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सोमवार, 13 दिसंबर 2010

अलसाई सी धूप

आँगन में उतरी, पसरी है - अलसाई सी धूप 
जाड़े की सुबह में थोड़ी ठिठुराई  सी धूप

गर्मी में आती मुडेर पर गुस्से में हो लाल
दोपहरी में ज्वाला बनती , गुस्साई सी धूप 

वर्षा में बादल बच्चों सी अठखेली करते हैं 
लुका छिपी करती उनसे ,मुस्काई सी धूप 

वर्षा की बूंदों से मिल कर , श्रृंगारित होती है 
इन्द्रधनुष की वेणी पहने , शरमाई सी धूप 

पतझड़ के पेड़ों से कहती - ये क्या हाल बनाया 
सूखे पत्तों को झड्काती , पुरवाई सी धूप 

दिन का मौसम कैसा भी हो, शाम मगर वैसी ही 
जैसे सूरज ढलता जाता , कुम्हलाई सी धूप

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