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बुधवार, 29 मई 2013

क्यों बोलते हैं लोग ?

क्यों बोलते हैं  लोग ?
लोगों को अपनी मष्तिष्क तुला पर क्यों तौलते हैं लोग ?
क्यों बोलते हैं लोग ?

देश में एक बलात्कार हुआ
एक बहन के प्राण गए
पूरे देश में चीत्कार हुआ

मुद्दा बना - महिलाओं की सुरक्षा
पुलिस की लापरवाही
सर्कार की अकर्मण्यता
और जनता का रूखापन

ऐसे में देश का हर छोटा बड़ा आदमी
कुछ न कुछ बोलने लगा
बेवजह अपना मुंह खोलने लगा
छोटे आदमी की तो कौन सुनता है
मिडिया - लेकिन हर बड़े आदमी को चुनता है
स्टूडियो में खिंचाई के लिए
अपने कहे की सफाई के लिए
गलत व्याख्या हुई - इस दुहाई के लिए
बिना आंसुओं वाली रुलाई के लिए

कौन जानता था महामहिम प्रणव मुखर्जी  के सपूत को
ख्वामख्वाह दिए गए सन्देश के दूत को
कह दिया महिलाएं प्रदर्शन कम
और 'प्रदर्शन' अधिक कर रही है
बस इतना कहना था की
आ गए जूनियर मुखर्जी साहब प्रकाश में
टी वी के अंतहीन आकाश  में
माफ़ी मांगे तो मरे , न मांगे तो मरे
बेचारे राष्ट्रपति जी इसमें करे तो क्या करे


राजनीति और क्रिकेट

राजनीति और क्रिकेट
दोनों में कितनी समानताएं हैं
दोनों ही खेल हैं
जो खिलाडी खेलते हैं
और जनता देखती है

दोनों में ही भ्रष्टाचार है
भाई भतीजावाद ही नहीं
जमाइवाद भी है

दोनों में ही
भीड़ जुटना  लोकप्रियता का माप है
दोनों का ही आँखों देखा हाल -
साल भर प्रसारित होता है

दोनों में ही सिनिअर और जूनियर होते हैं
दोनों में ही विरोधी पक्ष अपील करता रहता है
दोनों ही देश के लिए समर्पित होते हैं
लेकिन मौका मिलते ही  देश को लूटते हैं
दोनों में ही चुनाव में घोटाला  है
दोनों में ही विदेशियों का बोलबाला है

दोनों में ही कई खिलाडी अन्दर हैं
दोनों में ही अध्यक्ष इस्तीफ़ा देने में विश्वास  नहीं करते
और दोनों के ही मुखिया
मिडिया के सामने मुह नहीं खोलते हैं

पता नहीं कि क्रिकेट में राजनीति है
या फिर राजनीति में क्रिकेट है

शुक्रवार, 24 मई 2013

कोई और बात

कभी मन में आता है
आज कुछ लिखूं
लिखने बैठता हूँ
तो मस्तिष्क खाली सा हो जाता है
घंटों बैठा रहता हूँ
इस निर्जीव से की-बोर्ड पर
जो लिखना चाहता हूँ
वो सच्चाई लिखने की हिम्मत नहीं
बाकी कुछ भी लिखा तो
बेमानी होगा
घटनाओं  को याद करना
जैसे कि  उन पलों को फिर से जीना
हिम्मत नहीं होती
झेल जाना नियति होती है
लेकिन जान बूझ कर दुबारा झेलना दुस्साहस
कितनी खौफनाक होती है सच्चाई
शायद  इसी लिए हर आदमी
डरता है मौत की बात करने से
ये जानते हुए भी कि
मृत्यु तो निश्चित है
नहीं है लिखने को कुछ
फिर लिखेंगे
किसी और दिन
कोई और बात