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बुधवार, 22 सितंबर 2010

बोलते शब्दों की कविता

[ एक प्रयोगात्मक कविता है . टिपण्णी स्वरुप आप भी इसी तरह की चंद पंक्तियाँ जोड़ सकते हैं. मजा आएगा . कोशिश करें. ]

चिलचिलाती धूप
खिलखिलाता बचपन
पिलपिलाता आम
झिलमिलाता आँगन

भिनभिनाती मक्खी
सनसनाती हवा
पिनपिनाती बुढिया
गुनगुनाती फिजा

सुगबुगाती भीड़
दनदनाती गोली
कुलबुलाते कीड़े
फुसफुसाती बोली

चहचहाते पाखी
लहलहाती फसल
जगमगाते दिए
बड़बडाती अकल

तमतमाता चेहरा
चमचमाता घर
लड़खड़ाते कदम
फडफडाते पर

गड़गड़ाते बादल
कडकडाती बिजली
थरथराते होंठ
चुलबुलाती तितली

डगमगाता शराबी
चुहचुहाता तन
लपलपाती जीभ
सकपकाता मन

3 टिप्‍पणियां:

  1. अद्भुत! अतिसुन्दर। बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-2, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

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  2. वाह ! ... बढ़िया शब्द संयोजन

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  3. महेंद्र जी बहुत दिनों से कुछ लिखना नहीं हो पा रहा था , आप ब्लॉग तक आये शुक्रिया ,कभी कभी जब मन बहुत से भावों से भरा हो तो उन्हें सहेजना कठिन होता है आप बड़े भाई हैं तो रिश्तों के बारें में दी गयी आपकी समझाइश सर आखों पर . लेकिन जैसे की मेरा विषय हमेशा रिश्ते ही होता है इसलिए मैं इन्ही पर लिखती हूँ मनवा -ब्लॉग भी इसी वजह से बनाया ताकि रिश्तों के रहस्य को आप सभी लोगो से बाँट सकूँ और उन्हें समझने में मदद भी मिले
    क्योकिं हम सभी रिश्तों के मकड़ जाल में खुद को पहले तो उलझाते हैं और फिर खुद ही घबरा कर दूर हो जाना चाहते है इक कविता है सुनिए "
    कुछ अनसुलझे से प्रश्न यहाँ वो रेशम जैसे उलझे है क्यों मन कहने को अपना है जब इसमे दर्द पराया है ?
    आपकी सुन्दर कविता मैंने पढ़ी बहुत ही मजेदार है आगे जोड़ती हूँ
    कपकपाती रूह , थरथराती देह , टप-टपाते आंसू, डबडबातीआखें -------------बाकी आपने सब कह ही दिया सुन्दर रचना लिखते रहिये -ममता

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