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रविवार, 31 अक्तूबर 2010

एक बरस और बीत गया

एक बरस और बीत गया
जीवन का घट थोडा और रीत गया

भागता समय ऐसे . एक एक क्षण जैसे
आँखों के आगे से बन अतीत गया
एक बरस और बीत गया

कुछ खट्टी, कुछ मीठी , परतें हैं जीवन की
हार कर गया कोई , कोई जीत गया
एक बरस और बीत गया

जाने पहचाने से, अपने अनजाने से
मिल कर परायों सा कोई मीत गया
एक बरस और बीत गया

मरते हम दिन दिन है ,जीते हम गिन गिन हैं
सांसों की गिनती का एक गीत गया
एक बरस और बीत गया

बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

छंदों में मात्राओं का विज्ञान

हम कवितायेँ लिखते और पढ़ते हैं . कुछ कवितायेँ छंद बद्ध होती हैं तो कोई स्वछन्द . छंद बद्ध कवितायेँ किसी नियम में बंधी होती है, जिसकी वजह से उस कविता का पढना एक विशेष लयात्मकता में ढल जाता है ; जब कभी कविता अपने छंद का नियम तोडती हैं , तो उसे उस लय में पढ़ पाना मुश्किल होता है. यहाँ हम चर्चा करेंगे सिर्फ छंद बद्ध कविताओं की , जैसे की दोहा, चौपाई , सोरठा , ग़जल वैगरह. इसके अलावा भी बहुत से अपरिभाषित छंद हो सकते हैं, लेकिन आवश्यता होती है , उस छंद की नियम बद्धता की.
घबराइए मत , मैं कोई बहुत मुश्किल चर्चा नहीं कर रहा हूँ , बल्कि एक मुश्किल विषय को आसानी से समझ पाने का नुस्खा बता रहा हूँ . कविता, ग़जल, गीत - सब का एक मीटर होता है . और उस मीटर का नाप होता है मात्राएँ . किस छंद में कितनी मात्राएँ होती हैं, ये निश्चित होता है . उर्दू कविता में मात्राओं के इस मीटर का नाम बहर होता है कवि या शायर जाने अनजाने उन मात्राओं की गिनती को समान रखता है . आइये इस विज्ञान को समझाने का प्रयत्न करते हैं उदाहरण के द्वारा -

एक दोहा लेते हैं -

रहिमन देख बड़ेन को , लघु न दीजिये डारि !
जहाँ काम आवे सुई , कहाँ करे तलवारि !!

आइये इसकी मात्राओं की गिनती करें . गिनती के नियम हैं -

१. प्रत्येक बिना मात्रा का अक्षर = १ मात्रा ; जैसे - र


२. प्रत्येक आ की मात्रा वाला अक्षर = २ मात्रा ; जैसे का


३. प्रत्येक छोटी इ की मात्रा वाला अक्षर = १ मात्रा ; जैसे रि


४. प्रत्येक बड़ी ई की मात्रा वाला अक्षर = २ मात्र ; जैसे दी


५. प्रत्येक छोटे उ की मात्रा वाला अक्षर = १ मात्रा ; जैसे सु


६. प्रत्येक बड़े ऊ की मात्रा वाला अक्षर = २ मात्रा ; जैसे पू


७. प्रत्येक ए की मात्रा वाला अक्षर = १ या २ मात्रा@ ; जैसे डे


८. प्रत्येक ऐ की मात्रा वाला अक्षर = २ मात्रा ; जैसे जै


९. प्रत्येक ओ की मात्रा वाला अक्षर = २ मात्रा ; जैसे को


१०. प्रत्येक औ की मात्रा वाला अक्षर = २ मात्रा ; जैसे लौ


११. प्रत्येक बिंदी वाला अक्षर = २ मात्रा ; जैसे जं


१२. प्रत्येक विसर्ग वाला अक्षर = २ मात्रा ; जैसे क:


१३. प्रत्येक डेढ़ अक्षरों का योग = २ मात्रा ; जैसे ल्ल

[@ विशेष : साधारणतया इन मात्राओं की गिनती ऊपर दिए नियमों के अनुसार होती है, लेकिन अपवाद भी होते हैं. वास्तव में मात्राओं का सम्बन्ध प्रत्येक अक्षर के उच्चारण से सम्बन्ध रखता है. इसलिए बड़ी मात्राओं (दीर्घ मात्राएँ ) को २ मात्रा मानते हैं और छोटी मात्राओं ( लघु मात्राएँ ) को १ मात्रा मानते हैं . लेकिन कई बार बड़ी मात्राओं को पढने में जल्दी पढ़ा जाता है ताकि कविता की लय बनी रहे; उसी तरह कभी कभी छोटी मात्राओं पर भी जरा रुक के पढना पड़ता है खास कर ऐ की मात्र में ये अक्सर होता है ; ऐसी स्थिति में मात्राओं के योग में ऊपर लिखे नियमों से भिन्नता आने की सम्भावना है .समझाने के लिए जहाँ भी छोटी ऐ की मात्र २ गिनी जायेगी उसे हम रेखांकित कर देंगे .ऊपर लिखे नियमों को हम आधार मान सकते हैं . ]


आइये इन नियमो के आधार पर जरा गिन कर देखें की ऊपर लिखे रहीम के दोहे में कितनी मात्राएँ हैं . दोहे में चार पद है . पहले और तीसरे पद में एक अर्ध विराम यानि कोमा है ; दुसरे और अंतिम पद के बाद पूर्ण विराम है . हम मात्रा गिनेंगे पद के अनुसार . दोहे को अक्षर के अनुसार जरा बाँट देते हैं , इस प्रकार -

र हि म न दे ख ब ड़े न को , ल घु न दी जि ये डा रि !


ज हाँ का म आ वे सु ई , क हाँ क रे त ल वा रि !!

अब हर अक्षर की मात्रा तय करते हैं और उस अक्षर के ऊपर लिख देते हैं , ऊपर लिखे नियमों के अनुसार -


१   १ १ १   १ १    १ २ १ २ ( कुल योग =१३ मात्रा )


र हि म न दे ख ब ड़े न को ,


१ १ १     २ १    २   २    १       ( कुल योग =११ मात्रा)


ल घु न दी जि ये डा रि !


१   २   २    १   २   २   १   २       ( कुल योग =१३ मात्रा )


ज हाँ का म आ वे सु ई ,


१    २ १ २ १    १ २   १           ( कुल योग =११ मात्रा )


क हाँ क रे त ल वा रि !!

इस उदाहरण से ये बात समझ में आ गयी कि किसी भी दोहे छंद में पहले और तीसरे पद में मात्राओं का योग १३ होगा और दुसरे और चौथे पद की मात्राओं का योग ११ होगा . दूसरी बात ये की दूसरे और चौथे पदों में तुकबंदी होती होती है जैसे की यहाँ डारि और वारि . आइये एक और दोहा लेकर उस पर इस बात को जांच कर देखें . कबीर का एक प्रसिद्द दोहा -

काकड़ पाथर जोर के, मसजिद लई बनाय !
ता चढ़ मुल्ला बांग दे, क्या बहिरा हुआ खुदाय !!

आइये उसी प्रकार विच्छेद करते हैं इस दोहे का भी और गिनते हैं मात्राओं को -

२    १ १   २   १ १   २ १   २      ( कुल योग =१३ मात्रा )


का क ड़ पा थ र जो र के,


१   १   १    १ १ २   १ २   १      ( कुल योग =११ मात्रा )


म स जि द ल ई ब ना य !


२    १ १   १   २     २    २ २        ( कुल योग =१३ मात्रा )


ता च ढ़ मु ल्ला बां ग दे ,


  २    १ १    २ १ २     १ २   १   ( कुल योग =११ मात्रा )


क्या ब हि रा हु आ खु दा य !!

इस प्रकार पुष्टि हो गयी हमारी गणना की . एक उदाहरण एक चौपाई का लेकर गिनें . जैसा की नाम से पता चलता है चौपाई, इस छंद में भी चार पद होते हैं , विशेषता ये है कि इस छंद में चारों पदों की मात्राओं का योग एक समान होता है . हम सब के लिए चौपाई का अर्थ होता है तुलसीदासजी की रामचरितमानस . उदाहरण लेते हैं उनकी रचना रामचरितमानस से -

सुनत राम अभिषेक सुहावा । बाज गहागह अवध बधावा ॥
राम सीय तन सगुन जनाए । फरकहिं मंगल अंग सुहाए ॥२॥

और अब मात्राओं की गिनती -

१   १ १    २ १ १    १    २ १    १ २ २         ( कुल योग =१६ मात्रा )


सु न त रा म अ भि षे क सु हा वा ।


२   १    १ २ १   १ १    १ १ १ २    २           ( कुल योग =१६ मात्रा )


बा ज ग हा ग ह अ व ध ब धा वा ॥


२   १   २   १   १ १   १   १ १   १   २ २            ( कुल योग =१६ मात्रा )


रा म सी य त न स गु न ज ना ए ।


१   १ १    १ २   १ १    २ १   १ २ २             ( कुल योग =१६ मात्रा )


फ र क हिं मं ग ल अं ग सु हा ए ॥२॥

इस उदहारण से हम दो बातें सीखते हैं , पहली कि चौपाई में भी चार पद होते हैं और हर पद कि मात्राओं का योग हमेशा १६ होता है . दूसरी बात ये कि तुकबंदी पहले और दूसरे पदों में तथा तीसरे और चौथे पदों में होती है . आइये एक और उदहारण से इस बात को देखें -

जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा । सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा ॥
बिप्र साधु सुर पूजत राजा । करत राम हित मंगल काजा ॥१॥


और आइये अब गिने मात्राओं को -

२     १ २    १ १    १   २    १ १    २    २       ( कुल योग =१६ मात्रा )


जो मु नी स जे हि आ य सु दी न्हा ।


२    १   १   २    १   १ १ १   १   १    २    २    ( कुल योग =१६ मात्रा )


सो ते हिं का जु प्र थ म ज नु की न्हा ॥


१   २    २   १   १ १  २   १ १   २   २             ( कुल योग =१६ मात्रा )


बि प्र सा धु सु र पू ज त रा जा ।


१   १ १   २ १   १   १   २   १   १    २   २       ( कुल योग =१६ मात्रा )


क र त रा म हि त मं ग ल का जा ॥१॥

[ ऊपर दिए उदहारण में दो स्थानों पर ए की मात्रा है, लेकिन उसका उच्चारण बहुत जल्दी बोल कर होता है; शब्द हैं जेहि और तेहिं , इसलिए दोनों स्थानों पर जे और ते की एक मात्रा गिनी है. दोनों ऐसी मात्राओं को अलग रंग में रेखांकित कर के बताया है .]

इसी तरह और किसी कविता का मीटर भी हम समझ सकते हैं . एक उदाहरण लेते हैं एक छंद बद्ध कविता का . दुष्यंत कुमार की एक मशहूर रचना के पहले और आखिरी बंद -

हो चुकी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकालनी चाहिए !


मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए

और अब मात्राओं की जल्द गिनती -

२   १+२ २  २+१ १+२+१ २    १+१+१+२ २+१+१     (= २५ )
हो चुकी है पीर    पर्वत    सी पिघलनी     चाहिए


१+१ १+२+१+१ १   २+२ २+२  १+१+१+२ २+१+१   (=२५)
इस    हिमालय    से कोई गंगा निकलनी    चाहिए !


१+२ २+२   १ १+२ २   १+२ २+२ २ १+२                (=२५)
मेरे    सीने में नहीं तो तेरे   सीने में सही


२   १+२ २    २+१ २+१+१ २+१ १+१+२ २+१+१       (=२५)
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी    चाहिए

इस प्रकार हम समझ सकते हैं की कविता चाहे किसी भी छंद की हो , उसका मीटर या बहर ही उसे गेय या लयात्मक बनाता  है . एक भी मात्रा की गड़बड़ होने से उसमे एक लंगड़ापन आ जाएगा. जब आप भी कोई कविता लिखें तो आप देख लेवें की आपकी मात्राओं की गणना  में समानता है या नहीं . या फिर आपको अपनी किसी रचना को ढंग से पढने में कठिनाई आ रही हो तो एक बार मात्राओं को गिन कर देख लेवें की कहीं मात्राओं में भिन्नता तो नहीं .

ये सारी जानकारी आपको मैं कुछ उपलब्ध स्त्रोत्रों से और कुछ अभ्यास के आधार पर दे रहन हूँ . त्रुटि पायें तो कृपया टिपण्णी करें .

मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

मन की भाषा

शब्दों  की  भाषा से बढ़कर एक भाषा होती है
वह भाषा मन के भावों की परिभाषा होती है

हर शब्द नहीं बोला, समझा , समझाया जाता है
इक शब्द उतर कर आँखों में सब कुछ कह जाता है

है नहीं जरूरत मन की भाषा को तो वैया-करण की
है नहीं जरूरत शब्दकोष के साधन और शरण की

सुख की भाषा, दुःख की भाषा, भाषा क्रोधित भावों की
मौन प्रेम की अभिव्यक्ति , आंसू - आहत घावों की

यदि शब्द नहीं होते जीवन में शायद अच्छा होता
अपशब्दों की भाषा से बचता मानव बच्चा होता

शनिवार, 23 अक्तूबर 2010

परिपक्व प्यार

जीवन का प्रवाह कुछ ऐसा मोड़ लेता है
आने वाले सभी परिवर्तनों से खुद को जोड़ लेता है
मुझे ही देखो न -
मैं अपने आप को आईने में देख जुल्फें संवारता था
घंटों खुद का व्यक्तित्व निहारता था

और अब -
आइना तो वही है जुल्फें घट गयी
थोड़ी काली थोड़ी सुफेद दो रंगों में बाँट गयी
कोशिश करता हूँ कि सब काले रंग में रंग जाये
इसके पहले की सारी सुफेद रंग में रंग जाये
और वो -
सुबह उठ के मुझे प्यार से उठाने की जगह
जोर से पूछती है - सैर के लिए उठो
और मैं कोई बहाना सोचूँ उसके पहले
अगला आदेश - चलो, उठो, खड़े हो जाओ

और फिर -
ये कहने कि जगह - आज दफ्तर न जाओ तो ?
वो ये कहती है - दफ्तर नहीं जाना क्या ?
मैं जब कहता - डार्लिंग , एक प्याला चाय मिलेगी
संबोधन से खुश होकर चाय पेश करने की जगह
चाय से ज्यादा गरम हो जाती है -
बहुत हो गयी चाय , चलो नहाओ .
और लंच पर -
उनका फोन अब भी आता है
लेकिन ये पूछने की  जगह कि खाना कैसा लगा
ये बताने के लिए
कि दवा की पुडिया छोटी डिबिया में रखी है
खाने के बाद याद कर के ले लेना

और शाम को -
जब घर पहुँचता हूँ ,
वो ये नहीं कहती की चलो कहीं घूमने चलें
बल्कि ये कहती है -
बहुत थक गए होगे ,थोडा आराम कर लो ,
मैं तुम्हारे लिए चाय बना कर लाती हूँ

डिनर पर -
ये कहने की जगह की चलो एक ही थाली में खाते हैं
कहती है , तुम खाओ , मैं गरम फुल्के बनाती हूँ

और बिस्तर पर -
मैं मेरी थकान के साथ सोने की कोशिश करता हूँ
वो बिना किसी शिकायत के
मेरे बालों में अंगुलियाँ फिराती है

सोचता हूँ - क्या बदल गया ?
क्या वो प्यार नहीं रहा
क्या वो गर्मजोशी ख़त्म हो गयी
लेकिन मेरा चिंतन मुझे बताता है -
यह ही असली प्यार है
मुझे जल्दी उठा  कर सैर पर भेजना
ज्यादा चाय न पीने देना
दिनचर्या में नियमितता रखवाना
समय पर दवा याद दिलाना
मेरी थकान के सामने खुद की भूल जाना
गरम फुल्के अपने हाथों से बना कर खिलाना
नींद के लिए मुझे वो प्यार भरा स्पर्श देना
यही तो है परिपक्व प्यार
जो जीवन की सांझ में
अकेलेपन को भगाता है

वो मुझे तब से भी बहुत अधिक प्यार करती है

रविवार, 17 अक्तूबर 2010

आओ फिर एक बार चले गाँव

आओ चलें - अपने गाँव
जहाँ है बचपन की ठंडी छाँव

गाँव के उस पुराने प्राइमरी स्कूल की तरफ
जिसके नाम के भी मिट गए थे हरफ
जहाँ हर रोज सुबह हम घर से लाते थे
और अपने हाथों से बिछाते थे
एक लम्बी सी दरी
स्याही के धब्बों से भरी
उस बूढ़े पीपल के पेड़ के नीचे
दीवार पर रंगे ब्लैक बोर्ड के पीछे
और फिर शुरू हो जाती थी पाठशाला
रोज का मिर्च मसाला
मास्टरजी के हाथ में छड़ी का लहराना
और हमारा जोर जोर से चिल्लाना
दो एकम दो......दो दूनी चार .......
दो तीये छः.....दो चौके आठ ....

थोड़ी दूर और चलें
चल कर मिलें
जोहड़ से गाँव की
मचलते पाँव की
जहाँ लगाते थे छलांग
होती हवा में टाँग
पास ही बनी मुंडेर से
इंटों के बने घेर से
हमेशा यही फ़िराक
की बनना है तैराक
बिना किसी सोच के
बिना किसी कोच के

और वो नीम का घना दरख़्त
अन्दर से नर्म बाहर से सख्त
कडवाहट के बीच लगती थी
पीली हो पकती थी
मीठी निमोली
भर भर के झोली
जिसका कोई मोल नहीं था
जिसका कोई तोल नहीं था
आज नहीं मिलती किसी शहरी बाज़ार में
रुपैये, डॉलर या पौंड के व्यवहार में

और वहीँ पास में वो पुराना शिवाला
जिसके पीछे थी गौशाला
जिसकी आरती में हम बैठते थे
आँखे बंद कर भक्ति में पैठते थे
भगवान से ज्यादा पुजारी के लिए
मखानों और बताशों की रोजगारी के लिए

और शाम को वो घर को लौटना
नंगे पावँ मिटटी में लोटना
कभी भैंसों की पीठ पर
कभी ऊंटों की रीढ़ पर
कभी बछड़ों की पूँछ पकड़ कर
कभी पिल्लों को बाँहों में जकड कर
मिटटी से भरे बालों को खुजलाते
टूटी फूटी भाषा में कुछ न कुछ गाते

वो दृश्य यादों से न जाते हैं
वो दिन कितने याद आते हैं
आओ फिर एक बार चले गाँव
और ढूंढें अपना ठांव

गुरुवार, 14 अक्तूबर 2010

इंसान कुछ नहीं

भगवान की दुनिया में इंसान कुछ नहीं
इंसान की तो छोडिये , भगवान कुछ नहीं

धनवान की है शोहरत धनवान की है इज्जत
विद्वान कुछ नहीं यहाँ , गुणवान कुछ नहीं

"अतिथि देवो भव" जिस देश का चलन था
घर आज कोई आया मेहमान कुछ नहीं

पैसा मिले तो पंडित, पैसा मिले तो पूजा
पैसा नहीं हो पास तो जजमान कुछ नहीं

कन्या बहुत है सुन्दर, कन्या पढ़ी लिखी है
जो दहेज़ न मिले तो , खानदान कुछ नहीं

सोमवार, 4 अक्तूबर 2010

जीवन भी चिता है

जा रहा हर एक पल
बन रहा हर 'आज' कल
श्वास श्वास मर रहा
बूँद बूँद भर रहा
जीवन का घट है
भर कर मरघट है  
बीत रहा वक़्त है
सूख रहा रक्त है
पोर पोर ढल रहा
कतरा कतरा जल रहा
जिंदगी है कट रही
यूँ कहो सिमट रही
वक़्त हमें पढ़ रहा
रक्त चाप बढ़ रहा
धोंकनी धधक रही
अग्नि सी भभक रही
रिश्तों के झुण्ड में
जीवन के कुंड में
हविषा बन जल रहा
खुद को ही छल रहा
मरने से डरता है
हर घड़ी जो मरता है
भोला इंसान है
यूँ ही परेशान है
जिस चिता से डर रहा
सब प्रयत्न कर रहा
मृत्यु बस चिता नहीं
जीवन कविता नहीं
जीवन भी चिता है
मृत्यु भी कविता है

शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

जन्मदिन

जन्मदिन - एक ख़ुशी का दिन
परिवार के लिए एक उत्सव
मित्रों के लिए एक दावत
बुजर्गों के लिए - अवसर आशीष का
बच्चों के लिए उपहारों की प्रतीक्षा
सब के लिए एक आनंदोत्सव

लेकिन जन्मदिन - स्वयं के लिए क्या ?
अपने आज तक के जीवन पर दृष्टिपात
अपने आप के साथ बिताने का समय
जीवन की उपलब्धियों पर एक नजर
जीवन की कमियों का आत्म चिंतन
जन्मदिन - एक आत्मविश्लेषण का दिन

जन्मदिन - जीवन की तलपट का दिन
हानि लाभ , सम्पति और जिम्मेवारियों का ब्यौरा
और इस हानि लाभ के ब्योरे में क्या कुछ ?
मात्र आर्थिक आदान प्रदान नहीं

अपने जन्मदिन पर बनायें ऐसा एक दस्तावेज
जिसमे जमा खर्च हो -
न सिर्फ आर्थिक लेन देन का
बल्कि सामाजिक, पारिवारिक ,शारीरिक
इतना ही नहीं धार्मिक और आत्मिक हानि लाभ का

यदि हमने कड़ी मेहनत कर के पैसा कमाया
तो आर्थिक लाभ , शारीरिक हानि लेकिन आत्मिक लाभ

यदि हमने जुए या लोटरी में पैसा कमाया
तो आर्थिक लाभ लेकिन आत्मिक हानि

यदि हमने किसी को कष्ट देकर कमाया
आर्थिक लाभ, मानसिक और धार्मिक हानि

किसी गरीब की मदद की हो तो
आर्थिक हानि , लेकिन मानसिक, सामाजिक, आत्मिक और धार्मिक लाभ

इस लेन देन के अलावा तलपट में लिखें
जीवन की मुश्किलों से संघर्ष
हर स्थिति का सामना सहर्ष
शारीरिक ड़ेप्रीसियेसन ,
आत्मबल का अप्रिसियेसन
संतान की योग्यता में उतार चढाव
माता पिता के जीवन में संतोष या असंतोष
पत्नी का प्रेम , पत्नी के लिए आपका प्रेम
सामाजिक सक्रियता, व्यावहारिक लोकप्रियता
अपने आप में परिवर्तन ,
अब तक का अपना जीवन

हर उपलब्धि के लिए खुशियाँ मनाइए
स्वयं अपनी पीठ थपथपाइए
अपनी कमियों के लिए बनायें निर्देश
स्वयं को ही दे आदेश
आने वाले वर्षों का ब्यौरा और सुधार ले
इसी तरह अपना पूरा जीवन संवार लें