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शनिवार, 19 जून 2010

टिकट लेके मिले ऐसे दर्शन नहीं चाहिये

आइये हम चलायें एक नया मजहब
जिसमे इंसान रहें इंसानों की तरह सब
ऐसा धर्म जो प्यार के सागर बहाए
ऐसा धर्म जो इंसान से इंसान को मिलाये

धर्म जिसमे मस्जिद की दीवालें ना हो
मंदिर गिरजे गुरूद्वारे शिवाले ना हो
धर्म जिसमे तन पर पहचान के प्रतीक ना हो
धर्म जिसमे दान के नाम पर भीख ना हो

पंडो की पूजा का कर्म नहीं चाहिए
झंडो की पूजा का धर्म  नहीं चाहिए
पाप कर के धोने वाली गंगा नहीं चाहिए
मुहर्रम रामनवमी का दंगा नहीं चाहिए

जीवों की बलि वाले देव नहीं चाहिए
खून में नहाये ऐसे देव नहीं चाहिए
अछूतों का  निषेध- ऐसे द्वार नहीं चाहिए
चंदे  के नाम पर व्यापार नहीं चाहिए

टिकट लेके मिले ऐसे दर्शन नहीं चाहिये
पंडों की तृप्ति वाला तर्पण नहीं चाहिए
ईश्वर की सेवा में चढ़ावे नहीं चाहिए
भक्ति के नाम पर दिखावे नहीं चाहिए

आपस में लडावे ऐसे वचन नहीं चाहिए
संकुचित भावों के प्रवचन नहीं चाहिए
मजहब के नाम पर जेहाद नहीं चाहिए
खून बन के रिसे वो मवाद नहीं चाहिए

कथनी ही कहे ऐसे ग्रन्थ नहीं चाहिए
करनी में फर्क ऐसे पंथ नहीं चाहिए
शाश्त्रों के शब्दों पर हठ नहीं चाहिए
पापों को शरण दे वो मठ नहीं चाहिए

भगवे में ठगने वाले संत नहीं चाहिए
सम्पति से चिपके महंत नहीं चाहिए
जादू से आने वाली भस्म नहीं चाहिए
गांजा चढाने वाली रस्म नहीं चाहिए

ईश्वर ने बनाये सिर्फ मानव हैं
मानव  ने बनाये किन्तु दानव हैं
हमने बना दिए इतने सारे मजहब
जिनके नीचे ईश्वर का मानव गया दब

हर मजहब ने बना दिए अपने कुछ कानून
कानूनों  ने पैदा किये धर्म के जूनून
जुनूनों से बह निकले खून के नाले
इंसान का नहीं, हुआ इंसानियत का खून

धर्म एक चलावें जिस में प्यार की ही पूजा हो
ईश्वर हो एक कोई, देव नहीं दूजा हो
कर्म जिसका केवल व्यवहार की सरलता हो
दूसरों के कष्ट देख आँख में तरलता हो

भजनों में गीत की संगीत की मिठास हो
हर किसी को देख परिवार का आभास हो
'वसुधैव कुटुम्बकम'* को माने वो समाज हो
सेवा सहयोग इस समाज का रिवाज हो

*['वसुधैव कुटुम्बकम' = विश्व मेरा परिवार ]

1 टिप्पणी:

  1. धर्म, मजहब, ईश्वर, खुदा - वैगरह; ये सारे शब्द शायद किसी अच्छे उद्देश्य के लिए बने थे; लेकिन आज इन शब्दों का दुरुपयोग पूरी मानव जाति के लिए कितना घातक बन गया है , ये नजर आ रहा है .गलत विश्वास जन्म दे रहें, अंध विश्वासों और अंध भक्ति को ; जिसका फायदा उठा रहें हैं ,धर्म के ठेकेदार हर देश में, हर जाति में और हर तथाकथित मजहब में . यह कविता एक नारा है ऐसे अंध विश्वास के खिलाफ. आप भी शामिल हो जाइए .

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