Mahendra Arya

Mahendra Arya
The Poet

सोमवार, 5 नवंबर 2012

लुप्त हास्य

श्रोता कहते हैं - कुछ मजा लाओ
जरा हास्य सुनाओ
भई,  हास्य कहाँ से लाऊँ 
जो आपको सुनाऊँ 
हास्य जीवन से हो चुका है लापता
जिसका न कोई अता न पता

हास्य लिखते थे लीडरों पर 
दहाड़ते हुए गीदड़ों पर
नेताओं की बातों पर
उनकी करामातों पर   
लेकिन अब तो राजनीति नाम का शब्द 
हो चुका है बिलकुल हास्यास्पद 
हंसने की जगह रोना आता है 
जब कोई किसी राजनेता पर कविता सुनाता है

प्रधानमंत्री मौन हैं
पद हुआ गौण  है
कहने को प्रधानमंत्री हैं
वास्तव में प्रधान संतरी हैं
सोनिया जी की सुरक्षा में  
राहुल जी की रक्षा में
बबुए से दिखते  हैं
मन ही मन खिजते  हैं
आँखों पर पट्टी है
कानों में मट्टी है


सोनिया  जी  लीडर हैं
भाषण में रीडर हैं
सजधज के रहती है 
जो कुछ भी कहती हैं
लिखता  कोई दूजा है
मुंह इनका सूजा है
थोड़ी कुम्हलाई है
मन में घबरायी है
लफड़े में फंसा है
आजकल जमाई है

राहुल जी युवा हैं
बस इतना हुआ है
इसके अलावा इन ने 
कुछ भी न छुआ है
यु पी के चुनाव में
बैठे थे नाव में
नैय्या जब डूबी थी
कोंग्रेस की खूबी थी
राहुल को बचा लिया
सब को डुबा दिया
गाँधी परिवार है
इसलिए दरबार है
वर्ना ये आदमी बिलकुल बेकार है  


एक  हैं सलमान भाई
एक था टाइगर वाले नहीं
मंत्री कानून के
पद के जूनून के  
कानून के रखवाले
बोले मेरे इलाके में आ के दिखाले 
जितना हो तुझ में दम 
आना तो तेरे हाथ में है
लेकिन जाने न देंगे हम
और इस गुंडागर्दी का मिला उन्हें फल 
खुर्शीद साहब की तरक्की हुई 
विदेश मंत्री है आजकल

किस पर हँसे हम
खुद ही फंसे हैं हम
रोज का अख़बार है
भरा भ्रष्टाचार है
बढती महंगाई है
घटती कमाई है  
टैक्सों की मार है
चोरी व्यापार है
पुलिस पैसे खाती है
फिर भी हड़काती है
पिछले साल  एक दिन 
याद है वो एक दिन
हंसा था मैं जोर से 
और अधिक जोर से 
एक ट्रक पर लिखा था  
मुझको दिखा था
उस पर एक नारा था
बहुत ही प्यारा था
सौ में से नब्बे बेईमान 
फिर भी मेरा भारत महान  


सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

दिन ब दिन

जिंदगी कुछ यूँ गुजरती  दिन ब दिन
पेड़ से पत्ती  बिखरती दिन ब  दिन

सुख के पल तो टूट  जाते स्वप्न से
दुःख का बढ़ता बोझ रहता दिन ब दिन

रहगुजर में मीत मिलते हैं कभी
लोग अनजाने गुजरते दिन ब दिन

भागती रहती ख़ुशी की खोज में
जिंदगी जीने की खातिर दिन ब दिन

मन कभी बूढा नहीं होता मगर
तन बुढ़ापा ओढ़ता है दिन ब दिन

मौत से हम दूर जितना भागते 
मौत उतनी पास आती दिन ब दिन     

 

मंगलवार, 25 सितंबर 2012

अर्थशास्त्र

देश के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री ने कहा -
पैसे पेड़ों पर नहीं लगते
कमाल का अर्थशास्त्र बताया
तो  फिर कहाँ लगते हैं, प्रधानमंत्रीजी ?

इतना ज्ञान था आपके पास
क्यों नहीं बांटा आपने
पैसे कहाँ लगते हैं
पैसे कहाँ से आते हैं
कहाँ पर जाते हैं
इन सब का ज्ञान और कौन दे सकता है , गुरुवर !

क्यों नहीं दिया आपने उदाहरण
आपके अपने ऐ राजा  का
जो पारंगत था पैसे हवा में से बनाने का
आखिर 2 जी था क्या
चंद  तरंगों का सौदा  जो हवा में बहती हैं

क्यों नहीं दिया आपने
आदरणीय कलमाड़ी जी की खेल भावना का उदाहरण
जिन्होंने हमें सिखाया की पैसे तो खेल खेल में ही बनते हैं

और अधिक पीछे क्यों जाएँ
आप अपना ही उदाहरण  दे लेते
जमीन के नीचे  फालतू पड़ा कोयला
किसके काम का था
आपने तो फालतू सामान से पैसा बनाने की विधि सिखाई देश को
और कितने मंत्री तर गए

और अब आम आदमी को भी सिखा रहें हैं
आप अर्थशास्त्र
गैस कम जलाओ और पैसा बचाओ
गैस कम जलाओगे तो खाना भी कम बनाओगे
खाने में भी पैसा बचा
कम बनाओगे तो कम खाओगे
कम खाओगे तो शरीर स्वस्थ रहेगा

और आपने क्या नहीं दिया इस देश को
एक  वालमार्ट की कमी  थी ,
सो आपने वो भी पूरी कर दी श्रीमान
बनिए का आटा , ग्वाले का दूध
कुंजड़े की ककड़ी और पड़ोस की बुढिया का पापड़
खा खा कर उकता गए थे
अब जायेंगे चकाचक शो रूम में ,
और ढूंढेंगे की आटा  कौन से माले पर है
और ककड़ी कौन से माले पर
और कड़क पैकेटों में आटा खरीद कर
हम निहाल हो जायेंगे
बनिए, ग्वाले, कुंजड़े और बुढिया से हमें क्या
हम तो अमरीकियों जैसे बन जायेंगे न ?

क्या दूर दृष्टी  है आपकी
किसान के तो मौज कर दी आपने
मनमाना पैसा पायेंगे
अगर वालमार्ट जैसा
एक नाप और एक रंग का फल उगायेंगे
मानो किसी प्लास्टिक की फैक्ट्री में बने हो 
काले दाग  वाले केले ,
पिलपिले हो रहे आम
और रस से फटे जा रहे सीताफल की जगह नहीं होगी
फाइव स्टार शो रूम में 
ऐसे फल देखने में कितने बदसूरत लगते  हैं न !

मान्यवर !
आपने एक और सुधार किया पुरानी  एक भूल का
जो हमारे भूत पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने की थी
कितना गलत नारा दिया था उन्होंने
- जय किसान
किसान किस काम का इस देश में
क्या पेड़ों पर पैसे लगते हैं ?

महामहिम !
आपका अर्थशास्त्र महान है
भूखे नंगों के लिए होगा अनर्थ शास्त्र
जेब में पैसे हों तो फिर अर्थ ही अर्थ है !


शनिवार, 15 सितंबर 2012

रोटी और लंगोटी

जनता ने कहा -
इतनी महंगाई है , कहाँ जाएँ
सरकार  ने कहा
भाड़  में जाओ
जनता ने कहा -
भीड़ में तो हैं , अब भाड़  में कैसे जाएँ

जनता ने कहा -
दो  रोटी भी नहीं मिलती
सर्कार ने कहा -
तो एक  खाओ
जनता ने कहा -
गेहूं चावल सब्जी सब महंगे हैं
सर्कार ने कहा -
बिस्कुट और केक खाओ

जनता ने कहा -
चूल्हा कैसे जलाएं
कोयला नहीं है
सर्कार ने कहा -
कोयला  तुम्हारे लिए नहीं है
तुम गैस जलाओ
जनता ने कहा -
गैस की भी तो सीमा  आपने तय कर दी 
सर्कार ने कहा -
एक दिन छोड़ कर जलाओ

जनता ने कहा -
आपने मल्टी ब्रांड रिटेल में
51 प्रतिशत विदेशी  निवेश  पारित कर दिया
सर्कार ने कहा -
अपनी हैसियत में रहो
रोटी और लंगोटी की बात करो
ये सब देश की जरूरी बातें हैं
तुम नहीं समझोगे

जनता ने गुस्से में  कहा -
अगला चुनाव कब है ?
सर्कार ने प्यार से  कहा -
ऐसी बातें क्यों करते हो बेटा ,
हम है न ?

















सोमवार, 10 सितंबर 2012

ईश्वर


अनादि तुम , निरांत तुम
प्रचंड तुम , प्रशांत तुम  

सूक्ष्म तुम , विराट तुम
हो श्रृष्टि के सम्राट तुम

इस श्रृष्टि का निर्माण तुम
इस श्रृष्टि का संहार तुम

अनंत तुम , अजन्म तुम
हो अजर अमर अभय तुम

व्यापक हो , निराकार तुम
सम्पूर्ण निर्विकार तुम

न्यायी हो दयालु हो तुम
अनुपम हो कृपालु हो तुम

हो सत्य तुम, हो नित्य तुम
आनंद तुम , पवित्र तुम

भगवान हो सर्वेश तुम
आधार सब के ईश तुम

अंतर में विद्यमान तुम
 हो सर्वशक्तिमान तुम    

शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

कोयला

बचपन में देखा था
कोयला काला होता है
जिससे  घर की अंगीठी सुलगती है
जिस पर माँ  फुल्के बनाती  है

जब बड़ा हुआ तो देखा
कोयला कारखानों में भी लगता है
बड़ी बड़ी भट्टियों में इसे जलाते हैं
लोहे को गरम करने के लिए
इस कोयले से भी चूल्हा जलता है
उन मजदूरों के घर का
जो खुद को जलाते  हैं कोयले के साथ

लेकिन अब जो देखा
वो सब विचित्र है
ये कोयला अधिक काला  नहीं
इससे अधिक काली है करतूतें
इस देश के कर्णधारों की
कोयला सिर्फ चूल्हा ही नहीं जलाता
कोयला सिर्फ भट्टियाँ ही नहीं सुलगाता
कोयला सुलगाता है संसद को भी
संसद बन गया है मंडी  कोयले की
जिसमे बैठे हैं दलाल
जो बेचते हैं कोयला - चहेतों को

एक समझदार नेता कहता है 
कोयला धरती माँ के अन्दर है तो फिर नुक्सान कहाँ
लेकिन जब कोयले की जगह धरती माँ  को ही बेच दिया
तो क्या ये नफा हो गया
प्रधानमंत्री कहते हैं
वक्तव्य से मेरी चुप्पी ही भली
इसका अर्थ हुआ 
मेरे कर्म से मेरी अकर्मण्यता ही भली

अब कोयला चूल्हे का प्रतीक  नहीं
न ही प्रतीक है रोटी का                              
और न ही उद्योग का, प्रगति का
अब कोयला बन गया है कालिख
जो रोज पुत  रही है किसी न किसी नेता के चेहरे पर