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मंगलवार, 27 मार्च 2012

भीगी चादर और बहता समुद्र


भीगी चादर और बहता समुद्र 
( ये अनुवाद है अंग्रेजी के सुप्रसिद्ध कवी ऐ. कनिंघम की एक लोकप्रिय अंग्रेजी कविता का , उन्ही की छंदबद्धता के साथ )

एक भीगी चादर और एक सागर 
और तेजी से भागती हवा 
जो भर देती है सरसराते पालों को 
और  मस्तूल को देती है झुका 
झुका देती है मस्तूल को , मेरे बच्चों 
जब उडती है एक चील की तरह भरपूर  
और ले जाती  है माल का जहाज , उड़ता सा 
प्यारे इंग्लॅण्ड की शरण से दूर 

' नर्म और सुहानी हवा'
- मैंने सुनी एक की आवाज 
मुझे दे दो खर्राटे लेती पवन 
और दूधिया लहरों की उछाल 
दूधिया लहरों की उछाल , मेरे बच्चों
माल वाहक जहाज है कसा पर मुक्त 
ये जल की दुनिया है हमारा घर 
और हम सब खुशियों से युक्त 

तूफ़ान सा उठा है , दूर सींग सी आकृति वाले चाँद पर 
और  दूर बादलों में बिजली उठी
पर ध्यान से सुनो ये संगीत , नाविकों 
हवा की फूंक से बंशी बजी 
हवा की फूंक से बंशी बजी , प्यारे बच्चों 
बिजली चमक कर यूँ मुक्त हो गयी 
थोथे ओक से बना अपना महल 
धरोहर में सागर की लहरें मिली 

A. Cunningham

"A wet sheet and a flowing sea"


WET sheet and a flowing sea,

  A wind that follows fast

And fills the white and rustling sail

  And bends the gallant mast;

And bends the gallant mast, my boys,
  While like the eagle free

Away the good ship flies, and leaves

  Old England on the lee.

  
"O for a soft and gentle wind!"

  I heard a fair one cry:
But give to me the snoring breeze

  And white waves heaving high;

And white waves heaving high, my lads,

  The good ship tight and free—

The world of waters is our home,
  And merry men are we.

  
There's tempest in yon hornèd moon,

  And lightning in yon cloud:

But hark the music, mariners!

  The wind is piping loud;
The wind is piping loud, my boys,

  The lightning flashes free—

While the hollow oak our palace is,

  Our heritage the sea.

बुधवार, 21 मार्च 2012

आदमी और जानवर

पाप पुण्य क्या है
मन की भावना है
क्या गलत या सही है
मान लिया बस वही है
ईश्वर ने बनाये हैं
धरती पर प्राणी सब
बोलते अलग अलग
अपनी ही वाणी सब
धर्म ग्रन्थ में लिखे
जीवन के नुस्खे
वो भी कहाँ एक हैं
धर्म भी अनेक हैं
सब विपरीत बात है
अपनी अपनी जात है
अपना विश्वास है
बाकी बकवास है
धर्म जब बदल जाता
सब कुछ बदल जाता
कल तक जो पाप था
करने में श्राप था
आज पुण्य बन गया
धर्म  शून्य बन गया
विश्व सारा बँट गया
टुकड़ों में कट गया
धर्म है ! अधर्म है !
कर्म या दुष्कर्म है !
कोई कुछ न जानता
फिर भी कुछ है मानता
इस लिए विरोध  है
जन जन में क्रोध है
कहीं कोई भक्त है
कहीं बहे रक्त है
झुण्ड झुण्ड लड़ रहे
मुंड मुंड पड़ रहे

जंगल के जानवर
हमसे तो ठीक हैं
धर्म ग्रन्थ पढ़ कर के
पीटते न लीक है
पेट भरना धर्म है
प्राण रक्षा धर्म है
बाकी जो हो रहा
सब स्वतन्त्र कर्म है


बुधवार, 7 मार्च 2012

दस का नोट

हम अलग अलग जगह
होते हैं अलग अलग व्यक्ति
इस बात का पता चलता है
एक दस के नोट से
फाइव स्टार होटल में
वेटर को टिप देने के लिए
दस क्या सौ  का नोट भी छोटा पड़ता है
लेकिन उडुपी के तम्बी  के लिए
दस का नोट  ज्यादा है
ढोंगी साधुओं को कम से कम पांच  सौ एक
लेकिन भूखे भिखारी के लिए सिक्का ढूंढते हैं
दस का नोट तो सोच के भी बाहर होता है
ऑटो वाला ग्यारह रुपैये मांगता है
तो देते हैं दस का नोट
कहते हैं एक छुट्टा नहीं है
और मिलजाती है रियायत
लेकिन ऐ सी वाली  मेरु टैक्सी के ९० रुपैये के बिल के सामने
देते हैं सौ रुपैये और कहते हैं कीप द चेंज
होटल का गेटकीपर ले लेता है
सलाम ठुकाई के १०  रुपैये
लेकिन गाडी का शीशा साफ़ करने वाले -
बेरोजगार से कहते हैं - माफ़ करो, छुट्टा नहीं है
पुराने अख़बार बेचते समय  रद्दी वाले से
लड़ते हैं वजन के लिए
दस रुपैये ज्यादा कमाने के लिए
दौ सौ रुपैये की फ़िल्मी किताब चट से खरीद लेते हैं
भले ही वो दस दिन बाद दस रुपैये में बिके
हम निरंतर बचाने की सोचते हैं दस का नोट
रेलवे प्लेटफोर्म पर , सब्जी भाजी की दुकान  पर
लेकिन सिनेमा हाल में लाइन लगाकर खरीदते हैं
पांच सौ की भी टिकटें
मित्रों दस का नोट वही होता है
उसकी कीमत भी वही होती है
लेकिन हमारी कीमत बदलती रहती है
जगह , समय और स्टेटस के आधार पर    


सोमवार, 5 मार्च 2012

समता - स्मृति


लोग बहुत आते हैं
लोग बहुत जाते हैं
लेकिन कुछ लोग यहाँ 
जाकर रह जाते हैं
 
आना भी जीवन है 
जाना भी जीवन है
कैसे जियें , जिसने  
जाना वो जीवन है
  
घर  की वो गरिमा थी
जीवन की महिमा थी
मंदिर की भक्ति थी
जीने की शक्ति थी
 
शाश्वत हंसी उनकी 
जिसमें  ख़ुशी सबकी
छोटे बड़े सारे
लगते उन्हें प्यारे 
 
कितना संघर्ष था 
फिर भी क्या हर्ष था
भारत क्या अमरीका
सबने उनसे सीखा 
 
जीवन की मुश्किलें 
हंस हंस के झेल लें  
दूसरों के दुःख फिर भी
मन में समेट लें  
 
मूरत थी ममता की
सूरत थी समता की
प्रेम की नदी थी वो
प्रेरणा थी क्षमता की
 
आज वो नहीं यहाँ
क्यों कर गयी कहाँ 
सब के दिलों में वो
फिर भी बसी यहाँ
 
स्मृति में आज भी
करती हैं राज भी
शाश्वत रहेंगी वो
उनकी अब  याद भी