इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

खिड़की के बाहर की दुनिया

मेरे कमरे के पूरब में एक खिड़की है
जिससे सूरज छन छन कर आया करता था
अपनी किरणों से सर मेरा सहला कर
तडके ही मुझको रोज जगाया करता था

कमरे के दक्षिण में भी एक खिड़की है
जिसके बाहर एक नीम पेड़ का झुरमुट था
जब दूर क्षितिज पर सूरज अस्त हुआ करता
कलरव करता चिड़ियों का उस पर जमघट था

पूनम की रातों को मेरे कमरे में
दूधिया चांदनी खिड़की से भर आती थी
बरसातों में इक इन्द्रधनुष का टुकड़ा
दिखता, जब बूँदें गीत सुनाती थी

ये सब बातें इतिहास हो चुकी है अब तो
अब पहले जैसा नहीं रहा मेरा कमरा
कमरे के बाहर सब कुछ बदल गया है अब
कहने को अब भी है वो ही मेरा कमरा

पूरब की खिड़की के बाहर अब दिखती है
दस मंजिल से भी ऊंची एक इमारत अब
सूरज,चंदा,किरणे,पानी और इन्द्रधनुष
शहरों के जीवन में बन गए तिजारत सब

दक्षिण की खिड़की के बाहर का नीम पेड़
बेदर्दी से जाने किसने है काट दिया
वो झुरमुट, वो जमघट , चिड़ियों का कोलाहल
जैसे जमीन के अन्दर ही है गाड़ दिया

मुझसे बिन पूछे लूट ले गए मुझसे वो
वो मेरे कमरे में छाई मेरी खुशियाँ
मेरे हिस्से का आसमान भी छीन लिया
मुझसे छीनी खिड़की के बाहर की दुनिया

8 टिप्‍पणियां:

  1. अब खिडकी से आसमां नहीं कंक्रीट का जंगल दिखता है....बहुत अच्छी रचना..

    उत्तर देंहटाएं
  2. मंगलवार २० जुलाई को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है आभार

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  3. कलियुग है। कल पुरजों का युग। शनै: शनै: प्रकृति लुप्त होती नजर आ रही है। परिणाम सामने है। अच्छी रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुन्दर भावों को बखूबी शब्द जिस खूबसूरती से तराशा है। काबिले तारीफ है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. लो जी हम तो आपके घर का पता पूछ रहे थे...पता चला सब लुट ही चूका है. यही है कलयुगी कमरे की हालत.

    बहुत भाव भीनी रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  6. आज के दौर में हो रहे पर्यावरण के ह्रास को आपकी कविता ने शब्द दिए हैं...बेहतरीन ढंग से अभिव्यक्ति दी है...वाह...बधाई...
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत अच्छा....मेरा ब्लागः"काव्य कल्पना" at http://satyamshivam95.blogspot.com .........साथ ही मेरी कविता "हिन्दी साहित्य मंच" पर भी.......आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे...धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं