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बुधवार, 3 नवंबर 2010

रोशनी का दिन

आ जिंदगी , चल बैठ कहीं गुफ्तगू करें

दिल को सुकून मिल सके ये जुस्तजू करें


मुश्किलों से भाग कर हम जायेंगे कहाँ

आ मुश्किलों का सामना हो रूबरू करें


देखें किसी को बांटते औरों के ग़म कभी

चल हम भी उनसे सीख कर वो हुबहू करें


दीपावली का दिन है , चिराग जलाएं

दिल में मुकम्मल रोशनी की आरजू करें

2 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन!



    सुख औ’ समृद्धि आपके अंगना झिलमिलाएँ,
    दीपक अमन के चारों दिशाओं में जगमगाएँ
    खुशियाँ आपके द्वार पर आकर खुशी मनाएँ..
    दीपावली पर्व की आपको ढेरों मंगलकामनाएँ!

    -समीर लाल 'समीर'

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  2. महेंद्र जी बहुत ही अच्छी कविता , दिवाली की शुभ कामनाओं के साथ ये नसीहत भी की चिराग जलाना हो तो दिलों में जलाओ महेंद्र जी जिन्दगी तो खुद ही इक दिया है इक " लो " है जिसे निरंतर जलते जाना है जैसे दिए की इक बाती इक और से जलती रहती है रोशनी देती रहती है और दूसरी और से (दूसरे छोर ) से ख़तम होते जाती है और पता ही नहीं चलता कब समाप्त हो गयी जिन्दगी भी ऐसी ही है " हे " लो" जिन्दगी , जिन्दगी नूर है मगर इसमे जलने का दस्तूर है रिवायत है की जिन्दगी गहना है ये हीरा है और चाटते रहना है -ममता
    j

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