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गुरुवार, 10 जून 2010

मन और जीवन

जो चाहो वो हो ना पाता. ना चाहो वो होता -जीवन
मन की इच्छाओं को भूल  जा, हर दिन  इक समझौता - जीवन 

कभी मेघ को देख गगन में मन मयूर खिल खिल जाता है
लेकिन फिर तूफानी अंधड़, बस्ती कई डुबोता - जीवन

कभी ह्रदय की कोमल बातें बन कर कविता बहना चाहे
तभी सामने कोई पहुँच कर अपनी पीड़ा  रोता - जीवन

कभी किसी छुट्टी के दिन बस, मन कहता विश्राम करेंगे
तभी पडोसी की बुढिया माँ, मर जाती , ये होता -जीवन

अपने मन की करनी हो तो , मन में अपना कुछ मत सोचो
जो होता है हो जाने दो ,ये उपाय इकलौता - जीवन

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