इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

सोमवार, 20 अक्तूबर 2014

सब के कद नप गए


चुनाव की भट्टी में सारे दल तप  गए
बड़ों के छोटों के सब के कद  नप  गए

बड़ी बड़ी हांकते थे जनता के आगे
जनता की आंधी में सारे ही खप  गए

जिनको परहेज था मोदी की बातों से
दोस्ती की चाहत में खड़े खड़े थक गए

जहर जो उगलते थे , आज फ़िक्र  करते हैं
बेवजह ही इतना तब किस लिए यूँ बक गए

रस्सियाँ तो जल गयी , बट  लेकिन बाकी है
बट सीधे होंगे कब , बंट बंट के बंट गए।





1 टिप्पणी: