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गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

इरादे

 दुखों के जंगल में
सुख की पगडण्डी है
चौराहा उलझन का
निर्णय की मंजिल है

कुछ अनजाने डर से
रातें अन्धियायी है 
चिंताओं की रेखा
माथे पर छाई है

फिर भी राहें दिखती
बिजली की तड़पन से
डर भी मिट मिट जाता
पत्तों की खडकन से

राहों में शूल बिछे
अनबूझी मुश्किल  के
शूलों में फूल खिले
खुशियों के दो पल के

पग में कांटे चुभते
जीवन के वादों के
पावों  में जूते हैं
मजबूत इरादों के
 

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर प्रेरणा दायी कविता है भाई, बहुत ही खूबसूरत शब्दों में समेटा है आपने सुख दुःख को वो किसी ने कहा है ना दो पल के जीवन से इक उम्र चुरानी है जिन्दगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है

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  2. बहुत धन्यवाद सत्याजी आपकी प्रतिक्रिया का !

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  3. जिंदगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है - बहुत सच कहा . कुछ मेरी सुनो कुछ अपनी कहो , ऐसे ही रास्ता कट जाएगा . बहुत शुक्रिया मनवा !

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