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रविवार, 17 अक्तूबर 2010

आओ फिर एक बार चले गाँव

आओ चलें - अपने गाँव
जहाँ है बचपन की ठंडी छाँव

गाँव के उस पुराने प्राइमरी स्कूल की तरफ
जिसके नाम के भी मिट गए थे हरफ
जहाँ हर रोज सुबह हम घर से लाते थे
और अपने हाथों से बिछाते थे
एक लम्बी सी दरी
स्याही के धब्बों से भरी
उस बूढ़े पीपल के पेड़ के नीचे
दीवार पर रंगे ब्लैक बोर्ड के पीछे
और फिर शुरू हो जाती थी पाठशाला
रोज का मिर्च मसाला
मास्टरजी के हाथ में छड़ी का लहराना
और हमारा जोर जोर से चिल्लाना
दो एकम दो......दो दूनी चार .......
दो तीये छः.....दो चौके आठ ....

थोड़ी दूर और चलें
चल कर मिलें
जोहड़ से गाँव की
मचलते पाँव की
जहाँ लगाते थे छलांग
होती हवा में टाँग
पास ही बनी मुंडेर से
इंटों के बने घेर से
हमेशा यही फ़िराक
की बनना है तैराक
बिना किसी सोच के
बिना किसी कोच के

और वो नीम का घना दरख़्त
अन्दर से नर्म बाहर से सख्त
कडवाहट के बीच लगती थी
पीली हो पकती थी
मीठी निमोली
भर भर के झोली
जिसका कोई मोल नहीं था
जिसका कोई तोल नहीं था
आज नहीं मिलती किसी शहरी बाज़ार में
रुपैये, डॉलर या पौंड के व्यवहार में

और वहीँ पास में वो पुराना शिवाला
जिसके पीछे थी गौशाला
जिसकी आरती में हम बैठते थे
आँखे बंद कर भक्ति में पैठते थे
भगवान से ज्यादा पुजारी के लिए
मखानों और बताशों की रोजगारी के लिए

और शाम को वो घर को लौटना
नंगे पावँ मिटटी में लोटना
कभी भैंसों की पीठ पर
कभी ऊंटों की रीढ़ पर
कभी बछड़ों की पूँछ पकड़ कर
कभी पिल्लों को बाँहों में जकड कर
मिटटी से भरे बालों को खुजलाते
टूटी फूटी भाषा में कुछ न कुछ गाते

वो दृश्य यादों से न जाते हैं
वो दिन कितने याद आते हैं
आओ फिर एक बार चले गाँव
और ढूंढें अपना ठांव

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपने तो पूरे गांव का खाका ही खींच दिया। बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
    भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोsस्तु ते॥
    विजयादशमी के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

    काव्यशास्त्र

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  2. गांव की माटी की सोंधी ख़ुश्बू बिखेरती कविता। बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    बेटी .......प्यारी सी धुन

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  3. Dear Mahendra,

    Very refreshing one.

    Very original and imaginative, though we never lived or studied on any village but that is what we normally see all around in small children of poor people.

    Whenever I used to see small kids jump into a river or pond and swim playfully, (Because I did not know swimming) I used to wonder as to who might have taught them swimming? I could not learn swimming until 55 years because most of the time I did not get a chance and once when I opened this opportunity for my children in Coimbatore, I could not learn because the trainer was never inside the pool. This made me wonder all the more as to who taught thesechildren swimming?

    Then your description about the Temple. Just last night while retiring on my bed for night, I suddenly remembered that at the age of 8years I used to put on a Dhoti and used to beg of my mom to spare one rupee for Archana in Baikunthnath mandir (Beside Mimani House) because one could not enter the Sanctum Sanctorium without a dhoti and when you uttered your Name and Gotra to the Priest he used to give some flowers and 2 Besan laddus in a dona. Actually it was mainly those Laddus which attracted me and I used to take so much of pains for them. In your poem I could see myself in the same pose as your Village Kids. Very absorbing.

    Grrrrrrrrrrrreat!!

    Shashi

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  4. Dear Shashi,

    Thanks for such lovely comments. What I have written is what I experienced in my village in Rajasthan in the first 5 years of my life. Memories of that period are so strongly imprinted on my mind that I can visualise the entire village. I have visited the village later also, and every visit kept the memories alive.

    Except the swimming experience of my own, which is based on what I used to watch while other boys of young age used to do, rest is all my own experience.

    In todays world when we think of that life, it looks as if we are reading a fairy tail.I can write these things because I relate to them.

    Keep on reading me and writing your lovely commentary.

    Maahendra

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