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सोमवार, 25 जुलाई 2011

आम जीवन की उपमाएं

सूरज थके हुए चेहरे सा डूबने लगा
दिन भर की रुपैयों सी चमक ख़त्म हुई
मेहनत के बाद का सा सुर्ख रंग हो गया
क्षितिज तक पहुँचने में पाँव हुए बोझिल
जैसे कह रहा हो - कोई अब घर पहुंचा दे !

रात प्रेमिका के केश सी फ़ैल गयी
चाँद माथे की बिंदी सा चमक उठा
तारे आँचल में टंके जगमगाने लगे
हवा नगमा बन गुनगुनाने लगी
रात रानी ने इत्र की शीशी खोल दी

सागर व्यस्त है किसी बंधुआ मजदूर सा
दिन हो या रात काम करता है
माथे का पसीना पोंछ कर लहरों को
फेंक देता है रेतीले किनारों पर
अपने नमक को खा कर ही खुश है

भोर दरवाजे पर खड़ी है, खामोश सी
सोचती है दस्तक दे या नहीं
शोर से रात जाग जायेगी
पर सूरज कहाँ रुकने वाला है
हाथ पकड़ कर बुला लिया भोर को

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