इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

शुक्रवार, 24 मई 2013

कोई और बात

कभी मन में आता है
आज कुछ लिखूं
लिखने बैठता हूँ
तो मस्तिष्क खाली सा हो जाता है
घंटों बैठा रहता हूँ
इस निर्जीव से की-बोर्ड पर
जो लिखना चाहता हूँ
वो सच्चाई लिखने की हिम्मत नहीं
बाकी कुछ भी लिखा तो
बेमानी होगा
घटनाओं  को याद करना
जैसे कि  उन पलों को फिर से जीना
हिम्मत नहीं होती
झेल जाना नियति होती है
लेकिन जान बूझ कर दुबारा झेलना दुस्साहस
कितनी खौफनाक होती है सच्चाई
शायद  इसी लिए हर आदमी
डरता है मौत की बात करने से
ये जानते हुए भी कि
मृत्यु तो निश्चित है
नहीं है लिखने को कुछ
फिर लिखेंगे
किसी और दिन
कोई और बात


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें