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बुधवार, 15 सितंबर 2010

वैधव्य

कोई चला गया है

सब कुछ बदल गया है ,

अनहोनी हो रही है

वो छड़ी रो रही है ,

आराम कुर्सी थक गयी

आराम करते करते ,

दरवाजा थक गया

इन्तेजार करते करते ,

चश्मा धुंधल गया

आँखों से लड़ते लड़ते ,

पन्ना पलट गया

उन अँगुलियों को पढ़ते ,

गर्मी से परेशान है

ठन्डे पानी का घड़ा ,

थक गया है खम्भा

वर्षों से यूँ खड़ा ,

फिसल रही है काई

अपनी ही फिसलन में ,

खुजला रही दीवारें

खुद अपनी उतरन में ,

चौंधिया गया दिया

अपनी ही लपट से,

सहमा हुआ अँधेरा

खुद अपने कपट से ,

दबा पड़ा दूध

मोटी मलाई से ,

निशान दिख रहे

सूनी कलाई पे ,

क्या आज हो गया है

क्या राज हो गया है ,

श्रृंगार खो रहा है

वैधव्य रो रहा है .

11 टिप्‍पणियां:

  1. marmik rachna.........kavitayen, kaise sab kuchh byan kar deti hai, ye padh kar pata chal raha hai.....!!

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  2. प्रतीको और बिम्बो से सजी बेहद ही मार्मिक और संवेदनशील रचना।

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  3. प्रिय महेंद्र!
    नहीं समझ पा रहा हूँ की क्या प्रतिक्रिया लिखूं.
    काफी उदासी से भरी हुई कविता है पर सच्चाई भी है.

    शशि

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  4. आप की रचना 17 सितम्बर, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपनी टिप्पणियाँ और सुझाव देकर हमें अनुगृहीत करें.
    http://charchamanch.blogspot.com


    आभार

    अनामिका

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  5. एक बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना ! संवेदनाओं से भरपूर यथार्परक एवं सशक्त अभिव्यक्ति ! साधुवाद !
    http://sudhinama.blogspot.com
    http://sadhanavaid.blogspot.com

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  6. महेंद्र जी बहुत ही सुन्दर रचना , मैंने पहले भी कहा है की आप में लोगो को हंसाने और रुलाने की क्षमता है कभी आपकी रचनाये गुदगुदाती हैं तो कभी उदास कर जाती है महेंद्र जी हँसना भी आसन नहीं है लब जख्मी हो जाते हैं और रोना भी आसन नहीं तालाब नदी हो जाते हैं बहुत दिनों बाद आज आपके ब्लॉग पर आना हुआ अच्छा लगा -ममता

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