झुठलाते हैं एक  दूसरे को
ये कह कर कि
अगला वर्ष शुभ हो
एक क्षीणतर तन के साथ ?
हमारी दुआएं
कर्ण प्रिय भी नहीं लगती 
क्योंकि हम जानते हैं
की सब खोखली है !

हमारी सच्ची शुभकामना होती -
तुम्हारी सारी समस्याओं से लड़ने के लिए
ईश्वर तुम्हे और हौसला दे
अगले काल खंड में !
समय के साथ संघर्ष बढ़ता है
हमें चाहिए आशीर्वाद
अपने संघर्ष को जीतने का
न की नया वर्ष आने का
पुराना  वर्ष बीतने का !

ईश्वर हमें शक्ति दे !


शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

कश्मीर नहीं समस्या

कौन  कहता है
कश्मीर कोई विवाद है
देश के अन्य राज्यों जैसा है
कहाँ कोई अपवाद है ?

कश्मीर को भी चाहिए
आजीविका के  अवसर
शांति का जीवन
स्वच्छ साफ़ परिसर

बच्चों को शिक्षा
बड़ों को रोजगार
बूढ़ों को आदर
महिलाओं को अधिकार

पर्यटकों की भीड़ 
डल में रौनक
दिलों में ख़ुशी
चेहरों पर चमक

बता दिया विश्व को
पिछले चुनाव में
ये अभिन्न है भारत से
नहीं अन्य प्रभाव में

समस्या है कश्मीर
पर कश्मीर में नहीं
किसी और ही मुल्क की
तकदीर में नहीं

कश्मीर का हर दल अब
सरकार चाहता है
कश्मीर की तरक्की
सौ बार चाहता है

इस बार की सरकार तो
गर काम यूँ करेगी
कश्मीर समस्या का
 इंतजाम यूँ करेगी

अलगाववादियों का
अलगाव वादियों से
ऐसा करेगी पुख्ता
ठहराव वादियों से

आतंकवादियों को
दहशत में ऐसी डाले
आतंक  से मरे सब
आतंक करने वाले


बुधवार, 24 दिसंबर 2014

माँ

ठन्डे पहाड़ों के बीच
बसा  वो छोटा सा शहर
कभी कोहरा कभी बादल
कभी वर्षा हर पहर !

इस ठन्डे शहर में
थी इक बड़ी हवेली
जिसमे बसती  इक दुनिया
दुनिया से अलबेली !

ठंडा आँगन ठंडी धरती
ठंडा था आसमां
इस ठंडेपन के बीच मगर
ऊष्मा थी प्यारी माँ !

उसकी ममता की निवाच में
सब कुछ ही सबका था
उस दिल की बड़ी रजाई में
सारा घर दुबका था !

सबसे पहले उठती थी माँ
सबकी खातिर उठती
छत  पर चौके में जाने को
सीढ़ी पहले चढ़ती !

चौके में चूल्हा एक तरफ
एक तरफ बनी  क्यारी
एक तरफ बैठ तकती सबको
माँ थी कितनी प्यारी !

बाबूजी रहते शांत सदा
जीवन बिलकुल सादा
माँ उनकी सेवा में रहती
बन घर की मर्यादा !

कितने बेटे कितनी बहुएं
कितने पोती पोते
सबका रखती वो ध्यान
हमेशा जगते या सोते !

वेदों ने माना मनु जीवन
जीवन सौ वर्षों तक
उत्तम जीवन जीने वाले ही
जीते पूर्ण शतक !

इन सौ वर्षों के जीवन में
इक दुनिया बना गयी
सौ लोगों के इस घर की
यादों में समा  गयी  !

माँ , आज तुम्हारा अभिनन्दन
करते हम सब बच्चे
तुम दूर कहाँ हमसे, माँ

कहते मन से सच्चे !

रविवार, 26 अक्तूबर 2014

पहाड़ पर



क्यों  लोग गर्मियों में जाते पहाड़ पर
शहरों से दूर रहने ऊंचे पहाड़ पर

सड़कों की चिल्ल पों से जब फट रहे हों कान
खामोशियों की खोज में जाते पहाड़ पर

आबोहवा शहर की जब जहर घोलती
अमृत को  ढूंढने  सब जाते  पहाड़ पर

हर वक़्त दौड़ता तन पैसे की दौड़ में
फिर वक़्त अपना ढूंढने जाते पहाड़ पर

रिश्तों  के मायने जब खो जाते शहर में
रिश्तों को फिर से जीने जाते पहाड़ पर 

सोमवार, 20 अक्तूबर 2014

सब के कद नप गए


चुनाव की भट्टी में सारे दल तप  गए
बड़ों के छोटों के सब के कद  नप  गए

बड़ी बड़ी हांकते थे जनता के आगे
जनता की आंधी में सारे ही खप  गए

जिनको परहेज था मोदी की बातों से
दोस्ती की चाहत में खड़े खड़े थक गए

जहर जो उगलते थे , आज फ़िक्र  करते हैं
बेवजह ही इतना तब किस लिए यूँ बक गए

रस्सियाँ तो जल गयी , बट  लेकिन बाकी है
बट सीधे होंगे कब , बंट बंट के बंट गए।





रविवार, 12 अक्तूबर 2014

अलग दिवाली


घर घर दीप जलायें 
अँधियारा मिट जाए। 


अंधियारे की आज देश में
बदल गयी परिभाषा
इस  बदले युग की हम सब से
भिन्न हुई है आशा

आओ हम सब इस दिवाली
कुछ  ऐसा कर जाएँ !


रहे देश का कोई बालक
शिक्षा बिन अधूरा
हर बालक  जो सपना देखे
सपना हो वो पूरा

हर नन्हे सपने को , नन्हे
पंख नए मिल जाएँ।

इस दिवाली  झाड़ू लेकर
सड़कों पर निकले हम
अपने शहर मोहल्ले का सब
कचरा दूर करें हम।

अपने घर की साफ़ सफाई
से आगे बढ़ जाएँ।

पटाखों का धूम धड़ाका
अब यह नहीं सुहाता
वायु  का प्रदूषण करता
कितना शोर मचाता

सीमा पर दुश्मन से लड़ने
अपना धन पहुँचायें। 



लक्ष्मी के पूजन की भी अब
बदल गयी परिपाटी
अपनी लक्ष्मी की कुछ राशि
यूँ समाज में बाँटी

धूप दीप नेवैद्य सभी के
जीवन को महकाए।

 
दिए जलाएं मिट्टी  के ही
तेल देश का भर कर
एक दिया अपने घर जलता
एक कुम्हार के घर पर

त्यागे सस्ती चीनी चीजें
देशी ही अपनाएं। 


मुठ्ठी मुठ्ठी दिवाली से
जगमग देश सजेगा
एक सौ तीस कोटि लोगों का
जीवन जब बदलेगा

दुनिया का सिरमौर बने यह
 अपना देश बनायें।

बुधवार, 1 अक्तूबर 2014

नमो बहुत खास है

नमो आम इंसान नहीं , नमो बहुत खास है
कितने सारे उदाहरण हमारे आस पास है

ओबामा ने नहीं दिया मोदी को वीसा
लेकिन मोदी ने दे दिया है पूरे अमेरिका को वीसा

पाकिस्तान ने अलापा अपना पुराने कश्मीरी झगडे का आलाप
मोदी ने कहा - बात करनी है तो अपनी करतूतें बात लायक करो

मोदी ने दिया ओबामा को मार्टिन लूथर किंग का ऐतिहासिक भाषण
ओबामा ले गए मोदी को मार्टिन की समाधि पर , अपने साथ

९० मिनट की वार्ता चली १४० मिनट तक
लगता है दोनों नेताओं के बीच समय की सीमायें समाप्त हो गयी

मोदी ने बात की हर मुश्किल विषय पर
लेकिन देश की प्राथमिकताओं को ऊपर रख कर

मेडिसन स्क्वायर के प्रांगण में भारतीय प्रवासी ही नहीं
दर्जनों अमेरिकी सीनेटर भी पहुंचे मोदी को सुनने

भारत और अमरीका मिल चुके हैं मंगल पर
एक बार फिर मिले हैं भारत और अमरीका मंगल के लिए

मोदी एक युग पुरुष है , जो भारत की तकदीर बदलेगा
भारत एक बार फिर विश्व का सिरमौर बन कर चलेगा 

बुधवार, 10 सितंबर 2014

विश्व विजेता


 इतिहास में विश्व विजेता था
यूनान का सिकंदर
जीता उसने विश्व
तलवार की नोक पर
खून  की नदियां बहा कर
लाशों से मैदान पटा कर
मिला क्या उसे -
एक खानाबदोश जिंदगी
लाखों  बद्दुआयें
एक अतृप्त अंत
एक शापित मौत !

आज हुआ है
एक और विश्व विजेता
जो जीत रहा है विश्व
पहला लक्ष्य
दुश्मनों को दोस्त बनाना
चीन हो या पाकिस्तान
सब को बढ़ाया
दोस्ती का हाथ
लेकिन इस चेतावनी के साथ
कि  ये है एक शक्तिशाली हाथ
दोस्तों की मदद के लिए
दुश्मनों के मुकाबले के लिए

जीत लिया पड़ोसियों को
बांग्ला देश हो या नेपाल
श्री लंका  हो या भूटान
छोटा हो या बड़ा
पडोसी सभी मित्र है

जन जन का दिल जीता
जापान में
जापान का धन आया हिंदुस्तान में
तोप तलवार से नहीं
दोस्ताना व्यवहार से

ऑस्ट्रेलिया चाहता है
भारत से सम्बन्ध
कर लिया यूरेनियम का अनुबंध

ओबामा गिन  रहा है दिन
भारी लग रहा है एक एक दिन
नरेंद्र मोदी की प्रतीक्षा है
मिलने की भरपूर इच्छा है
हवा हो गयी
वो वीसा न देने की बात
बिछी है लाल कालीन की सौगात

कौन कहता है
सिर्फ महलों में पैदा होते हैं
विश्व विजेता
भारत के गाँवों में
गरीबों के घर में
हर चाय बेचने वाला भी
देश का नेता है
विश्व विजेता है !




शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

शत शत वंदन देश तुम्हे !




















आजादी के महा पर्व पर 
शत शत वंदन देश तुम्हे !

कोई संकट कभी न आये 
चाहे दुश्मन चढ़ चढ़ आये
जो आये वो मुंह की खाये 
न हो कोई क्लेश तुम्हे !
शत शत वंदन देश तुम्हे !

ऐसा हो गणराज्य तुम्हारा 
जन गण मन का राजदुलारा 
दुनिया की आँखों का तारा 
दे आशीष गणेश तुम्हे !
शत शत वंदन देश तुम्हे !

नदियों का है ताना बाना 
भूमिगर्भ में दबा खजाना 
ऋतुओं का है आना जाना 
समृध्दि मिले हमेश तुम्हे !
शत शत वंदन देश तुम्हे !

दुनिया का सिरमोर बने तू 
शान्तिमार्ग की ओर चले तू 
थाम जगत की डोर चले तू 
प्यार मिले  हर देश तुम्हे !
शत शत वंदन देश तुम्हे !



रविवार, 25 मई 2014

मोदी है बस मोदी है।



रात अँधेरी भागी अब
भोर नयी इक जागी  अब
सूरज कितना तेज हुआ
सब हैरत अंगेज हुआ !

जो दिखते थे बड़े बड़े
ढेर हुए सब खड़े खड़े
ऐसी आंधी आई इक
खड़ा कोई न रहा तनिक !

वंशवाद के वंशज सब
कब्ज़ा कर के संसद तब
रहते थे निखरे निखरे
आज धरातल पर बिखरे।

जाति वाद के पोषक भी
जनता के थे शोषक भी
धता बताया जनता ने
दूर भगाया जनता ने।

बीज घृणा का बो बो कर
नकली आंसू रो रो कर
मजहब का नारा भी सब 
काम न आया उनके अब।

कदम कदम पर  शुचितायी
नगर नगर में सच्चाई
बात बात थी दर्पण सी
जन जन को थी अर्पण सी।

जीवन में सच्चाई थी
चिंतन में गहराई थी
मिटटी से निकला था वो
तप तप कर पिघला था वो।

दुष्प्रचार से घिरा हुआ
झूठ तंत्र से भिड़ा हुआ
सच से खुद को जोड़ दिया
उत्तर भी मुँहतोड़ दिया।

आज देश का नेता है
सबका बड़ा चहेता  है
भारत माँ की गोदी है
लाल नरेंदर मोदी है।

अच्छे दिन आने वाले
उनको है लाने वाले
गदगद आँखें रो दी है
मोदी है बस मोदी है।







 


 
 

मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

अब की है मोदी सरकार

बहुत हो चुका भ्रष्टाचार
बहुत हो चुका अत्याचार
भागो गद्दी छोड़ो अब
अब की है मोदी सरकार !

क्या इसको कहते सरकार ?
किसको है इसकी दरकार ?
मँहगाई से मर गया देश
अब की है मोदी सरकार !

बिना असर का था सरदार
जैसे रोबट सा किरदार
जिसे चलाता  जनपथ दस
अब की है मोदी सरकार !

राहुल करता है परचार
झूठी बातें बस हर बार
दस वर्षों तक झेल लिया
 अब की है मोदी सरकार !

करे सोनिया की जयकार
कांग्रेस में है भरमार
चमचों की ,मक्कारों की
अब की है मोदी सरकार !

देश की नैया है  मझदार
दिखती है बस एक पतवार
मोदी ही मल्लाह है
अब की है मोदी सरकार !

सोमवार, 17 मार्च 2014

बुरा न मानो होली है !

बुरा न मानो  होली है !
दस सालों की कई कहानी , अब तो पूरी हो ली है 
बुरा न मानो  होली है !

 कांग्रेस का नाम बदल कर "कौन कर ऐश " बना है अब 
देश की  दौलत लूट लूट कर नेता 'कैश' बना है सब
कांग्रेस ने अपनी सूरत ज्यों कालिख से धो ली है 
बुरा न मानो  होली है !
 
 मनमोहन थे अर्थशास्त्री , जग में नाम कमाया तब 
हो गए क्यों वो अनर्थशास्त्री , देश का नाम डुबाया अब 
ख़ामोशी की  चादर ओढ़े , सूरत कर ली भोली है 
बुरा न मानो  होली है !
 
राहुल थे एक दिवा स्वप्न से , कांग्रेस नित तकती थी 
सपने चकनाचूर हुए अब , बेमतलब की  भक्ति थी
ऊपर से जैसी हो बातें , अंदर से सब पोली है 
 बुरा न मानो  होली है !





 
अन्ना थे जन जन के हीरो , कैसी लाये आंधी थे 
लोग  कहा करते थे - भैया, दूजे बापू गांधी थे 
ममता के चक्कर में पड़  कर जग में बने ठिठोली है 
बुरा न मानो  होली है !




और केजरीवाल अचानक, उठे क्रांति की  ज्वाला से
सत्ता की  चाहत में बिखरे , जैसे टूटी माला से 
वोट मांगते फिरते निशदिन ये फैलाये झोली है 

बुरा न मानो  होली है !
 








 

आरोपों के दलदल से जो, निकला बनकर नायक सा 
अब दल दल हैं कोरस गाते , वो जब गाता गायक सा 
अगले युग  का नेता मोदी , भारत की ये बोली है
बुरा न मानो  होली है !













 

 


सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

कुछ नयी परिभाषायें

आम आदमी 

वो मूर्ख सा व्यक्ति 
जिसकी अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती 
जो 
सिर्फ एस एम एस के द्वारा 
हाँ या ना में अपनी राय देता है
भ्रष्टाचार

सभी राजनैतिक दलों 
का एक गुप्त 
कॉमन मिनिमम प्रोग्राम
मिडिया 

ऐसी बन्दूक 
जिसका लाइसेंस तो है 
लेकिन 
रोक टोक नहीं
तीसरा मोर्चा 

कई पैबंद मिला कर 
एक कमीज 
सिलने का प्रयास
चुनाव 

पांच सालों के लिए 
एक नयी 
बेकार सरकार 
चुनने की  प्रक्रिया
न्यूज़ एडिटर ( टीवी )

चीख चीख कर 
दूसरों को चीखने से 
रोकने वाला 
अंतिम वक्ता
अफवाहें 

बिना दस्तखत के 
हवा में उछाले  हुए 
मुट्ठी भर शब्द

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

माँ




माँ -सबसे छोटा शब्द
लेकिन सबसे वृहद् रूप
श्रष्टि का आधार
सृजन का स्वरुप

ममता का सागर
धैर्य का सिंधु
सर्वोपरि रक्षक
सर्वप्रिय बंधु

बिना शर्त साथ
सर पर है हाथ
असीमित प्यार
निरंतर दुलार

न कोई अपेक्षा
न कोई परीक्षा
अपनी संतान
जीवन कुर्बान