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बुधवार, 12 मई 2010

जिंदगी और मौत

जिंदगी का क्या भरोसा कब तलक चल पायेगी
मौत का पक्का है वादा एक दिन वो आएगी

सांस के तारों के सुर जिस दिन कहीं खो जायेंगे
गोद में रख सर , सिरहाने मौत गुनगुनायेगी

रात भर जो जल चुका उस दीप सी वीरान आँखें
जिंदगी के पार कोई लौ सी टिमटिमाएगी

शब्द अंतिम कह चुके होठों पे इक मुस्कान होगी
इक वही मुस्कान सब कुछ, अनकही कह जाएगी

स्पर्श की सीमा में सीमित , प्रेम जब बंधन न होगा
आत्मा ब्रह्माण्ड में घुल , प्रेममय हो जाएगी

2 टिप्‍पणियां:

  1. Hum "wo nahi jo" timepass ke liye aap ka BLOG padhe he...
    Hum woh he jo dil se aap ke BLOG pe kutch naya likhne ka intzzar karte he...
    Truly a real pleasure reading your piece of art..

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  2. Thanks.My poetry is not for masses. It is for those who just dont read poetry but feel the poetry. Thanks for appreciating.

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