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शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

कोयला

बचपन में देखा था
कोयला काला होता है
जिससे  घर की अंगीठी सुलगती है
जिस पर माँ  फुल्के बनाती  है

जब बड़ा हुआ तो देखा
कोयला कारखानों में भी लगता है
बड़ी बड़ी भट्टियों में इसे जलाते हैं
लोहे को गरम करने के लिए
इस कोयले से भी चूल्हा जलता है
उन मजदूरों के घर का
जो खुद को जलाते  हैं कोयले के साथ

लेकिन अब जो देखा
वो सब विचित्र है
ये कोयला अधिक काला  नहीं
इससे अधिक काली है करतूतें
इस देश के कर्णधारों की
कोयला सिर्फ चूल्हा ही नहीं जलाता
कोयला सिर्फ भट्टियाँ ही नहीं सुलगाता
कोयला सुलगाता है संसद को भी
संसद बन गया है मंडी  कोयले की
जिसमे बैठे हैं दलाल
जो बेचते हैं कोयला - चहेतों को

एक समझदार नेता कहता है 
कोयला धरती माँ के अन्दर है तो फिर नुक्सान कहाँ
लेकिन जब कोयले की जगह धरती माँ  को ही बेच दिया
तो क्या ये नफा हो गया
प्रधानमंत्री कहते हैं
वक्तव्य से मेरी चुप्पी ही भली
इसका अर्थ हुआ 
मेरे कर्म से मेरी अकर्मण्यता ही भली

अब कोयला चूल्हे का प्रतीक  नहीं
न ही प्रतीक है रोटी का                              
और न ही उद्योग का, प्रगति का
अब कोयला बन गया है कालिख
जो रोज पुत  रही है किसी न किसी नेता के चेहरे पर


                                                                                                                     
                                                                            



 

1 टिप्पणी:

  1. कोयले के कितने रूप देख लिए हैं अब ...
    अच्छी व्यंगात्मक रचना ...

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