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सोमवार, 30 अगस्त 2010

मुट्ठी भर रेत

क्षण क्षण चिराग जल रहा
हर वक़्त यह तन गल रहा

हर सांस कुछ ले जा रही
हर वक़्त जीवन जल रहा

हर सुबह उगता एक दिन
हर शाम इक दिन ढल रहा

मुट्ठी में भींचा रेत को
सब कुछ मगर फिसल रहा

चेहरे पे झुर्री आ गयी
परतों में एक एक पल रहा

जो भविष्य था वो तो आज है
वो जो आज था हुआ कल रहा

हम तेज कितना भाग लें
पर काल सब निगल रहा

यूँ ही जिंदगी तो खिसक गयी
अब हाथ बैठा मल रहा

4 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी कविता लिखी है आपने .......... आभार

    कुछ लिखा है, शायद आपको पसंद आये --
    (क्या आप को पता है की आपका अगला जन्म कहा होगा ?)
    http://oshotheone.blogspot.com

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  2. बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

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  3. सोचे 'मजाल' बस मौत क्या,
    ही जिंदगी का हल रहा!

    मुट्ठी में भींचा रेत को
    सब कुछ मगर फिसल रहा

    ... शब्दों का बदिया चुनाव !

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  4. प्रिय महेंद्र!
    कविता बहुत अच्छी बनी है. जीवन की सच्चाई जस की तस दिखती है.

    एक बात कहूं! यह भी सच है की सही अभिव्यक्ति संजीदा विषयों में ही आ सकती है पर कभी-कभी कुछ हल्का भी लिखोगे तो तुम्हारा दूसरा पहलु भी सामने आएगा.

    मेरा यह मतलब नहीं की तुम अपने वर्तमान विषय से हट जाओ, पर मैं सोचता हूँ की कुछ व्यंग लिखने का प्रयास करोगे तो खूबसूरती और बढ़ेगी.

    शशि मिमानी

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