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शनिवार, 22 जनवरी 2011

मैं क्या मेरा अस्तित्व है क्या

खुद को तकता आईने में

और खुश होता मन ही मन में

मैं तो मैं हूँ

मैं ही मैं हूँ

मैं मैं में उलझा रहता मैं

बस मैं की सुनता रहता मैं

लेकिन जब मैं बाहर निकला

मैं से मैं भी बाहर निकला

दुनिया देखी जब घूम घूम

पाई बस उसकी धूम धूम

अब लगता हैं मैं तो क्या हूँ

खुद को छोटा सा लगता हूँ

मैं क्या मेरा अस्तित्व है क्या

मेरा अपना महत्व ही क्या

ईश्वर की इस उंचाई पर

नीचे तक की गहराई पर

खुद को खो कर उसको पाया

मन शुद्ध हुआ जब रो पाया

3 टिप्‍पणियां:

  1. ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है

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  2. संजय भाई ! आप जैसे अच्छे पाठक जब इतना बढ़ावा देते हैं , तभी कुछ लिखते रहने की इच्छा भी रहती है . मैं हमेशा मन में उठी कोई न कोई भावना को ही शब्द देता हूँ . आपका आभारी हूँ !

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  3. itanaa achchha tabhi likhaa jata hai jab itanaa achchha padhaa jata hai ha ha ha

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