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रविवार, 22 अगस्त 2010

कमबख्त जिंदगी

हमको कभी हंसाती है कमबख्त जिंदगी
अक्सर मगर रुलाती है कमबख्त जिंदगी


जो चाहते जीना जिंदगी शाम ढले तक
पहले उन्हें भगाती है कमबख्त जिंदगी


जो मांगते हैं मौत जिंदगी के ग़मजदा
घुट घुट उन्हें जिलाती है कमबख्त जिंदगी


हंसने की चाह में हैं , जो रो रो के जी रहे
आंसू उन्हें पिलाती है कमबख्त जिंदगी


जो सरफिरे करते नहीं परवाहे -जिंदगी
सर पर उन्हें बिठाती है कमबख्त जिंदगी

2 टिप्‍पणियां:

  1. महेंद्र जी बहुत ही सुन्दर विचार , जिन्दगी को समझना आसन नहीं है " है " लो " जिन्दगी , जिन्दगी नूर है मगर इसमे जलने का दस्तूर है रिवायत है की जिन्दगी गहना है ये हीरा है और चाटते रहना है "

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  2. महेंद्र भाई , आपको भी रक्षाबंधन की बहुत बहुत शुभकमनाएं आपके जीवन में हमेशा हर रिश्ता स्नेह , आत्मीयता और प्रेम लेकर आये , आप सदैव मुस्कुराते रहें और इसी तरह सुन्दर , मन को छू लेने वाली कविता लिखते रहे -ममता

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