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शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

एक थप्पड़

थप्पड़
जिसका कोई विशेष अस्तित्व नहीं होता
जब तक
उसके मारने वाले का
या उस गाल का
कोई विशेष अस्तित्व नहीं हो
जिस पर वो पड़ा था

रोज थप्पड़ खाते हैं
गरीब रिक्शेवाले
बेरोजगार युवक
असहाय आरोपी
पुलिस थाने में
वर्दी वाले पुलिसिया हाथों से
चुपचाप आंसू पोंछ कर
लग जाते हैं फिर से अपने काम में
क्योंकि थप्पड़ मारना पुलिस का स्वभाव  है
और उन गरीबों की नियति
मीडिया भी तब तक
न कुछ देखती
न कुछ दिखाती
जब तक पिटाई से थाने में
किसी गरीब की मौत न हो जाए   

लेकिन ये थप्पड़ कुछ अलग था
ये थप्पड़ था एक आम आदमी का
जो गुस्से में भरा हुआ था
गुस्सा गरीबी का
गुस्सा महंगाई का
गुस्सा सरकारी भ्रष्टाचार का
गुस्सा उसकी अपनी मामूली अपेक्षा का
गुस्सा उसकी  उपेक्षा का
और वो गाल था - एक अति खास आदमी का
एक राजनैतिक नेता का
देश के चुने हुए एक नायक का
सरकार को चलाने वाली मशीन का

और ये एक थप्पड़ बन गया
एक मुद्दा राष्ट्रीय बहस का
मीडिया को मिल गया -
एक और दिन का मसाला
राजनैतिक दलों को मिल गया बहाना -
संसद में चल रहे महत्वपूर्ण मुद्दों से ध्यान हटाने का
गाल वाले नेताजी के दल को मिल गया -
एक कारण सड़कों पर तोड़ फोड़ का

कोई नहीं पूछेगा कि
इस थप्पड़ के बदले कितने थप्पड़ मिले
हरविंदर सिंह को
अगली खबर बनेगी अगर
हरविंदर सिंह मरे तो -
वर्ना ये किस्सा ख़त्म !
कल से कोई नयी घटना ढूंढें !

4 टिप्‍पणियां:

  1. थप्पड़ किस गाल पर - इसकी अहमियत है . वरना आए दिन थप्पड़ लगते हैं

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  2. रोज थप्पड़ खाते हैं
    गरीब रिक्शेवाले
    बेरोजगार युवक
    असहाय आरोपी
    पुलिस थाने में
    वर्दी वाले पुलिसिया हाथों से
    चुपचाप आंसू पोंछ कर
    लग जाते हैं फिर से अपने काम में
    क्योंकि थप्पड़ मारना पुलिस का स्वभाव है
    और उन गरीबों की नियति


    बहुत सुन्दर रचना..बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  3. रोज थप्पड़ खाते हैं
    गरीब रिक्शेवाले
    बेरोजगार युवक
    असहाय आरोपी
    पुलिस थाने में
    वर्दी वाले पुलिसिया हाथों से
    चुपचाप आंसू पोंछ कर
    लग जाते हैं फिर से अपने काम में

    एक कटु सत्य

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