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गुरुवार, 2 जून 2011

मैं लिखता रहता हूँ !

मैं लिखता रहता हूँ !


कोई पढ़े ना पढ़े

मैं मन के भावों को

चाहे दिखे ना दिखे

मैं अपने घावों को

अपनी कलम से खुरच खुरच कर

रिसता रहता हूँ !

मैं लिखता रहता हूँ !



कोई समझे मेरी

बात भले बेमानी

कोई भी कीमत

उनको नहीं चुकानी

मैं अपने हाथों से अपने को ही

बिकता रहता हूँ !

मैं लिखता रहता हूँ !



अपनी मुसीबतों से

लड़ता जाऊँगा

अपने लिखे को मैं

पढता जाऊँगा

मैं तेज हवाओं के अंधड़ में

टिकता रहता हूँ !

मैं लिखता रहता हूँ !

1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही सुन्दर कविता , आज बहुत दिनों बाद आपके ब्लॉग तक आई और इक सुन्दर मन को छू लेने वाली कविता पायी | हम जिन्दगी भर अपने हर दर्द का हिसाब कागजों पर लिखते रहते हैं | इसी तरह जिन्दगी अपना हिसाब हमारे चेहरे पर लिखती रहती है | जैसे जैसे हम जीते चले जाते हैं जिन्दगी हर पल इक दर्द की छाप छोड़ती जाती है | हम कागज पर लिखते है वो हमारे चेहरे पर |

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